Bihar Chunav 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए हर दल मुद्दों की तलाश में जुटा है। कुछ ने तो काफी मामले तलाश भी लिए हैं। इनमें कुछ मामले हर दल के तरकश में चुनावी तीर बना कर सजा दिए गए हैं। रोजगार और पलायन के मामले पर आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने 2020 का चुनाव लड़ा था। इसका फायदा भी महागठबंधन को मिला था। तेजस्वी यादव सत्ता की दहलीज तक पहुंच गए थे। इस बार भी महागठबंधन के एजेंडे में यह सर्वोच्च अहमियत वाले मुद्दों में शामिल है। महागठबंधन में शामिल कांग्रेस पार्टी ने भी इस बार तेजस्वी की तरह अपने चुनावी मुद्दों की अहमियत सूची में रोजगार और पलायन को टाप पर रखा है। इस मामले पर कांग्रेस पार्टी ने भारतीय राष्ट्रीय विद्यार्थी संगठन (NSUI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष कन्हैया कुमार को पहले से ही काम पर लगा रखा है। कन्हैया ने इसी मामले पर बिहार में पदयात्रा की। महागठबंधन से इतर जन सुराज पार्टी के प्रणेता प्रशांत किशोर तो अपनी पदयात्रा के शुरुआत से ही पलायन रोकने की गारंटी लोगों को दे रहे हैं। आश्चर्य यह कि बिहार में सत्तारूढ़ एनडीए गवर्नमेंट ने इस रोजगार की दिशा में मौजूदा विधानसभा की अब तक की अवधि में बांटी गई सरकारी नौकरियों को अपने बताने-गिनाने वाली उपलब्धियों में टाप पर रखा है।
लालू को मिल गया बड़ा चुनावी मुद्दा
आरजेडी के पुनर्निर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव
रोग और बुढ़ापे के बावजूद इस बार
एक्टिव दिख रहे हैं
। उनके पुत्र और दो बार बिहार के डिप्टी
मुख्यमंत्री रहे तेजस्वी यादव के पास एनडीए की बखिया उधेड़ने के लिए अपराध,
करप्शन जैसे बड़े-बड़े
मामले हैं
। पर, लालू यादव का
मामला सबसे अलग है
। लालू को
मामला तलाशना नहीं पड़ा
। 2015 की तरह इस बार भी आरएसएस ने बैठे-बिठाए लालू को
मामला थमा दिया है
। लालू अपने अब तक के आजमाएं
मामले और रणनीति पर ही भरोसा कर रहे हैं
। लालू ने 2015 में जिस
मामले पर एनडीए को ढेर कर दिया था, उसे ही वे इस बार भी ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल करेंगे
। वह
मामला है संविधान और उससे जुड़ा आरक्षण
। सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर बिहार में जातिवाद की जड़ें पाताल तक पहुंचाने वाले लालू यादव आरक्षण और संविधान के सहारे अपना दांव चलते रहे हैं
। इसमें उन्हें
बीजेपी के मातृ संगठन आरएसएस से
सहायता मिलती रही है
। आरएसएस से जुड़ा कोई बड़ा
आदमी जब भी आरक्षण और संविधान के संदर्भ में कोई बात कहता है, लालू उसे फुर्र से ले उड़ते हैं
।
लालू का मामला 2015 में कारगर रहा
लालू यादव और नीतीश कुमार (आरजेडी-जेडीयू) ने 2015 का चुनाव महागठबंधन बना कर लड़ा। नरेंद्र मोदी को पीएम बनाए जाने के प्रस्ताव पर भड़के नीतीश ने 2014 में उनके पीएम बनते ही 10 वर्ष पुरानी दोस्ती बीजेपी से तोड़ कर अपने धुर विरोधी लालू से हाथ मिला लिया था। 2015 में विधानसभा चुनाव के दौरान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत बिहार दौरे पर आए तो आरक्षण के बारे में एक ऐसी बात कह दी कि लालू ने उसे बड़ा मामला बना लिया। बिहार की सत्ता से एनडीए की विदाई हो गई। हालांकि नीतीश कुमार की लालू से दोस्ती महज दो वर्ष तक ही टिकी। नीतीश ने फिर बीजेपी से हाथ मिला लिया और एनडीए के मुख्यमंत्री बन गए। लालू को अच्छी तरह पता है कि बिहार में जाति, संविधान और उससे जुड़ा आरक्षण उनके लिए एवरग्रीन मामले हैं। इस बार भी उन्हें इन मुद्दों को आजमाने का मौका आरएसएस ने लालू यादव को दे दिया है।
RSS ने फिर दे दिया लालू को मौका
वर्ष 2015 में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने
बोला था कि
समय आ गया है, अब आरक्षण की समीक्षा की जानी चाहिए
। इस बार संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने
बोला है कि संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ को हटाने की
आवश्यकता है
। भागवत के बयान को लालू ने तब यह कह कर प्रचारित किया था कि
बीजेपी आरक्षण को
समाप्त करना चाहती है
। इसमें उन्हें
सफलता भी मिल गई
। बिहार की सत्ता पर महागठबंधन काबिज हो गया था
। होसबोले के बयान पर भी लालू ने जिस तेवर का परिचय दिया है, उससे लगता है कि वे विधानसभा चुनाव में इसे भुनाे की जरूर
प्रयास करेंगे
। लालू ने
बोला है- ‘देश के सबसे बड़े जातिवादी और नफरती संगठन RSS ने संविधान बदलने की बात कही है
। इनकी इतनी
हौसला नहीं कि संविधान और आरक्षण की तरफ़ आँख उठाकर देख सकें
। अन्यायी चरित्र के लोगों के मन
और विचार में लोकतंत्र एवं बाबा साहेब के संविधान के प्रति इतनी घृणा क्यों है?’ लालू के इस बयान से साफ है कि इस बार भी चुनाव में वे इसे भुनाने से नहीं चूकेंगे
।
विपक्ष संविधान को लेकर हमलावर
विपक्ष को बीजेपी से सविधान पर खतरे का भय सताता रहा है। हालांकि यह भी सच है कि दो कार्यकाल पूरी कर चुकी केंद्र की भाजपानीत गवर्नमेंट तीसरी बार सत्ता में आने के बावजूद ऐसा कुछ नहीं किया है, जिससे संविधान पर विपक्ष की चिंता समझ में आए। हालिया लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी समेत इण्डिया ब्लाक के तमाम दलों ने बीजेपी से संविधान पर खतरे की संभावना जताई थी। उनके इस नैरेटिव का उन्हें सुफल भी मिला। सत्ता तो नहीं मिली, लेकिन संसद में सीटें बढ़ गईं। तब से ही विपक्ष राज्यों के चुनाव में इसे मामला बनाता रहा है। कांग्रेस पार्टी नेता राहुल गांधी तो संविधान की लाल पुस्तक हमेशा साथ लेकर घूमते हैं। बिहार में कई आयोजन संविधान को लेकर कांग्रेस पार्टी कर चुकी है।