अंतर्राष्ट्रीय

भारत स्वयं लंबे समय से आतंकवादी हिंसा का शिकार

India-Israel Relation: इजरायल और फिलिस्तीन के बीच टकराव काफी पुराना है यह संघर्ष हिंदुस्तान के लिए सदैव दुविधा का विषय रहा है हिंदुस्तान और इजराइल के रिश्तों पर नजर डालें तो ऐसा महसूस होता है हिंदुस्तान और इजराइल का रिश्ता ईसा से कई वर्ष पहले का है

यहूदी व्यापारी हजारों सालों से भारतीय राज्य केरल में रह रहे हैं भारत और इजराइल के बीच ईसाई धर्म और इस्लाम के उदय से पहले से ही संबंध रहे हैं इसका अधिकतर प्रमाण प्राचीन लेवंत साम्राज्य की सीमाओं के भीतर खुदाई में मिली भारतीय मूल की वस्तुओं में देखा जा सकता है वैसे भी दुनिया के सबसे पुराने धर्म हिंदू धर्म और यहूदी धर्म हैं, जो आज भी जीवित हैंNewsexpress24. Com india israel relation news india live latest india newsbreaking news today downloa

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एक तटस्थ अवलोकन से पता चलता है कि हिंदुस्तान ने तुष्टिकरण की राजनीति के कारण कभी भी इज़राइल का पक्ष नहीं लिया है ऐसी आशा थी कि 1947 में धर्म के आधार पर राष्ट्र के विभाजन के बाद हिंदुस्तान का रुख इजराइल की ओर हो जाएगा, लेकिन राष्ट्र में बड़ी संख्या में मुसलमानों के रहने के कारण हिंदुस्तान ऐसा कदम नहीं उठा सका कांग्रेस की मुसलमान समर्थक राजनीति के कारण हिंदुस्तान ने कभी भी इजराइल का समर्थन नहीं किया

अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त करने और एक संप्रभु देश बनने के बाद भी, हिंदुस्तान ने संयुक्त देश द्वारा फिलिस्तीन में इज़राइल राज्य की स्थापना के संयुक्त देश के प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया

गौरतलब है कि आधुनिक इजराइल राज्य की स्थापना 1948 में हुई थी, लेकिन हिंदुस्तान ने इसे तीन वर्ष तक मान्यता नहीं दी जबकि हिंदुस्तान फिलिस्तीन को मान्यता देने वाला पहला राष्ट्र था

इज़राइल को विश्व शक्तियों द्वारा मान्यता दिए जाने के लगभग तीन वर्ष बाद 1950 में हिंदुस्तान ने इज़राइल को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति और कांग्रेस पार्टी में मुसलमान पूर्वाग्रह के कारण हिंदुस्तान और इज़राइल के बीच राजनयिक संबंध 1992 तक निलंबित रहे इससे सियासी संबंध स्थापित नहीं हो सके

1992 में, कांग्रेस पार्टी में नेहरू-गांधी परिवार के बाहर से राष्ट्र का नेतृत्व आने के बाद, पीवी नरसिम्हा राव गवर्नमेंट ने पहली बार इज़राइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए और ऑयल अवीव में भारतीय दूतावास खोला राजनयिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए, इज़राइल ने हिंदुस्तान की राजधानी नयी दिल्ली में अपना दूतावास भी खोला इसके अतिरिक्त, इज़राइल ने हिंदुस्तान के मुंबई और बैंगलोर में अपने महावाणिज्य दूतावास स्थापित किए

गौरतलब है कि हिंदुस्तान की बेरूखी के बावजूद इजराइल ने हमेशा हिंदुस्तान का साथ दिया है 1971 के युद्ध के दौरान इजराइल ने हिंदुस्तान को बहुत अहम खुफिया जानकारी दी थी 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी इज़राइल ने जरूरी खुफिया जानकारी प्रदान की थी

ऐसे मुश्किल समय में इजराइल ने हिंदुस्तान को बहुत जरूरी पीएनजी (प्रिसिजन गाइडेड म्यूनिशन) की आपूर्ति की है उस समय दुनिया में सिर्फ़ दो ही राष्ट्र थे जो हिंदुस्तान को सटीक-निर्देशित युद्ध सामग्री प्रदान करते थे, एक दक्षिण अफ्रीका और दूसरा इज़राइल यह वही हथियार है, जिसकी सहायता से पाक के सबसे मजबूत बंकरों को हवाई हमले से नष्ट किया जा सकता है

