झटका! बिहार चुनाव से पहले फेल हुआ जेडीयू का पावर गेम, हिल गई जेडीयू
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक जमीन पर कार्यकर्ताओं और नेताओं की गर्माहट अभी प्रारम्भ ही हुई है कि नीतीश कुमार की जेडीयू को अपने ही घर में दोहरी चुनौती मिली है। भागलपुर से सांसद अजय मंडल ने टिकट बंटवारे में ‘अनदेखी’ का इल्जाम लगाते हुए सीएम नीतीश कुमार को पत्र लिखकर इस्तीफे की पेशकश कर दी, वहीं गोपालपुर से विधायक गोपाल मंडल मुख्यमंत्री आवास के बाहर धरने पर बैठकर टिकट की मांग पर अड़ गए। दोनों ही ‘मंडल’ उपनाम वाले ये नेता बिहार की पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों (OBC-EBC) की राजनीति के प्रतीक कहे जाते हैं और बिहार चुनाव में उनकी नाराजगी ने कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। दरअसल, यह न सिर्फ़ जेडीयू की आंतरिक कलह को उजागर किया है, बल्कि पूरे एनडीए गठबंधन के लिए एक बड़ा सियासी खतरा पैदा कर दिया है। प्रश्न यह है कि क्या यह घटनाक्रम जेडीयू की ‘पिछड़े वर्ग की पार्टी’ वाली छवि को धक्का पहुंचाएगा और बिहार की मंडल राजनीति पर इसका क्या असर पड़ेगा?

टिकट टकराव से नाराजगी तक
बिहार चुनाव के लिए एनडीए ने हाल ही में सीट बंटवारा फाइनल किया गया है जिसमें जेडीयू को 101 सीटें मिलीं। लेकिन, क्षेत्रीय स्तर पर टिकट वितरण में केंद्रीय नेतृत्व की ‘उपेक्षा’ ने राजनीतिक जमीन पर आग लगा दी। इसके बाद भागलपुर लोकसभा से जेडीयू के सांसद अजय कुमार मंडल ने सोमवार को नीतीश कुमार को पत्र लिखकर ‘नाराजगी की आग’ को और लहका दिया। पत्र में उन्होंने कहा, पिछले विधानसभा चुनावों में हमने जिन प्रत्याशियों के नाम प्रस्तावित किए थे वे सभी जीते थे। लेकिन इस बार जिला संगठन और क्षेत्रीय नेतृत्व की राय को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है। हमें तो पार्टी नेताओं से मिलने तक नहीं दिया जा रहा। मंडल ने अपनी ‘निष्ठा’ का हवाला देते हुए सांसद पद से इस्तीफे की अनुमति मांगी जो जेडीयू के लिए एक बड़ा झटका है।
‘मंडल’ पॉलिटिक्स का संकट
जेडीयू की OBC-EBC छवि पर खतरा
दरअसल, यह घटना अकेली नहीं है क्योंकि कई अन्य विधायक भी टिकट कटने की संभावना से नाराज हैं।हालांकि, जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने इसे ‘आंतरिक मामला’ बताते हुए बोला कि पार्टी एकजुट है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह बगावत का संकेत बताया जा रहा है। दरअसल, बिहार की राजनीति हमेशा से जाति पर टिकी रही है और ‘मंडल’ शब्द यहां केवल उपनाम नहीं, बल्कि पिछड़े वर्ग की राजनीति का प्रतीक है। 1990 के मंडल कमीशन से प्रारम्भ हुई यह लहर ने लालू प्रसाद यादव की आरजेडी और नीतीश कुमार की जेडीयू को सत्ता की कुंजी दी। नीतीश ने OBC-EBC आरक्षण को बढ़ाकर 2023 के जाति सर्वे के जरिए अपनी ‘सामाजिक न्याय’ वाली छवि मजबूत की। लेकिन अब, जब एनडीए में बीजेपी का दबदबा बढ़ रहा है तो जेडीयू की राजनीति को लेकर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
टिकट टकराव में ‘मंडल’ की नाराजगी दिख रही
नीतीश कैबिनेट में 21 बनाम जेडीयू के 14 पद भी प्रश्नों के घेरे में रहे हैं और ऐसे टकराव जेडीयू के वोट बैंक को कमजोर कर सकते हैं। अजय और गोपाल मंडल जैसे नेता भागलपुर जैसे ओबीसी प्रधान क्षेत्र में जेडीयू की मजबूत कड़ी हैं। अजय मंडल की इस्तीफे की पेशकश से पार्टी की क्षेत्रीय पकड़ ढीली पड़ सकती है, खासकर जब विपक्षी महागठबंधन (आरजेडी-कांग्रेस) टिकट बंटवारे में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में एकजुट हो रहा है। तेजस्वी यादव ने हाल ही में लव-कुश (कुशवाहा) क्षेत्र में घुसपैठ की प्रयास की है और पूर्व जेडीयू सांसद रेणु कुशवाहा को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया।
जेडीयू के सामाजिक समीकरण पर असर?
जानकारों का मानना है कि यदि ये बगावतें फैलीं तो जेडीयू के 101 सीटों में से कई पर ओबीसी वोटों में बिखराव का खतरा है जो एनडीए के ‘फिर से नीतीश’ नारे को कमजोर कर देगा। वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि मंडल राजनीति बिहार का मूल आधार बन गया है। कालांतर में नीतीश कुमार ने इसे मजबूत किया, लेकिन बीजेपी का बढ़ता असर और टिकट टकराव से ओबीसी और ईबीसी वोटरों में असंतोष बढ़ सकता है। जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे सहयोगी भी असंतुष्ट हैं जो एनडीए के लिए रिस्क है फैक्टर पहले से है। आरजेडी पहले से ही ‘नीतीश कुमार की अंतिम पारी’ और ‘जेडीयू का आखिरी सांस’ बताते हुए दावा कर रही है कि पिछड़े वर्ग के लोग अब सामाजिक इन्साफ की राजनीति की ओर लौट रहे हैं।
एनडीए के लिए कितना बड़ा रिस्क?
बता दें कि चुनाव आयोग ने 6 और 11 नवंबर को पहले और दूसरे चरण के मतदान की घोषणा की है और इसके रिज़ल्ट 14 नवंबर को आएंगे। नामांकन की आखिरी तारीख निकट आ रही है और सांसदों, विधायकों, नेताओं और कार्यकर्ताओं की नराजगी की खबरों ने राजनीतिक हलचल मचा रखी है। जाहिर है जेडीयू को शीघ्र संभालना होगा क्योंकि चुनाव की तारीखें निकट आ गई हैं। यदि अजय मंडल का त्याग-पत्र स्वीकार हो गया तो भागलपुर में उपचुनाव का बोझ पड़ेगा। गोपाल मंडल का धरना यदि लंबा खिंचा तो अन्य असंतुष्ट विधायक भी मैदान में उतर सकते हैं। ऐसे में एनडीए की एकजुट छवि पर भी सेंध लगेगी और विपक्ष के लिए यह सुनहरा मौका लेकर आएगा।

