अंतर्राष्ट्रीय

OPINION : US के टैरिफ से डगमगा गए इस देश के कदम

नरेंद्र मोदी जब पिछली बार वाशिंगटन डीसी गए थे, तब से लेकर अब तक बहुत कुछ बदल चुका है जून 2024 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के निमंत्रण पर मोदी अमेरिका के दौरे पर गए थे उस दौरान व्हाइट हाउस की तरफ से ध्यान से चुनी गई वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक पाकिस्तानी-अमेरिकी रिपोर्टर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान “भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव” का मामला उठाकर पीएम को “शर्मिंदा” करने की प्रयास की थी पश्चिमी मीडिया की गुंडागर्दी का ये एक नमूना भर था

08 02 2025 donald trump news 23881167

WhatsApp Group Join Now

ये तो उस समय की बात है तब शायद दुनिया को पूरी तरह से पता नहीं था कि अमेरिका के ग्लोबलिस्ट “लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा” की आड़ में राष्ट्रवादी नेताओं के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के लिए किस तरह के हथकंडे अपनाते हैं और कैसे अपने मकसद को हासिल करने के लिए वो ग्लोबल मीडिया को अपने हिसाब से चलाते हैं

डीप स्टेट आज भी अपने जख्मों को चाट रहा है डीप स्टेट के एजेंडे को आगे बढ़ाने और उसके प्रोग्रेसिव एजेंडे को लागू करने के लिए दशकों से जिन संस्थाओं को स्थापित किया गया था, वे अब बिना सिर के मुर्गियों की तरह इधर-उधर भाग रही हैं

ट्रंप के कहने पर एलन मस्क और उनकी टीम ने USAID पर जो वार किया, उसने विदेशी हस्तक्षेप के अड्डे और उसके विभिन्न अंगों के बीच की रस्सी काट दी इससे ग्लोबलिस्ट गुस्से से पागल हो गए हैं

चुनावों के नतीजे होते हैं आज हम अमेरिका में जो देख रहे हैं, वह एक चुनावी लोकतंत्र की सीमा के भीतर एक रूढ़िवादी क्रांति से कम नहीं है और इस क्रांति का असर एक साथ महसूस किया जा रहा है

उदाहरण के लिए, हिंदुस्तान में सुबह-सुबह मोदी-ट्रंप प्रेस कॉन्फ्रेंस को देखते हुए, मैंने देखा कि मोदी-ट्रंप प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान डीप स्टेट के एजेंडे से प्रेरित प्रश्न कम थे मोदी ने पत्रकारों के लिए अपनी झिझक को साफ रूप से दरकिनार कर दिया था प्रश्न जानकारी लेने के लिए थे, न कि किसी खास एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए डीसी दलदल की सफाई रंग ला रही है

ट्रंप से बांग्लादेश की घटनाओं और जारी संकट के बारे में भी पूछा गया उन्होंने कहा, “मैं बांग्लादेश को प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी पर छोड़ दूंगा” क्या वह प्रश्न का जिक्र कर रहे थे, न कि स्वयं मामले का? शायद लेकिन यह बदली हुई परिस्थितियों और द्विपक्षीय संबंधों में विश्वास की बहाली का संकेत था, जिसे बाद के बाइडेन सालों (या जो कोई भी बूढ़े राष्ट्रपति के नाम पर प्रभारी थे) में अनगिनत प्रहार झेलने पड़े

अमेरिका से रक्षा आपूर्ति में ‘सप्लाई चेन’ के मुद्दों का हवाला देते हुए जानबूझकर देरी की गई, क्वाड बैठक स्थगित कर दी गई, मोदी की यात्रा से ठीक पहले व्हाइट हाउस के अंदर एक गुप्त ‘बैठक’ के लिए खालिस्तानियों को आमंत्रित किया गया, भारतीय खुफिया एजेंसियों को न्यूयॉर्क स्थित एक खालिस्तानी आतंकी के कथित “अंतरराष्ट्रीय दमन” को लेकर निशाना बनाया गया और बाइडेन के इन्साफ विभाग ने एक भारतीय व्यवसायी को गुनेहगार ठहराया, एक ऐसी कार्रवाई जिस पर अब छह अमेरिकी सांसदों ने प्रश्न उठाए हैं

यह पहले से ही एक अलग दुनिया है ट्रंप की जीत ने वोक विचारधारा को करारा झटका दिया है और कॉरपोरेट अमेरिका अब उनके सुर में सुर मिला रहा है गूगल ने अपने कैलेंडर से प्राइड मंथ, ब्लैक हिस्ट्री मंथ और इस तरह के दूसरे ‘डायवर्सिटी हॉलिडे’ चुपचाप हटा दिए हैं इससे साफ है कि वोक कल्चर के अजेंडे को पलट दिया गया है मार्क जुकरबर्ग की कंपनी मेटा अपने सोशल मीडिया ऐप्स से ‘फैक्ट-चेकिंग’ प्रोग्राम बंद कर रही है वहीं जेपी मॉर्गन चेस जैसी कंपनियां DEI मैकेनिज्म को वापस ले रही हैं

