रिटायर होने के बाद विदेश ना जाकर घर पर ही किए गौ-पालन शुरू
रिटायरमेंट के बाद कई लोग जीवन को आरामदायक ढंग से जीना चाहते हैं। लेकिन, कई लोग रिटायर होने के बाद भी कोई काम करना पसंद करते हैं। आज आपको ऐसे ही एक आदमी के बारे में बता रहे हैं जो रिटायर होने के बाद विदेश ना जाकर घर पर ही गौ-पालन प्रारम्भ कर दिया।

हम बात कर रहे हैं अरुण कुमार शाही की। वह बिहार के सीतामढ़ी जिले के पंथपाकड़ गांव के रहने वाले, हैं। अपने रिटायरमेंट के बाद भी एक आइडियल जीवन जी रहे हैं। सिविल इंजीनियरिंग में डीजीएम के पद से रिटायर होने के बाद उन्होंने आराम की जीवन चुनने के बजाय गौपालन और किसानी को अपनाया। अब वे गांव में शुद्ध दूध और फल मौजूद कराने के साथ-साथ अपनी आर्थिक स्थिति भी मजबूत कर रहे हैं।
रिटायरमेंट के बाद गोपालन और खेती की शुरुआत
अरुण शाही ने रिटायर होने के बाद 2021 में गौपालन की आरंभ की। उनकी गौशाला में अब 20 से अधिक गाय हैं, जिससे वे रोजाना 100 लीटर दूध का उत्पादन करते हैं। वह 5,000 रुपये रोजाना की दूध बिक्री करते हैं। जिसमें से 40 लीटर दूध गांववालों को सस्ते रेट पर मौजूद कराया जाता है।
इसके अलावा, वे 14 कट्ठे जमीन में मछली पालन और 2 एकड़ में फलदार पौधे जैसे केला, पपीता, आम, लीची और अमरूद की खेती कर रहे हैं। मछली पालन से उनकी सालाना 2 लाख रुपये से अधिक की कमाई होती है।
अरुण शाही को गौपालन की प्रेरणा अपने पिता, स्वतंत्रता सेनानी रामदीन शाही से मिली। उन्होंने गांव के कल्चर को अपनाते हुए प्राकृतिक और जैविक उपायों से खेती करना प्रारम्भ किया। उनका मानना है कि 60 साल की उम्र के बाद स्वस्थ रहने के लिए गांव का जीवनशैली अपनाना चाहिए।
विदेशों में कार्य और परिवार
अरुण शाही ने अपने कैरियर में हिंदुस्तान के अतिरिक्त दुबई, कतार, तंजानिया और यूएई जैसे राष्ट्रों में काम किया हैं। उनके तीनों बच्चे भी इंजीनियर बने हैं। उनके बेटे अनल कुमार शाही, आईआईटी रुड़की से पढ़ाई करने के बाद गुड़गांव में टाटा कंपनी में सिविल इंजीनियर के रूप में कार्यरत हैं। अरुण शाही ने अपनी दोनों बेटियों की विवाह 2018 में कर दी।
पत्नी का योगदान और परिवार के साथ जीवन
अरुण शाही की पत्नी, जो स्वयं होम्योपैथिक चिकित्सक हैं, ने भी गांव के जीवन को अपनाया और अब वे दूध की बिक्री का हिसाब-किताब संभालती हैं। रिटायरमेंट के बाद अरुण शाही ने शहर या विदेश में आरामदायक जीवन जीने के बजाय अपने गांव में रहकर खेती और पशुपालन के माध्यम से अपनी जड़ों से जुड़ने का निर्णय किया। उनके बेटे ने उन्हें विदेश में बसने का प्रस्ताव भी दिया, लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया और गांव में रहना पसंद किया।

