जानें, किस पार्टी की तरफ ज्यादा झुकाव रखते हैं नीतीश कुमार…
नीतीश कुमार की बीजेपी से कथित नाराजगी की सच्चाई अभी तक सामने नहीं आई है. नीतीश कुमार कहते तो हैं कि वे एनडीए में ही रहेंगे, पर किसी को भरोसा नहीं हो रहा. भरोसा न होने की वजह भी है. पहले भी वे जिस बीजेपी के साथ मरते दम तक न जाने की बात कहते रहे, पर अब बीजेपी का साथ न छोड़ने की बात कह रहे हैं.

पहले की तरह ही उनका इस बार भी कहने का अंदाज है. इसलिए उनकी बातों पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा. प्रश्न उठता है कि नाराजगी है तो बीजेपी के साथ वे क्यों बने रहने की बात बार-बार कह रहे हैं. उनकी नाराजगी की चर्चा मात्र से आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव उत्साहित हैं. उन्हें नीतीश के इण्डिया ब्लॉक में लौट आने का बेसब्री से प्रतीक्षा है.
भाजपा भरोसेमंद सहयोगी
भाजपा और नीतीश कुमार का साथ समता पार्टी के समय से है. नीतीश को पहली बार मुख्यमंत्री बनने में बीजेपी ने ही उनका साथ दिया तो आज भी उनके साथ खड़ी है. नीतीश यह भी जानते हैं कि बीजेपी जो कहती है, उस पर कायम रहती है. साल 2020 में चुनाव से पहले बीजेपी ने बोला था कि एनडीए को सफलता मिली तो नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बनेंगे. बीजेपी ने ऐसा किया भी. जेडीयू जब 43 विधायकों वाली पार्टी बन गया, तब भी अपने 74 विधायक होने के बावजूद बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया. हालांकि नीतीश कुमार ने नैतिक आधार पर मुख्यमंत्री बनने से प्रारम्भ में इंकार कर दिया था, लेकिन गठबंधन धर्म का निर्वाह करते हुए बीजेपी ने उन्हें इसके लिए इंकार लिया.
इंडिया ब्लॉक में हुई फजीहत
नीतीश कुमार ने इण्डिया ब्लॉक बनाने की पहल जरूर की, लेकिन इसके लिए दबाव लालू यादव का था. लालू विपक्षी गठबंधन का अगुआ बना कर नीतीश को बिहार से बाहर भेजना चाहते थे. हड़बड़ी इतनी थी कि सोनिया गांधी से मिलाने के लिए लालू स्वयं नीतीश को लेकर दिल्ली गए. सोनिया की राय पर नीतीश आगे भी बढ़े, लेकिन विपक्षी गठबंधन की पहली बैठक में ही लालू के दांव के वे शिकार हो गए. पीएम की रेस से तो नीतीश ने पहले ही अपने को बाहर कर लिया था, लालू के कारण वे संयोजक भी नहीं बन पाए.
आरजेडी ने उपेक्षा की
आरजेडी ने नीतीश की उपेक्षा प्रारम्भ कर दी. आरजेडी के नेता पहले से ही नीतीश के मुख्यमंत्री पद छोड़ने और तेजस्वी की ताजपोशी की तारीखें बताते रहे थे. जब लोकसभा चुनाव के लिए नीतीश ने टिकट बंटवारे पर बल देना प्रारम्भ किया तो लालू आनाकानी करने लगे. लालू कहने लगे कि चुनाव में अभी समय है, इसलिए टिकट बंटवारे की हड़बड़ी क्यों. दरअसल लालू जेडीयू को सम्मानजनक सीटें देने के मूड में नहीं थे. नीतीश भी ठहरे राजनीति के माहिर खिलाड़ी. उन्होंने आरजेडी की मंशा भांप ली और साथ छोड़ने में ही भलाई समझी. बीजेपी के साथ आने पर उन्हें उतनी सीटें सरलता से मिल गईं, जितनी पर जेडीयू पिछली बार जीता था. नीतीश शायद अब भी आरजेडी की उपेक्षा नहीं भूले होंगे.
नाराजगी की खबरें क्यों?
अब प्रश्न उठता है कि जब एनडीए में नीतीश इतने आराम से हैं तो उनकी नाराजगी की खबरें क्यों आ रही हैं. इसके दो ही तात्कालिक कारण दिखते हैं. पहला यह कि महाराष्ट्र में अपने सहयोगी एकनाथ शिंदे को बीजेपी ने दूसरी बार मुख्यमंत्री नहीं बनाया. हालांकि यह कोई उचित कारण नहीं है. बीजेपी ने शिंदे की शिवसेना से अधिक उम्मीदवार उनकी सहमति से उतारे थे. इतना ही नहीं, बीजेपी के कई नेता शिवसेना के टिकट पर चुनाव भी लड़े. बीजेपी ने शिवसेना से अधिक सीटें जीतीं. इसलिए अपना मुख्यमंत्री बनाने का बीजेपी को नैतिक अधिकार था. बिहार में वैसे भी जेडीयू बीजेपी से अधिक या बराबर सीटों पर लड़ता रहा है. ऐसे में अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी को अपना मुख्यमंत्री बनाने का मौका मिलता है तो इसमें बुराई ही क्या है. वैसे नीतीश को यह मालूम है कि कम सीटों के बावजूद बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनने के लिए मान मनौव्वल किया था. केवल इसलिए कि चुनाव नीतीश के नेतृत्व में लड़ा गया था.
शाह ही साफ करेंगे रुख
अमित शाह दो दिन के बिहार दौरे पर 5 जनवरी को आने वाले हैं. पटना में उनके दो कार्यक्रम हैं. भूतपूर्व बीजेपी सांसद सुशील कुमार मोदी की जयंती पर होने वाले कार्यक्रम में वे शामिल होंगे. फिर गुरुद्वारा साहिब जाएंगे. पार्टी नेताओं के साथ बैठक भी करेंगे. संभव है कि वे नीतीश कुमार से भी मिलें. दोनों की मुलाकात हो गई तो संशय के बादल स्वत: छंट जाएंगे. यह भी हो सकता है कि अपने कार्यक्रम के दौरान अमित शाह मीडिया से भी कहीं न कहीं मुखातिब हो जाएं या फिर कार्यक्रम में ही कुछ ऐसा बोल जाएं, जिससे रहस्य से पर्दा हट जाए. हालांकि उन्होंने जो कुछ भी बोला है, उसमें उन्हें सफाई देने की आवश्यकता नहीं. बहरहाल, अगले 48 घंटे में साफ हो जाएगा कि नीतीश कुमार सच में नाराज हैं या नाराजगी की खबरें महज मीडिया की उपज हैं.

