क्या बिहार में कांग्रेस के लिए तिनका भी हिलाने में सक्षम नहीं है पप्पू यादव…
भाकपा माले विधायक महबूब आलम के बयान ने बिहार की राजनीति में नया तूफान खड़ा कर दिया है। उन्होंने साफ बोला कि पप्पू यादव महागठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। इसके उत्तर में पप्पू यादव ने भावुक बयान देते हुए बोला कि इतनी उपेक्षा के कारण उनका राजनीति छोड़ने का मन कर रहा है। बता दें कि पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने हाल ही में अपनी जन अधिकार पार्टी को कांग्रेस पार्टी में विलय किया है। लेकिन, अब धर्मसंकट में दिखते हैं।ऐसे में एक और प्रश्न बिहार की राजनीति में खड़ा हो रहा है कि क्या पप्पू यादव कांग्रेस पार्टी के गले पड़ गए हैं जिससे कांग्रेस पार्टी भी पीछा छुड़ाना चाहती है? यदि ऐसा नहीं है तो कांग्रेस पार्टी खुलकर पप्पू यादव के लिए आगे क्यों नहीं आती है। यह खास तब और हो जाता है जब पप्पू यादव सीधे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को अपना नेता बताते हैं, स्वयं को कांग्रेसी भी कहते हैं और उपेक्षा की बात भी करते हैं। आइये पहले जानते हैं कि महबूब आलम ने वास्तव क्या बोला है जिससे पप्पू यादव बहुत आहत दिखते हैं।

तेजस्वी-पप्पू विवाद और पुराना इतिहास
कांग्रेस की रणनीति: इस्तेमाल या बोझ?
वहीं, बिहार की राजनीति में पप्पू यादव भी तेजस्वी यादव के नेतृत्व को कई बार चुनौती देते हुए दिखते हैं। स्वयं को यादवों के नेता के तौर पर प्रस्तुत करते रहे हैं जिसको आरजेडी किसी भी हालात में स्वीकार करने को तैयार नहीं है। वहीं, कांग्रेस पार्टी ने उन्हें अपने पाले में लाक अपनी स्थिति मजबूत करने की प्रयास की, लेकिन महागठबंधन में राजद की प्रमुखता के कारण कांग्रेस पार्टी को सीट-बंटवारे में कमजोर किरदार मिल रही है। कुछ जानकारों का मानना है कि कांग्रेस पार्टी पप्पू की लोकप्रियता का लाभ उठाकर राजद से अधिक सीटें चाहती है। दूसरी ओर राजनीति के जानकार यह भी कहते हैं कि- कांग्रेस पार्टी पप्पू यादव को अपने साथ होने का आभास कराते हुए आरजेडी पर दबाव की राजनीति कर रही है। ऐसे में पप्पू यादव को कांग्रेस पार्टी इस्तेमाल कर रही है। कांग्रेस, पप्पू यादव का इस्तेमाल राजद पर दबाव बनाने के लिए कर रही है। यह इसलिए भी कि 2024 के लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव ने अपनी राजनीतिक ताकत दिखा दी थी।
पप्पू की बगावत और कांग्रेस पार्टी की दुविधा
एनडीए का तंज और राजनीतिक समीकरण
एनडीए इस स्थिति का लाभ उठाते हुए पप्पू यादव पर तंज कस रही है, उन्हें “डगरा पर का बैंगन” बता रही है। भाजपा का बोलना है कि पप्पू न तो कांग्रेस पार्टी के साथ पूरी तरह फिट बैठते हैं और न ही महागठबंधन में स्वीकार्य हैं। दूसरी ओर पप्पू यादव की पूर्णिया और कोसी-सीमांचल में मजबूत पकड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खासकर युवाओं और पिछड़े वर्गों में उनकी लोकप्रियता राजनीतिक तौर पर प्रासंगिक बनाए रखती है। हालांकि, फिर प्रश्न यही है कि क्या वह तेजस्वी यादव को चुनौती देते हुए महागटबंधन में रह पाएंगे।पप्पू यादव कांग्रेस पार्टी को अलग लड़ने के लिए भी कई बार प्रेरित करते दिखते हैं, शायद इसके लिए राहुल गांधी अभी तैयार नहीं दिखते हैं।
क्या है पप्पू यादव का भविष्य?
पप्पू यादव के सामने राजनीतिक धर्मसंकट है, जो उन्होंने अपने ताजा बयान में भी जाहिर किया है। यदि वह महागठबंधन में रहते हैं तो तेजस्वी यादव के नेतृत्व को स्वीकार करना होगा जो उनके लिए कठिन है। दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी के लिए वह एक ताकत भी हैं और चुनौती भी। यदि कांग्रेस पार्टी उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज करती है तो वह निर्दलीय या नयी पार्टी के साथ बगावत कर सकते हैं जैसा कि उन्होंने 2015 में जन अधिकार पार्टी बनाकर किया था। ऐसे में 2025 के विधानसभा चुनाव में पप्पू यादव की किरदार महागठबंधन की एकता और बिहार की राजनीति को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में प्रश्न यही है कि पप्पू यादव की राजनीति वास्तव में किस स्थिति में है। क्या वाकई में वह कांग्रेस पार्टी के लिए बोझ हैं या फिर वह इस्तेमाल हो रहे हैं, या फिर यह सब राजनीति के पेच भर हैं और आने वाले समय में फिर से सब एक हैं!

