उत्तर प्रदेश

BJP के लिए खतरा बन रहे हैं संजय निषाद, गठबंधन तोड़ने की भी दी धमकी

पंचायत और विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दलों को आइना दिखाने के लिए बीजेपी दांव चल रही है. वहीं NDA के घटक दल मंत्रिमंडल विस्तार और विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए दबाव बना रहे हैं.

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संजय निषाद ने हाल ही में 20 अगस्त को दिल्ली में आयोजित पार्टी के अधिवेशन में बोला था कि यदि मल्लाहों को अनुसूचित जाति में आरक्षण नहीं मिला तो वह विधानसभा का घेराव करेंगे. निषाद के बयान के बाद ही भाजपा के निषाद नेताओं ने उन्हें घेरना प्रारम्भ कर दिया है.

बीजेपी नेता जयप्रकाश निषाद ने बोला कि संजय निषाद आरक्षण को नाम पर समाज को गुमराह कर रहे हैं. जयप्रकाश के बयान से तिलमिलाए संजय निषाद ने मंगलवार को गोरखपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भाजपा के नेताओं की बयानबाजी पर नाराजगी जताई. निषाद ने यहां तक कह दिया कि यदि भाजपा नहीं चाहती है तो गठबंधन खत्म कर लें.

निषाद पार्टी से किनारा कर रही भाजपा

संजय निषाद के लगातार आक्रमक तेवर से सियासी हल्कों में तरह-तरह की चर्चा प्रारम्भ हो गई हैं. सियासी विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा का नेतृत्व किसी भी मुद्दे में सियासी नफा-नुकसान का आकलन करने के बाद ही कोई फैसला लेता है. हर आदमी और सियासी दल की सियासी ताकत का उन्हें अंदाजा है.

निषाद समाज का बड़ा वोट बैंक समाजवादी पार्टी में शिफ्ट

  • लोकसभा चुनाव में संजय निषाद संतकबीर नगर से अपने बेटे प्रवीण निषाद को चुनाव नहीं जिता सके. निषाद समाज का बड़ा वोट बैंक समाजवादी पार्टी में शिफ्ट हो गया.
  • निषाद वोट के बूते ही सुल्तानपुर में रामभुआल निषाद ने भाजपा की कद्दावर मेनका गांधी को चुनाव हरा दिया.
  • उप चुनाव में भाजपा ने संजय निषाद के हिस्से वाली मिर्जापुर की मझवां सीट को उप चुनाव में निषाद से छीन लिया.
  • अंबेडकरनगर की कटहरी सीट भी निषाद से छीन कर भाजपा ने अपने कब्जे में ले ली है. दोनों सीटों पर अब भाजपा के विधायक हैं.
  • बीजेपी ने निषाद पार्टी से किनारा करना प्रारम्भ कर दिया है. सियासी विश्लेषक मानते हैं कि यदि भाजपा नेतृत्व को लगा कि निषाद वोट में संजय निषाद की पकड़ कमजोर हो रही है तो वह उन्हें अधिक महत्व नहीं देंगे.

दिल्ली में एक मंच पर जुटे थे राजभर, निषाद और पटेल

निषाद पार्टी की ओर से 20 अगस्त को पार्टी के 10वें स्थापना दिवस कार्यक्रम पर दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में अधिवेशन आयोजित किया था. इससे पहले पार्टी की ओर से लखनऊ में ही स्थापना दिवस कार्यक्रम मनाया जाता रहा है. लेकिन इस बार दिल्ली में आयोजित अधिवेशन में निषाद पार्टी के मंच पर सुभासपा के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर, अपना दल (एस) के उपाध्यक्ष एवं प्रदेश गवर्नमेंट के मंत्री आशीष पटेल और रालोद के महासचिव चेतन चौहान भी उपस्थित रहे.

निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने बोला था कि वास्तविक पीडीए तो निषाद पार्टी, अपना दल (एस), सुभासपा और रालोद हैं. अधिवेशन में एनडीए के सभी दलों के नेताओं ने अपनी एकजुटता दिखाते हुए बोला था कि उनकी आवाज कोई दबा नहीं सकता है. अधिवेशन में सभी दलों ने एक दूसरे का योगदान करने की घोषणा भी की थी.

सहयोगी दलों का प्रदेश गवर्नमेंट से तारतम्य नहीं बैठ रहा

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि निषाद पार्टी ने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को उत्तर प्रदेश में सहयोगी दलों की ताकत दिखाने के लिए दिल्ली में अधिवेशन का आयोजन रखा. वहीं उन्होंने यह भी संदेश देने की प्रयास की है कि प्रदेश गवर्नमेंट से उनका तारतम्य ठीक नहीं बैठ रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार और सियासी विश्लेषक आनंद राय का बोलना है कि क्षेत्रीय दलों का आधार उनकी जाति है. भाजपा में केंद्रीय मंत्री और अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल ही बीते 11 वर्ष से एनडीए में हैं. उन्होंने नीतिगत मुद्दों पर अपनी राय अवश्य रखी है. उनका बोलना है कि संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद 2018 में गोरखपुर लोकसभा सीट पर हुए उप चुनाव में समाजवादी पार्टी से ही सांसद बने थे. उसके बाद 2019 में उन्होंने भाजपा से गठबंधन किया.

सुभासपा के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर भी 2017 में भाजपा के साथ थे. 2022 में समाजवादी पार्टी के साथ रहे और अब फिर बीजेपी के साथ है. रालोद भी 2017 और 2022 में भाजपा के विरुद्ध थी अब भाजपा के साथ हैं.

आगामी पंचायत चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव तक भाजपा पर सीट बंटवारे के लिए सहयोगी दल दबाव की राजनीति कर रहे हैं. इसलिए अपनी एकजुटता भी दिखा रहे हैं.

यदि उन्हें किसी के बयान से कोई परेशानी है तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी से बात करें, लेकिन इस तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस तरह की बयानबाजी यही संदेश देती है कि वह दबाव बनाना चाहते हैं. संजय निषाद ने जब-जब इस तरह की बयानबाजी की है तो उसके पीछे उनका निहितार्थ अवश्य रहा है.

सहयोगी दल गवर्नमेंट में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए बना रहे दबाव

वरिष्ठ पत्रकार और सियासी विश्लेषक रामदत्त त्रिपाठी का बोलना है कि प्रदेश में आनें वाले दिनों में मंत्रिमंडल विस्तार होना है. सहयोगी दल गवर्नमेंट और बीजेपी पर इस तरह की बैठकें और बयानबाजी कर गवर्नमेंट में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए दबाव बना रहे हैं.

उनका बोलना है कि उसके बाद पंचायत चुनाव और विधानसभा चुनाव भी होना है. सहयोगी दल चाहते हैं कि उनके क्षेत्रों में ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी उन्हें ही मिले. विधानसभा चुनाव में भी 2022 की तुलना में अधिक सीटें चाहते हैं. इस तरह के बयान सिर्फ़ बार्गेनिंग के लिए हो रहे हैं.

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