बिहार

Bihar Chunav: मौजूदा विधायकों पर गिरने वाली है गाज, BJP में मची खलबली

बिहार में चुनाव की तारीखें किसी भी समय घोषित हो सकती हैं इस बीच बीजेपी और एनडीए के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है अपने उम्मीदवारों का चयन करना बीजेपी के पास इस समय 80 विधायक हैं, जिनमें 22 मंत्री भी शामिल हैं लेकिन इन विधायकों के विरुद्ध जनता की नाराज़गी यानी एंटी-इंकम्बेंसी पार्टी के लिए सिरदर्द बन सकती है ऐसे में बड़ा प्रश्न ये है कि क्या मौजूदा विधायकों की टिकट कटेगी या फिर पार्टी एक बार फिर से भरोसा जताने का जोखिम उठाएगी

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नीतीश कुमार ने हाल ही में कई योजनाएं प्रारम्भ की हैं आशा की जा रही है कि इन योजनाओं से मतदाताओं का रुख बदलेगा पीएम मोदी ने भी पिछले सप्ताह सीएम स्त्री रोजगार योजना के अनुसार 75 लाख स्त्रियों के खाते में 10-10 हजार रुपये सीधे ट्रांसफर किए बीजेपी को लगता है कि ऐसे कदम उसे चुनावी मैदान में मजबूती देंगे

बिहार में गुजरात वाला फॉर्मूला
अंग्रेजी अखबार भारतीय एक्सप्रेस के अनुसार टिकट बंटवारे को लेकर लंबी बैठकें चल रही है चर्चा है कि गुजरात और छत्तीसगढ़ की तरह बिहार में भी बड़े पैमाने पर नए चेहरों को टिकट दिए जा सकते हैं ताकि एंटी-इंकम्बेंसी का असर कम हो गुजरात में बीजेपी ने 2022 के चुनाव से पहले कई वरिष्ठ विधायकों और मंत्रियों को टिकट नहीं दिया था और इसका लाभ भी मिला था लेकिन बिहार की राजनीति गुजरात जैसी नहीं है यहां बीजेपी पूरी तरह हावी नहीं है और बगावत करने वाले नेता चुनावी हानि पहुंचा सकते हैं

आसान नहीं कैंडिडेट तलाशना
भाजपा इस बार 101 से 104 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है ऐसे में उसे नए और जीतने वाले उम्मीदवार ढूंढने की कड़ी चुनौती है वहीं जेडीयू के पास 45 विधायक हैं और उनमें से कई की उम्र 70 वर्ष से ऊपर है लिहाजा वहां उम्मीदवार बदलना आसान होगा

वोट चोरी अभियान का असर
पार्टी के सामने दूसरी कठिनाई विपक्ष की ओर से चलाया जा रहा “वोट चोरी” का अभियान भी है हालांकि बीजेपी नेताओं का दावा है कि आखिरी मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम नहीं काटे गए, जिससे विपक्ष का मामला ज़्यादा असरदार नहीं रह जाएगा

मोदी के नेतृत्व में चुनाव
भाजपा नेताओं का मानना है कि चुनाव पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में लड़ा जाएगा, लेकिन वास्तविक लड़ाई ज़मीनी स्तर पर साफ-सुथरे और विश्वसनीय चेहरों को आगे लाने की होगी अब देखना यह होगा कि बीजेपी “नए चेहरों और नयी योजनाओं” के दम पर मतदाताओं का दिल जीत पाती है या फिर जनता एंटी-इंकम्बेंसी की वजह से उसे कड़ा सबक सिखाती है

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