अंतर्राष्ट्रीय

आने वाले समय में ये धमाके करने की तैयारी में है अमेरिका

1980 के दशक का विवादित मुकदमा बोफोर्स फिर से खुल सकता है. दरअसल, CBI ने अमेरिका को न्यायिक निवेदन भेजने वाली है. इससे पहले अमेरिकी जासूस माइकल हसनन ने एक टीवी चैनल पर बोला था कि वो इस बारे में जानकारी साझा करना चाहते हैं और इसी के बाद CBI की ओर से पहल की गई है. इस मुकदमा को 2011 में बंद कर दिया गया था और आरोपी राजीव गांधी और कात्रोची को बरी कर दिया गया था. लेकिन 13 वर्ष बाद फिर से खुलता हुआ दिखाई पड़ रहा है.

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जांच एजेसी CBI बोफोर्स मुद्दे मे निजी जासूस माइकल हर्शमैन से अमेरिका को एक न्यायिक निवेदन भेजेगा. ऑफिसरों ने यह जानकारी दी. हर्शमैन ने 1980 के दशक के 64 करोड़ रुपये के कथित बोफोर्स घूस काण्ड के बारे में अहम जानकारी भारतीय एजेंसियो के साथ साझा करने की ख़्वाहिश जताई की थी. CBI ने एक विशेष न्यायालय को भी इस बारे में सूचित किया है, जो मुद्दे में आगे की जांच के लिए एजेंसी की याचिका पर सुनवाई कर रही है.

क्या है मामला?

अधिकारियों ने कहा कि ‘लेटर रोगेटरी’ भेजने की प्रक्रिया इस वर्ष अक्टूबर में प्रारम्भ की गई थी. अमेरिका को औपचारिक निवेदन भेजने में लगभग 90 दिन लगने की आसार है. लेटर रोगेटरी एक लिखित निवेदन है जो एक राष्ट्र की न्यायालय द्वारा किसी आपराधिक मुद्दे की जीच में सहायता करने के लिए दूसरे राष्ट्र की न्यायालय को भेजा जाता है.

कौन है प्राइवेट जासूस?

‘फेयरफैक्स ग्रुप’ के प्रमुख माइकल हर्शमैन 2017 में निजी जासूसों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए हिंदुस्तान आए थे. वह कई मंचों पर दिखाई दिए और उन्होंने इल्जाम लगाया कि घोटाले की जांच कांग्रेस पार्टी गवर्नमेंट द्वारा पटरी से उतार दी गई थी. हर्शमैन ने बोला है कि वह CBI के साथ ब्योरा साझा करने के लिए तैयार है. CBI ने न्यायालय को सूचित किया कि वह जांच को फिर से खोलने की योजना बना रही है.

मामला 1980 के दशक में तत्कालीन कांग्रेस

विश्वनाथ प्रताप सिंह उस समय वित्तमंत्री थे जब राजीव गांधी के साथ में उनका विवाद हुआ. मुद्दा यह था कि विश्वनाथ प्रताप सिंह के पास यह सूचना थी कि कई हिंदुस्तानियों द्वारा विदेशी बैंकों में अकूत धन जमा करवाया गया है. इस पर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अमेरिका की एक जासूस संस्था फ़ेयरफ़ैक्स की नियुक्ति कर दी ताकि ऐसे हिंदुस्तानियों का पता लगाया जा सके. जब यह समाचार भारतीय मीडिया तक पहुँचा तो वह रोजाना इसे सिरमौर बनाकर पेश करने लगा. इस ‘ब्रेकिंग न्यूज’ का इस्तेमाल विपक्ष ने भी ख़ूब किया. उसने जनता तक यह संदेश पहुँचाया कि 60 करोड़ की दलाली में राजीव गांधी की गवर्नमेंट जांच से भाग रही थी. वीपी सिंह लोगों से कहते थे कि सेना के जवानों ने पहली बार बोफोर्स दागा तो इसने बैक फायर किया और अपने ही कई जवानों की जान ले ली. सिंह ने अपने अंदाज में भरी गर्मी में मोटरसाइकिल पर, गले में गमछा लपेट कर, एक सियासी कार्यकर्ता की तरह प्रचार किया. वे गांव के लोगों से सरल सा प्रश्न पूछते थे, क्या आपको अंदाजा है कि राजीव गांधी ने आपके घर में सेंध लगा दी है? फिर वे अपने कुर्ते की जेब से एक माचिस निकालते थे और लोगों को दिखाते थे. इस माचिस को देखो. जब आप अपनी बीड़ी, हुक्का या चूल्हा जलाने के लिए चार आने (25 पैसे) की माचिस खरीदते हैं तो एक चौथाई टैक्स के रूप में गवर्नमेंट को जाता है. गवर्नमेंट इस पैसे से स्कूल. अस्पताल, सड़क और नहर बनती है और सेना के लिए हथियार खरीदती है. यह आपका पैसा है. यदि कोई सेना के लिए हथियार खरीदने के नाम पर इसका कुछ हिस्सा चुरा ले तो क्या यह आपके घर में सेंध लगाना नहीं है? यह बताने के लिए कि सिर्फ़ राजीव गांधी ने ही यह घूस लिया है, वीपी सिंह एक कहानी सुनाते थे. एक सर्कस में एक शेर था, एक घोड़ा था, एक बैल और एक बिल्ली थी. वे आसपास रहते थे, एक रात किसी ने पिंजड़े खोल दिए और अगली सुबह सर्कस के मालिक को घोड़े और बैल का कंकाल मिला. क्या किसी को संदेह है कि उन्हें किसने खाया होगा? शेर ने या बिल्ली ने? यदि इतनी बड़ी धनराशि खाई गई है तो क्या किसी बेचारी बिल्ली ने खाया है? केवल शेर के जैसे राजीव ही खा सकते हैं. मुकदमा 2011 में बंद कर दिया गया था.

