बिहार

राजनीति में बड़ा भूचाल ला सकता है PK का यह दांव, जानें किसको होगा फायदा…

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: बिहार चुनाव 2025 में कौन सा गठबंधन रसातल में मिलने वाला है? पटना के वेटरनरी कॉलेज ग्राउंड में 2 अक्टूबर 2024 को जन सुराज पार्टी के लॉन्च के दिन प्रशांत किशोर ने बोला था, ‘हम या तो 200 सीटें जीतेंगे, या 4-5 पर सिमट जाएंगे’ पीके का यह बयान अब बिहार के गली-गली में तो गूंज ही रहा है, नेताओं की नींद भी गायब कर रखी है बिहार चुनाव से पहले पीके की पॉलिटिक्स ने लालू के लाल तेजस्वी यादव की नींद छीन ही ली है, एनडीए में भी खौफ पैदा कर दिया है एनडीए नेताओं ने दबे जुबान से कहना प्रारम्भ कर दिया है कि पीके की पॉलिटिक्स से इस बार कुछ बड़ा होने वाला है दो वर्ष पहले जब प्रशांत किशोर ने अपनी 3,000 किलोमीटर की पदयात्रा बिहार में प्रारम्भ की थी, तो नेता और लोग सब इसे राजनीतिक नौटंकी मान रहे थे लेकिन 2024 में जन सुराज पार्टी का गठन और उसके ठीक बाद विधानसभा के चार सीटों के उपचुनाव में 10 फीसदी वोट हासिल कर तहलका मचा दिया

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पीके, जो कभी नरेंद्र मोदी की 2014 में जीत और 2015 में बिहार में महागठबंधन जीत के पीछे का मास्टरमाइंड थे, अब स्वयं राजनीति के मैदान में हैं प्रशांत किशोर की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं बक्सर के एक मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर, संयुक्त देश के स्वास्थ्य कार्यक्रमों में काम करने वाले पीके ने 2011 में भारतीय राजनीति में कदम रखा उनकी पहली बड़ी सफलता थी 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की जीत, जहां उन्होंने ‘चाय पे चर्चा’ और ‘3डी रैलियों’ जैसे इनोवेटिव कैंपेन डिजाइन किए 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने उन्हें राजनीतिक रणनीति का ‘चाणक्य’ बना दिया लेकिन पीके ने केवल भाजपा के लिए काम नहीं किया 2015 में नीतीश कुमार की महागठबंधन गवर्नमेंट की जीत, 2021 में ममता बनर्जी की तृणमूल जीत और डीएमके की तमिलनाडु में वापसी सबमें पीके का दिमाग था

पीके के दांव से बिहार की राजनीति में भूचाल?

2018 में जेडीयू के उपाध्यक्ष बनने के बाद पीके का नीतीश से मोहभंग हुआ नागरिकता संशोधन कानून पर मतभेद के बाद 2020 में उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया इसके बाद पीके ने ‘बात बिहार की’ कैंपेन प्रारम्भ किया, जो बाद में जन सुराज अभियान बना उनकी पदयात्रा ने बिहार के गांव-गांव में एक नया संदेश पहुंचाया जाति और धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर शिक्षा, रोजगार, और विकास की बातलेकिन क्या यह संदेश बिहार की जातिगत राजनीति में स्थान बना पाएगा?

2024 में दिखाया दम 2025 में जान लड़ा देंगे?
2024 के बिहार विधानसभा के उपचुनावों में जन सुराज का प्रदर्शन भले ही कमजोर रहा पार्टी की चारों सीटों पर हार हुई लेकिन पार्टी ने 10% वोट शेयर हासिल किया, जो एक नए खिलाड़ी के लिए छोटी बात नहीं पीके ने दावा किया कि उनका वास्तविक मुकाबला एनडीए के साथ है न कि राजद के साथ वहीं राजद और महागठबंधन ने पीके को ‘बीजेपी की बी-टीम’ करार दिया है मीसा भारती ने तो यहां तक बोला कि ‘पांडे (पीके की जाति) यादवों को गाली देने का धंधा करते हैं’

बिहार चुनाव जिस तरह से प्रशांत किशोर मेहनत कर रहे हैं, उससे राजनीति हिल जाए तो आश्चर्य नहीं होगी बोला जा रहा है कि आरएसएस का एक वर्ग पीके के सपने को साकार करने में लग गई है यदि यह बात सच साबित हुई तो पीके का सपना हकीकत बन सकता है लेकिन बिहार की जटिल राजनीति में, जहां नीतीश और तेजस्वी जैसे कद्दावर पहले से डटे हैं वहां क्या पीके का जादू चलेगा? यह तो 2025 का चुनाव ही बताएगा

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