आखिर क्या कह रही है राहुल की खामोशी, जटिल हो गई महागठबंधन के अंदर की स्थिति…
वोट अधिकार यात्रा प्रारम्भ होने के मौके पर सासाराम में आयोजित कार्यक्रम में वीआईपी सुप्रीमो मुकेश सहनी का गुस्सा साफ-साफ उनके चेहरे पर नजर आया। उनके शब्दों में भी वह ताजगी और उत्साह नहीं था, जैसा पहले महागठबंधन की सभाओं में दिखता रहा है। उन्होंने विपक्ष की एकजुटता से बीजेपी को सबक सिखाने का संकल्प तो दोहराया, लेकिन बिहार में महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव और लालू यादव का नाम लेने से परहेज भी किया। एक बार उन्होंने राहुल के साथ लालू का नाम जरूर लिया, लेकिन राहुल की वोट अधिकार यात्रा के सिलसिले में और बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने के लिए। उन्होंने भूलकर भी तेजस्वी का हाथ मजबूत करने के लिए वोट नहीं मांगे। तेजस्वी का गुणगान नहीं किया, जैसा वे अक्सर महागठबंधन की किसी भी बैठक या सभा में करते रहे हैं। वे एक और बात भूल गए। शायद उन्हें यह अवसर अनुकूल नहीं लगा होगा। उन्होंने स्वयं को डिप्टी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने से परहेज किया।

बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव को सीएम बनाने का लालू प्रसाद यादव का सपना फिलहाल कई चुनौतियों से घिरा हुआ है। मुकेश सहनी की विकासशील आदमी पार्टी (VIP) की महत्वाकांक्षी मांगें और कांग्रेस पार्टी की रणनीतिक चालें महागठबंधन के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही हैं। हालांकि महागठबंधन के पास अभी भी रास्ता निकालने की संभावनाएं हैं, लेकिन यह रास्ता आसान नहीं दिखता। आइए, इसे विस्तार से समझते हैं।
मुकेश सहनी की जिद जानें
सीट बंटावारे में बड़ा हिस्सा
सहनी ने 60 विधानसभा सीटों की मांग की है। विशेष रूप से चंपारण और दरभंगा जैसे क्षेत्रों में, जहां उनकी पार्टी की अच्छी पकड़ मानी जाती है। हाल ही में उन्होंने पूर्वी चंपारण की अधिकांश सीटों पर उम्मीदवार उतारने का घोषणा भी किया था, जो महागठबंधन के भीतर तनाव का कारण बना है। महागठबंधन में पहले की पांच पार्टियों के बाद दो नए दलों की एंट्री से यह काम अधिक मुश्किल हो गया है। पिछली बार जो महागठबंधन में रहे, वे अपनी सीटें इस बार घटाने को तैयार नहीं। मसलन पिछली बार 243 सीटें जिन 5 पार्टियों में बंटी थीं, उन्हें इस बार 7 दलों में बांटना है। जाहिर है कि बिना सीटों में कटौती किए यह संभव नहीं है, जबकि मुकेश सहनी बिना इसकी परवाह किए 60 सीटों की जिद पर अड़े हैं।
डिप्टी सीएम की कुर्सी चाहिए
सहनी की दो नावों की सवारी
मुकेश सहनी दो नावों कीसवारी करते रहे हैं। इस बार भी वे उसी अंदाज में पेश आ रहे हैं। पिछली बार वे ऐन मौके पर महागठबंधन छोड़ कर एनडीए खेमे में भाग गए थे। तब बीजेपी ने उन्हें अपने कोटे से 11 सीटें दे दी थीं। लोकसभा चुनाव के समय से वे महागठबंधन में हैं। तभी से वे अपने को डेप्युटी मुख्यमंत्री बनाए जाने की रट लगाए हुए हैं। तेजस्वी यादव भी उन्हें भाई मानते रहे हैं। पर, चर्चा है कि फिर सहनी एनडीए की ओर मुखातिब हुए हैं। बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से उनकी वार्ता होने की भी खूब चर्चा है। इस बीच सहनी को डेप्युटी मुख्यमंत्री बनाने से आरजेडी के इनकार के बाद उनका गुस्सा स्वाभाविक है। शायद यही वजह रही कि उन्होंने अपने संबोधन में तेजस्वी यादव का नाम लेने से परहेज किया।
सीट के लिए प्रेशर पॉलिटिक्स
आरजेडी की स्थिति जानिए
RJD महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी है। तेजस्वी को महागठबंधन का सीएम चेहरा बनाने पर आरजेडी अड़ी हुई है। तेजस्वी ने ही 2020 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों में महागठबंधन का नेतृत्व किया था। कम ही समय के लिए दो बार डेप्युटी मुख्यमंत्री रहने के कारण जनता के बीच तेजस्वी की स्वीकार्यता भी बढ़ी ह। हालांकि सहनी की मांगें और कांग्रेस पार्टी की रणनीति ने RJD को रक्षात्मक रुख अपनाने पर विवश कर दिया है। RJD के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने सहनी की डिप्टी सीएम की दावेदारी को खारिज कर दिया, जिससे गठबंधन में दरार और गहरी हुई है। मुकेश सहनी ने यदि मंच पर प्रमुख रूप से मौजूद तेजस्वी का नाम अपने संबोधन में नहीं लिया तो इसके पीछे आरजेडी की वादाखिलाफी है।
क्या कोई रास्ता निकलेगा?
महागठबंधन के सामने कई चुनौतियां हैं, लेकिन रास्ता निकालना असंभव नहीं है। RJD, कांग्रेस पार्टी और VIP को सीट बंटवारे पर एक संतुलित फॉर्मूला निकालना होगा। सहनी की 60 सीटों की मांग अव्यावहारिक है, लेकिन उन्हें 20-25 सीटें देकर और प्रभावशाली क्षेत्रों में अहमियत देकर मनाया जा सकता है। सहनी को डेप्युटी सीएम का पद देने का वादा कर के उनकी महत्वाकांक्षा को शांत किया जा सकता है, बशर्ते RJD और कांग्रेस पार्टी इस पर सहमत हों। हालांकि सिद्दीकी जैसे नेताओं का विरोध इसे कठिन बना रहा है। रही बात मुख्यमंत्री की तो तेजस्वी का नाम घोषित करने में कांग्रेस पार्टी को अब अधिक विलंब नहीं करना चाहिए। पर, कांग्रेस पार्टी हड़बड़ी में नहीं दिखती। राहुल गांधी ने एक बार भी सासाराम में इस बारे में कुछ नहीं कहा। इससे संशय बरकरार है।