राजीव गांधी को बरी कर दिया गया था

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2004 में पूर्व पीएम राजीव गाधी को मुकदमा में बरी कर दिया था. उसने एक वर्ष बाद सियासी रूप से सवेदनशील इस मुद्दे में हिंदुजा बंधुओ समेत बाकी आरोपियों के विरुद्ध सभी आरोपों को खारिज कर दिया था. इटली के बिजनेसमैन और कथित तौर पर घूस मुद्दे में बिचौलिए ओत्तावियो क्वात्रोची को 2011 में एक न्यायालय ने बरी कर दिया था. न्यायालय ने CBI को अभियोजन वापस लेने की अनुमति दी थी.

बोफोर्स मुद्दे में कब क्या-क्या हुआ?

24 मार्च, 1986: हिंदुस्तान गवर्नमेंट और स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स के बीच 1,437 करोड़ रुपये का सौदा हुआ. यह सौदा भारतीय थल सेना को 155 एमएम की 400 होवित्जर तोप की सप्लाई के लिए हुआ था.

16 अप्रैल, 1987: स्वीडिश रेडियो ने दावा किया कि कंपनी ने सौदे के लिए हिंदुस्तान के वरिष्ठ राजनीतिज्ञों और रक्षा विभाग के अधिकारी को घूस दिए हैं. 60 करोड़ रुपये घूस देने का दावा किया गया.

20 अप्रैल, 1987: लोकसभा में राजीव गांधी ने कहा था कि न ही कोई घूस दी गई और न ही बीच में किसी बिचौलिये की किरदार थी.

6 अगस्त, 1987: रिश्वतखोरी के आरोपों की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय कमिटी (जेपीसी) का गठन हुआ. इसका नेतृत्व पूर्व केंद्रीय मंत्री बीशंकरानंद ने किया.

फरवरी 1988: मुद्दे की जांच के लिए हिंदुस्तान का एक जांच दल स्वीडन पहुंचा.

18 जुलाई, 1989: जेपीसी ने संसद को रिपोर्ट सौंपी.

26 दिसंबर, 1989: तत्कालीन पीएम वीपी सिंह के नेतृत्व वाली गवर्नमेंट ने बोफोर्स पर पाबंदी लगा दी.

22 जनवरी, 1990: CBI ने आपराधिक षडयंत्र, फर्जीवाड़ा और जालसाजी का मुद्दा दर्ज किया. मुद्दा एबी बोफोर्स के तत्कालीन अध्यक्ष मार्टिन आर्डबो, कथित बिचौलिये विन चड्ढा और हिंदुजा बंधुओं के विरुद्ध दर्ज हुआ.

दिसंबर 1992: मुद्दे में कम्पलेन को उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया और दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को पलट दिया.

फरवरी 1997: क्वात्रोकी के विरुद्ध गैर जमानती वॉरंट (एनबीडब्ल्यू) और रेड कॉर्नर नोटिस जारी की गई.

दिसंबर 2000: क्वात्रोकी को मलयेशिया में अरैस्ट कर लिया गया लेकिन बाद में जमानत दे दी गई. जमानत इस शर्त पर दी गई थी कि वह शहर नहीं छोड़ेगा.

फरवरी-मार्च 2004: न्यायालय ने स्वर्गीय राजीव गांधी और भटनागर को मुद्दे से बरी कर दिया. मलयेशिया के उच्चतम न्यायालय ने भी क्वात्रोकी के प्रत्यर्पण की हिंदुस्तान की मांग को खारिज कर दिया.

अप्रैल 2012: स्वीडन पुलिस ने बोला कि राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन द्वारा रिश्वतखोरी का कोई साक्ष्य नहीं है.

13, जुलाई 2013: हिंदुस्तान से फरार हुए क्वात्रोकी की मृत्यु हो गई. तब तक अन्य आरोपी जैसे भटनागर, चड्ढा और आर्डबो की भी मृत्यु हो गई थी.

1 नवंबर, 2018: CBI द्वारा उच्चतम न्यायालय में बोफोर्स घोटाले की जांच फिर से प्रारम्भ किए जाने की मांग को शीर्ष न्यायालय ने खारिज कर दिया है.

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