जानिए, क्यों नाकाम हुआ था रूस का भारत को हथियाने का सपना…
India-Russia Relations and The Great Game Story: पीएम मोदी रूस के दो दिवसीय दौरे पर हैं. रूस और हिंदुस्तान का रिश्ता किसी से छिपा नहीं है. हिंदुस्तान और रूस की एतिहासिक साझेदारी दशकों से चली आ रही है. मगर क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब रूस हिंदुस्तान पर जीत हासिल करने के स्वप्न देख रहा था. रूस ने एक बार नहीं बल्कि चार बार हिंदुस्तान पर आक्रमण करने का प्लान बनाया. मगर परिस्थितियों ने रूस का साथ नहीं दिया और हर बार ये प्लान कैसिंल हो गया.

कल्पना कीजिए कि यदि रूस का ये प्लान सफल होता तो आज हिंदुस्तान में अंग्रेजी की बजाए रूसी भाषा बोली जाती. हालांकि हिंदुस्तान पर कब्जा करने के बाद रूस सोने की इस चिड़िया को गुलाम बनाना चाहता था या नहीं? ये प्रश्न आज भी इतिहासकारों के बीच बहस का विषय बना हुआ है. तो आइए हम आपको हिंदुस्तान पर धावा करने वाले इरादे से रूबरू करवाते हैं.
नेपोलियन से मांगी मदद
रूस के जहन में आक्रमण का पहला ख्याल 18वीं शताब्दी की आरंभ में आया था. ये वो समय था जब ब्रिटिश हुकूमत हिंदुस्तान में पैर जमाने की प्रयास में जुटी थी. रूस के राजा जार पॉल प्रथम ने फ्रांस के राजा नेपोलियन को एक प्रस्ताव भेजा. इस प्रस्ताव के अनुसार 70,000 रूसी और फ्रांसीसी सैनिक मिलकर हिंदुस्तान पर आक्रमण करते और ब्रिटिशर्स को यहां से खदेड़ देते. हालांकि नेपोलियन ने इस ऑफर को ठुकरा दिया. ऐसे में जार पौल प्रथम ने 22,000 सैनिकों के साथ आधे हिंदुस्तान पर कब्जा करने का खाका तैयार किया. मगर रास्ते में रूस के कई सैनिक मारे गए और जार पॉल प्रथम का रूस में ही हत्या कर दिया गया.
पर्शियन साम्राज्य बना गेम चेंजर
रूस के अगले राजा अलेक्जेंडर प्रथम नेपोलियन के साथ संधि करने में सफल रहे. दोनों राष्ट्रों ने पर्शियन साम्राज्य (वर्तमान में ईरान) और अफगानिस्तान के रास्ते हिंदुस्तान पर आक्रमण करने का प्लान बनाया. हालांकि रूस के पहले हमले की भनक हिंदुस्तान में उपस्थित ब्रिटिशर्स को लग चुकी थी और ब्रितानियों ने भी पर्शियन साम्राज्य के साथ संधि कर ली थी. ऐसे में पर्शिया ने रूसी और फ्रांसीसी सैनिकों को अपने राष्ट्र से गुजरने पर रोक लगा दी. लिहाजा गुस्से में आकर नेपोलियन ने रूस पर ही धावा बोल दिया और मॉसको को बुरी तरह से तबाह कर दिया.
ओटोमन साम्राज्य ने जीता क्रीमिया
नेपोलियन के हमले से उबरने में रूस को 40 वर्ष लग गए. ये समय था 1850 का. हिंदुस्तान में 1857 की क्रांति की नींव रखी जा रही थी. इसी बीच रूसी सेना के जनरल अलेक्जेंडर दुहामिल पर्शिया को मनाने में सफल हो गए. रूस के राजा जार निकोलस प्रथम ने हिंदुस्तान पर हमले को हरी झंडी दिखा दी. मगर इसी बीच ओटोमन साम्राज्य ने क्रीमिया पर धावा कर दिया. रूस ये युद्ध हार गया और उसने हिंदुस्तान पर धावा करने के प्लान को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया.
बफर जोन बना अफगानिस्तान
1855 में रूसी सेना के अगले जनरल क्रुलैव ने हिंदुस्तान पर हमले का फिर से प्लान बनाया. दरअसल रूस और हिंदुस्तान के रास्ते में हिन्दूकुश पर्वत उपस्थित हैं. जिसके कारण बड़ी संख्या में रूसी सैनिकों का हिंदुस्तान पहुंचना नामुमकिन होता था. कई रूसी सैनिकों की रास्ते में ही मृत्यु हो जाती थी. ऐसे में क्रुलैव ने रूस के राजा जार अलेक्जेंडर द्वितीय को सुझाव दिया कि कम सैनिकों के साथ रूसी सेना अफगानिस्तान जाएगी और वहां के आदिवासी लोगों को युद्ध के पैंतरे सिखाकर हिंदुस्तान पर धावा करेगी. हालांकि इसी दौरान ब्रिटिश हुकूमत ने भी अफगानिस्तान पर धावा कर दिया और अफगानिस्तान एक बफर जोन बन गया.

