स्वास्थ्य

भारतीयों ने विकसित किया एल्गोरिदम, दिमाग का हो सकेगा पुनर्निर्माण

तकनीक के सहारे चिकित्सा क्षेत्र एक और बड़ी उपलब्धि हासिल कर सकता है. भारतीय शोधकर्ताओं ने इन्सानी मस्तिष्क में उपस्थित न्यूरॉन्स, पार्किंसंस या अन्य विकार होने पर किस तरह का व्यवहार करते हैं इसे सुलझाते हुए एल्गोरिदम तैयार किया है. इसके जरिये न सिर्फ़ पार्किंसंस रोग की समय से पहले पहचान की जा सकेगी, बल्कि उसके उपचार में भी सहायता मिलेगी.
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बंगलूरू के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान (निम्हांस) के डॉक्टरों और गुवाहाटी के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के शोधकर्ताओं ने यह नया एल्गोरिदम विकसित किया है, जिसे यूनिक ब्रेन नेटवर्क आइडेंटिफिकेशन नंबर (यूबीएनआईएन) के रूप में पहचान दी है. यह स्वस्थ मनुष्यों और पार्किंसंस (पीडी) मरीजों के मस्तिष्क नेटवर्क को एनकोड करने के लिए डिजाइन किया है.

इस तरह की जा सकती है पहचान

 

शोधकर्ताओं ने इस डिजाइन की गुणवत्ता और रिज़ल्ट पता करने के लिए 180 पार्किंसंस मरीजों और 70 स्वस्थ व्यक्तियों पर शोध किया. इन सभी के मस्तिष्क का एमआरआई कराया गया और उनकी रिपोर्ट का विश्लेषण किया गया. शोधकर्ताओं ने अपने डिजाइन में मस्तिष्क के क्षेत्रों को नोड्स के रूप में दर्शाया है. प्रत्येक नोड के लिए कनेक्शन मानक भी तय किया है, जिससे प्राप्त संख्यात्मक अगुवाई यानी यूबीएनआईएन हर आदमी के लिए अलग तरह से देखा गया है. इसके जरिये पता चल सकता है कि आदमी को भविष्य में पार्किंसंस होने की कितनी आसार है. शोधकर्ताओं का बोलना है कि हिंदुस्तान की यह खोज आनें वाले दिनों में मानसिक रोग के विकास और अन्य बायोमार्कर की पहचान करने में सक्षम होगी.

दिमाग का हो सकेगा पुनर्निर्माण

 

आईआईटी गुवाहाटी बायोसाइंसेज और बायोइंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर डाक्टर नवीन गुप्ता ने कहा कि यूबीएनआईएन एक विशेष संख्या है जो नेटवर्क परिप्रेक्ष्य से प्रत्येक मानव मस्तिष्क की अद्वितीय विशेषताओं का अगुवाई करती है. दिलचस्प बात है कि हम मूल मस्तिष्क नेटवर्क के पुनर्निर्माण के लिए किसी भी आदमी के यूबीएनआईएन मूल्य की रिवर्स इंजीनियरिंग भी कर सकते हैं. यह यूबीएनआईएन एल्गोरिदम हर आदमी के मस्तिष्क नेटवर्क को कुशलतापूर्वक पहचानने और चिह्नित करने यानी एनकोड और डिकोड करने में सक्षम होगा.

देश में 5.80 लाख लोगों को पार्किंसंस

 

निम्हांस के डॉक्टरों ने कहा कि पार्किंसंस बीमारी एक न्यूरोडीजेनेरेटिव विकार है. कंपकंपी, कठोरता और धीमी गति इसके नैदानिक लक्षण होते हैं जो उम्र के साथ काफी गंभीर होने लगते हैं. हालांकि, साक्ष्य यह भी बताते हैं कि लक्षण दिखाई देने से पहले ही रोगी में न्यूरो डीजेनरेशन प्रारम्भ हो जाता है. अनुमान है कि हिंदुस्तान में करीब 5.80 लाख लोग पार्किंसंस रोग से ग्रस्त हैं, जिनकी संख्या आनें वाले दिनों में और अधिक हो सकती है.

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