CEEW विशेषज्ञ ने दी चेतावनी, जलवायु के हिसाब से रणनीति नहीं बनाई तो होगी भारी तबाही…
एशिया के प्रमुख जलवायु थिंक टैंक में से एक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) ने आज जयपुर में “इरेटिक मानसून एंड अर्बल फ्लडिंग: चैलेंजेज एंड वे फॉरवर्ड” विषय पर एक राउंडटेबल डिस्कशन का आयोजन किया. सीईईडब्ल्यू के शोधकर्ताओं ने आंकड़ों के जरिए इस बात को सामने रखा कि कैसे बारिश का बदलता पैटर्न कई शहरों में बाढ़ और शहरी जलभराव जैसे जोखिमों को बढ़ा रहा है, जिसके निवारण के लिए तुरन्त तैयारियां करने जरूरत है.

इस रिपोर्ट का एक प्रमुख निष्कर्ष यह है कि हिंदुस्तान की कुल तहसीलों में से 55 फीसदी तहसीलों में पिछले दशक में दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा में 10 फीसदी से अधिक की वृद्धि सामने आई है, जबकि 11 फीसदी तहसीलों में जलवायु आधार रेखा (1982-2011) की तुलना में बारिश में गिरावट देखी गई है. राजस्थान, गुजरात, मध्य महाराष्ट्र और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में, जो पारंपरिक रूप से शुष्क क्षेत्रों में आते हैं, सांख्यिकीय रूप से बारिश में प्रमुख वृद्धि देखी गई. राजस्थान की लगभग 77 फीसदी तहसीलों में जून-सितंबर के दौरान होने वाली बारिश में वृद्धि, अक्सर 1982-2011 के जलवायु आधार रेखा से 30 फीसदी से अधिक, देखी गई और राज्य में भारी वर्षा के दिनों में भी सबसे तेज वृद्धि देखी गई, जिसके कारण हाल के सालों में बार-बार अचानक बाढ़ आने की घटनाएं सामने आई हैं. विशेष रूप से, हिंदुस्तान में 48 फीसदी तहसीलों में अकेले अक्टूबर में 10 फीसदी से अधिक बारिश दर्ज की गई, जो दक्षिण-पश्चिम मानसून की देरी से वापसी से जुड़ी है.
डॉ. विश्वास चितने, फेलो, सीईईडब्ल्यू ने कहा, “राजस्थान का अनुभव दिखाता है कि कैसे जलवायु बदलाव मानसून की कहानी को नए सिरे से लिख रहा है. ऐतिहासिक रूप से सूखे क्षेत्र अब कम समय में ही अधिक बारिश हो रही है, जिससे शहर और खेत दोनों ही डूब रहे हैं. इस एक नयी सामान्य स्थिति के लिए तैयार रहने के लिए, राजस्थान को जलवायु का बारीक अवलोकन करने वाले नेटवर्क, उच्च तकनीक वाली पूर्व चेतावनी प्रणाली और क्षेत्रीय स्तर की जलवायु कार्य योजनाओं में निवेश करना होगा, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्तर पर जलवायु अनुकूलन क्षमता का निर्माण करना है.”
राउंडटेबल चर्चा में शहरी बाढ़ का खतरा एक मुख्य विषय था. सीईईडब्ल्यू के विश्लेषण से पता चलता है कि हिंदुस्तान में निर्मित क्षेत्र (बिल्डअप एरिया) 2005-06 और 2022-23 के बीच लगभग 31 फीसदी (~2.5 मिलियन हेक्टेयर) बढ़ गया, जबकि आधे से अधिक शहरी जल निकाय कब्ज़ा का सामना कर रहे हैं. जैसे-जैसे बारिश की तीव्रता बढ़ती है, जल निकासी प्रणाली – जो पहले से ही अपर्याप्त है – तेजी से भर जाती है, जिससे जलभराव, बुनियादी ढांचे को हानि और आजीविका की नुकसान का जोखिम बढ़ जाता है.
नितिन बस्सी, फेलो, CEEW ने कहा, “बाढ़ और जलभराव अब कोई असामान्य घटनाएं नहीं हैं. ऐसी घटनाएं हमारी शहरी जीवन का हिस्सा बनती जा रही हैं, इसलिए जयपुर जैसे शहरों के लिए शहरी बाढ़ जोखिम प्रबंधन कार्य योजनाएं बनाना महत्वपूर्ण हो गया है. इन योजनाओं में बेहतर जल निकासी के लिए बारिश के आंकड़ों का दोबारा विश्लेषण करना और बाढ़ के ‘हॉट स्पॉट’ में महत्वपूर्ण कदम उठाने के लिए बाढ़ जोखिम सूचकांकों की गणना करना शामिल है. इससे प्रशासन को बेहतर योजना बनाने और ऐसी चरम जलवायु घटनाओं से लोगों के जीवन और आजीविका को बचाने में सहायता मिलेगी.”
शोधकर्ताओं ने सीईईडब्ल्यू के 2024 के एक शोध “डिकोडिंग इंडियाज चेंजिंग मानसून पैटर्न” के निष्कर्षों पर भी चर्चा की. इसमें दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-सितंबर) और उत्तर-पूर्व मानसून (अक्टूबर-दिसंबर) के दौरान बदलते मानसून का अखिल भारतीय, उप-जिला स्तर (तहसील स्तर) पर आकलन किया गया है. इसमें विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और हिंदुस्तान मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा समर्थित सांख्यिकीय सूचकांकों का इस्तेमाल करते हुए, पिछले दशक (2012-2022) के दौरान बारिश के पैटर्न में आए बदलावों को मापा गया है.

