बिहार

बिहार सरकार की ओर से खादी कारीगरों को नहीं मिलती कोई भी मदद

गोपालगंज, 28 मार्च (. बिहार के गोपालगंज जिले ने अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं के जरिए एक विशिष्ट पहचान बनाई है. इन परंपराओं में खादी का विशेष जगह रहा है, जिसने न सिर्फ़ क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को सशक्त किया, बल्कि जिले की पहचान को भी नया आयाम दिया. बिहार गवर्नमेंट ने इसे एक जिला, एक उत्पाद के अनुसार शामिल भी किया है. फिलहाल यह उद्योग बुरे दौर से गुजर रहा है. कम आमदनी के कारण परिवार चलाना कठिन हो रहा है, इस वजह से कारीगर पलायन को विवश हैं. क्या इनकी हालात सुधर सकती है और कैसे गवर्नमेंट की एक प्रयास इस उद्योग की तस्वीर बदल सकती है? इन तमाम प्रश्नों का उत्तर गोपालगंज खादी ग्रामोद्योग से जुड़े रहे सुरेंद्र कुमार सिंह ने दिया. उन्होंने न्यूज एजेंसी आईएएनएस से बात की और वर्तमान हालात से रूबरू कराया.Download 11zon 2025 03 28t123817. 364

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गोपालगंज खादी ग्रामोद्योग से जुड़े पूर्व कर्मचारी ने बोला कि आजादी के पहले से खादी ग्रामोद्योग की आरंभ हुई थी और यह काफी तेजी से आगे बढ़ रहा था, लेकिन बदलते समय के साथ खादी उद्योग पर ध्यान नहीं दिया गया और यह उद्योग आज बुरे दौर से गुजर रहा है.

बीते दौर को याद करते हुए सिंह कहते हैं, पूरे गोपालगंज में 200 जगहों पर हथकरघा उद्योग चलता था, लेकिन वर्तमान में कठिन से 10 जगहों पर चल रहा है. मजदूरी कम मिलने से इस उद्योग से जुड़े कारीगर अब बाहरी राज्यों की ओर पलायन करने लगे हैं, जिस वजह से उद्योग बंद हो रहे हैं.

उन्होंने बोला कि गवर्नमेंट की उदासीनता भी एक बड़ा कारण है. खासकर बिहार गवर्नमेंट की ओर से कारीगरों को कोई सहायता नहीं मिलती है. हालांकि, केंद्र गवर्नमेंट से प्रोडक्शन पर 30 फीसदी तक की सहायता मिल जाती है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है.

पलायन की विवशता का मुख्य कारण आर्थिक तंगी है. हुनर है पर उसका मान नहीं. सिंह के अनुसार घंटों काम करने के बाद भी सम्मानजनक मजदूरी नहीं मिलती. उन्होंने कहा, एक दिन में कम से कम आठ घंटे काम करना पड़ता है, जिसके बदले में 150 से 200 रुपये की कमाई होती है, आज के समय में ये काफी कम है. इस वजह से लोग दूसरे कामों में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, जहां इतने घंटे काम करके 500 से 600 रुपये तक की कमाई हो जाती है.

खादी परिधान की मांग तो है, लेकिन कारीगरों की कमी से उद्योग का दायरा सिमट गया है. उन्होंने बोला कि उद्योग का दायरा सीमित होने से अब लोकल बाजार में ही कपड़ों की बिक्री हो जाती है. गोपालगंज के आसपास के जिलों में कपड़े बिक जाते हैं और कभी-कभी गोरखपुर या वाराणसी से भी मांग की जाती है.

उल्लेखनीय है कि गोपालगंज में खादी उद्योग की जड़ें प्राचीन काल से जुड़ी हुई हैं. क्षेत्रीय कारीगरों ने अपनी कला और कौशल के माध्यम से हस्तनिर्मित वस्त्रों का उत्पादन किया, जो अपनी गुणवत्ता और डिजाइन के लिए मशहूर थे. समय के साथ, यह उद्योग क्षेत्रीय समुदाय के लिए रोजगार का एक प्रमुख साधन बन गया था.

गोपालगंज का खादी उद्योग जिले की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का जरूरी हिस्सा रहा है, लेकिन गोपालगंज का खादी उद्योग कई चुनौतियों का सामना कर रहा है. इनमें आधुनिक तकनीक की कमी, मार्केटिंग में कठिनाई, और कच्चे माल की उपलब्धता जैसी समस्याएं शामिल हैं.

 

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