1992 में राजनीतिक/राजनयिक संबंधों की स्थापना के बाद भी हिंदुस्तान और इजराइल के बीच संबंध बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते रिश्ते अच्छे न हो पाने का कारण हिंदुस्तान ही था क्योंकि 2004 से 2014 तक राष्ट्र में कांग्रेस पार्टी की ही गवर्नमेंट थी और वोट बैंक की राजनीति के कारण कांग्रेस पार्टी गवर्नमेंट इजराइल को अधिक महत्व नहीं देना चाहती थी

2014 में नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद हिंदुस्तान और इजराइल के बीच संबंधों में तेजी से सुधार हुआ है हैरानी की बात यह है कि जब हिंदुस्तान के इजरायल के साथ अच्छे संबंध थे तो कुछ अरब राष्ट्रों ने इसका विरोध किया था, लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ऐसा नहीं हुआ

दरअसल, जैसे-जैसे हिंदुस्तान और इजराइल के संबंध मजबूत होते गए, वैसे-वैसे हिंदुस्तान और अरब राष्ट्रों के संबंध भी मजबूत होते गए संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब समेत कई मुसलमान राष्ट्रों ने भारतीय पीएम मोदी को अपने राष्ट्र का सर्वोच्च सम्मान दिया इस प्रकार, इसे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी टीम की कूटनीतिक कामयाबी बोला जा सकता है कि उन्होंने न सिर्फ़ इज़राइल के साथ बहुत अच्छे संबंध बनाए हैं, बल्कि अरब राष्ट्रों के साथ भी ऐसे संबंध स्थापित किए हैं जो पहले कभी नहीं थे

2017 में, जब भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इज़राइल का दौरा किया, तो भारत-इज़राइल संबंध चरम पर पहुंच गए

दोनों राष्ट्रों के अस्तित्व में आने और स्वतंत्र होने के बाद यह पहली बार था कि किसी भारतीय प्रधान मंत्री ने इज़राइल का दौरा किया था इजराइल ने इस यात्रा को काफी महत्व दिया और पीएम का भव्य स्वागत किया गया

इस बीच सात अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये पहले जब भी कोई भारतीय राजनेता इजरायल जाता था (प्रधानमंत्री कभी नहीं) तो उसे फिलिस्तीन भी जाना होता था, लेकिन पीएम मोदी ने उस परंपरा को भी तोड़ दिया

प्रधानमंत्री मोदी इजराइल तो गए लेकिन फिलिस्तीन नहीं गए, लेकिन इसके चलते न तो हिंदुस्तान के किसी मुसलमान राष्ट्र से संबंध खराब हुए और न ही किसी ने इसका विरोध किया आज हिंदुस्तान और इजराइल के संबंध बहुत अच्छे हैं

रूस के बाद, इज़राइल हिंदुस्तान का रक्षा हथियारों और गोला-बारूद का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है इजराइल के लगभग 43 प्रतिशत रक्षा उपकरण और आपूर्ति हिंदुस्तान को मिलती है यानी हिंदुस्तान इजराइल के रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा ग्राहक है भारत इजराइल का व्यापार करीब 9 अरब $ का है

ऐसे में मौजूदा हमास-इजराइल संघर्ष में हिंदुस्तान ने बहुत साफ संकेत दिए हैं प्रधानमंत्री ने अपने ट्वीट में आतंकवादी हमले के पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त की और इजराइल को समर्थन दिया, जिसकी मानवीय दृष्टिकोण से बहुत आवश्यकता थी

जिस तरह से हमास के लड़ाकों ने इजराइल की सीमा में घुसपैठ कर एकतरफा नरसंहार को अंजाम दिया, वह सरासर आतंकी घटना है, जिसकी मानवीय आधार पर आलोचना की जानी चाहिए

भारत स्वयं लंबे समय से आतंकी अत्याचार का शिकार रहा है वह स्वयं इस्लामिक चरमपंथी अत्याचार से लड़ रहे हैं भारत इस बात को भली-भांति समझने लगा है और कहने का साहस भी करने लगा है अमेरिका समेत ज्यादातर यूरोपीय राष्ट्र इजराइल के साथ हैं

हमास द्वारा प्रारम्भ किए गए इस संघर्ष में एक बार फिर इजरायल की जीत होगी और फिलिस्तीन की सीमाएं निश्चित रूप से और कम हो जाएंगी जी हां, हिंदुस्तान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर साफ कर दिया है कि हिंदुस्तान फिलिस्तीन पर अपने पुराने रुख पर कायम है कोई परिवर्तन नहीं हुआ है

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