इन तरीकों से मेंटल हेल्थ को रखे दुरुस्त
High Sensitivity and Mental Health: आज के दौर में मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। बड़ी संख्या में लोग एंजायटी और डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो अत्यधिक स्ट्रेस, अधिक वर्कलोड, अनहेल्दी खानपान और भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल के कारण ये बीमारियां बढ़ रही हैं। अब वैज्ञानिकों ने एक नयी स्टडी में चौंकाने वाला दावा किया है। नयी रिसर्च करने वाले एक्सपर्ट्स का बोलना है कि अधिक सेंसिटिव (High Sensitive) लोगों को एंजायटी, डिप्रेशन और पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) का खतरा अधिक होता है। हालांकि ये लोग कुछ उपायों से मेंटल हेल्थ को दुरुस्त रख सकते हैं।

के शोधकर्ताओं की रिसर्च में यह सामने आया है कि अत्यधिक संवेदनशील पर्सनैलिटी वाले लोग (Highly Sensitive People) मेंटल हेल्थ से जुड़ी परेशानियों जैसे- डिप्रेशन, चिंता और PTSD से अधिक प्रभावित हो जाते हैं। संवेदनशीलता लोगों का एक गुण होता है, जिसमें वे अपने वातावरण को बहुत गहराई से अनुभव करते हैं। ऐसे लोग मामूली रोशनी, आवाज या दूसरों की भावनाओं को भी गहराई से महसूस करते हैं। ऐसे आदमी भावनात्मक रूप से अधिक रिएक्शन देते हैं और मानसिक रूप से अधिक प्रभावित होते हैं। हाई सेंसिटिव होना बुराई नहीं है, लेकिन इससे मेंटल हेल्थ पर असर पड़ता है।
नई रिसर्च के मुताबिक अत्यधिक संवेदनशील लोगों में एंजायटी और डिप्रेशन ही नहीं, बल्कि एग्रोफोबिया यानी भीड़ या खुली स्थान का डर और अवॉइडेंट पर्सनालिटी डिसऑर्डर का रिस्क भी अन्य लोगों से अधिक होता है। इसका मतलब है कि संवेदनशीलता और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बीच सीधा संबंध होता है। शोध में यह भी पाया गया कि HSP लोगों को माइंडफुलनेस, रिलैक्सेशन टेक्निक और डीप ब्रीदिंग से मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स से बचने में काफी सहायता मिल सकती है। ये टेक्निक सेंसिटिव लोगों में न सिर्फ़ परेशानियां रोकने में मददगार है, बल्कि दोबारा मानसिक समस्याएं होने से भी रोक सकती हैं।
इस रिसर्च के लीड ऑथर टॉम फाल्कनस्टीन के मुताबिक अब तक मानसिक स्वास्थ्य में न्यूरोटिसिज्म जैसे पहलुओं पर ही ध्यान दिया गया है, लेकिन संवेदनशीलता को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए। दुनिया की करीब 31% जनसंख्या HSP मानी जाती है, इसलिए इसे इग्नोर नहीं किया जा सकता है। हाई सेंसिटिव लोग जितनी तेजी से नेगेटिव चीजों से प्रभावित होते हैं, उतनी ही तेजी से वे पॉजिटिव एक्सपीरिएंस और ट्रीटमेंट का भी लाभ ले सकते हैं। उनके लिए वातावरण की गुणवत्ता और सपोर्ट सिस्टम बहुत जरूरी है। यह स्टडी 33 भिन्न-भिन्न रिसर्च का एनालिसिस करने के बाद की गई है। इस स्टडी को क्लीनिकल साइकोलॉजिकल साइंस जर्नल में प्रकाशित किया गया है।