इस लहर का असर यूरोप तक में देखने को मिल रहा है वहां दक्षिणपंथी पार्टियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं मिसाल के तौर पर जर्मनी में, AfD पार्टी की चुनौती को कम करने के लिए, जर्मन चांसलर ओलाफ शोल्ज ने एक अफगान शरणार्थी द्वारा किए गए आतंकवादी हमले के बाद प्रवासियों को राष्ट्र से निकालने का आह्वान किया है कुछ समय पहले तक ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता था

26/11 के मुंबई आतंकवादी हमले के आरोपी तहव्वुर राणा को हिंदुस्तान प्रत्यर्पित करने की घोषणा करते हुए, ट्रंप ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान खालिस्तानी अलगाववादियों और अमेरिकी धरती से हिंदुस्तान के विरुद्ध विनाशकारी गतिविधियों को अंजाम देने वाले दूसरे असामाजिक तत्वों पर भी दो टूक बात की

“मुझे नहीं लगता कि बाइडेन प्रशासन के साथ हिंदुस्तान के अच्छे संबंध थे… हिंदुस्तान और बाइडेन प्रशासन के बीच बहुत सी ऐसी चीजें हुईं जो उचित नहीं थीं हम एक बहुत ही घातक आदमी (तहव्वुर राणा) को तुरंत हिंदुस्तान वापस भेज रहे हैं आगे और भी लोग भेजे जाएंगे क्योंकि हमारे पास ऐसे कई निवेदन आए हैं हम हिंदुस्तान के साथ क्राइम के मामलों पर काम कर रहे हैं और हम हिंदुस्तान के लिए इसे और बेहतर बनाना चाहते हैं…”

मोदी-ट्रंप मुलाकात के बाद जारी किए गए संयुक्त बयान में क्राइम के मामलों पर योगदान को और मजबूत करने की बात कही गई है “दोनों नेताओं ने गैरकानूनी अप्रवासन नेटवर्क, संगठित क्राइम गिरोह, जिनमें नार्को-आतंकवादी, मानव और हथियार स्मग्लर शामिल हैं, के साथ-साथ उन सभी तत्वों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने के लिए कानून प्रवर्तन योगदान को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई है जो जनता और राजनयिक सुरक्षा के साथ-साथ दोनों राष्ट्रों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरा हैं

दोनों नेताओं के बीच नजदीकी उनके हाव-भाव से भी साफ झलक रही थी ट्रंप ने व्हाइट हाउस में मोदी का हाथ मिलाते हुए गर्मजोशी से गले लगाया और कहा, “वी मिस यू, वी मिस यू अ लॉट” ट्रंप ऐसे नेता हैं जो अपनी बात खुलकर बोलना पसंद करते हैं और राजनयिक शिष्टाचार की परवाह कम करते हैं उन्होंने पीएम के लिए स्वयं कुर्सी खींची अपनी पुस्तक ‘आवर जर्नी टुगेदर’ गिफ्ट की जिस पर लिखा था, “मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, यू आर ग्रेट” इतना ही नहीं, उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मोदी को ‘स्पेशल मैन’ कहकर उनका परिचय कराया

यह नजदीकी इस बात का संकेत है कि दोनों राष्ट्रों के संबंध अब पूरी क्षमता के साथ आगे बढ़ेंगे पिछले प्रशासन की वजह से इन रिश्तों में कई अड़चनें आ रही थीं पिछली गवर्नमेंट को मजबूत और लोकप्रिय नेताओं वाले राष्ट्रवादी सरकारों से खतरा था और वो फंडिंग के जरिए अंदरूनी कलह पैदा करके उन पर लगाम लगाने की प्रयास कर रहे थे

DOGE और USAID नाम के दानव का पर्दाफाश होने की वजह से अब हमें पता चला है कि अमेरिका की गवर्नमेंट पूरे विश्व में प्रोग्रेसिव अजेंडे को बढ़ावा देने के लिए बड़ी धनराशि खर्च कर रही थी उनकी प्रयास उन राष्ट्रवादी सरकारों को काबू में करना था जो उनकी बात नहीं मानते थे इसके लिए NGO, दूसरे संगठनों और अपने करीबियों के जरिए सरकारें गिराने और लोकतांत्रिक आंदोलनों को अस्थिर करने की षड्यंत्र रची जा रही थी जो अमेरिका के रणनीतिक हितों के विरुद्ध थे

भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र अपनी घरेलू राजनीति में किसी भी तरह के बाहरी दखल को बर्दाश्त नहीं करते हैं खासतौर पर तब, जब विकास के नाम पर दुनिया पर अपनी बात थोपने की चाहत रखने वाले लोग नापाक एजेंडा लेकर घुसपैठ करते हैं ट्रंप को वोट देने वाले अमेरिकी नागरिकों ने उन्हें ये जनादेश दिया था कि वे उस सियासी वर्ग को सबक सिखाएँ जो स्वयं को ज़िम्मेदारी से मुक्त समझता है ऐसे में ट्रंप की अहमियत हमेशा से चली आ रही नौकरशाही के आकार को छोटा करना है जो आपस में ही साठगांठ करके सत्ता पर काबिज है उनकी दूसरी अहमियत अमेरिकी करदाताओं के पैसों की बर्बादी रोकना है दरअसल, अमेरिकी प्रशासन वामपंथी विचारधारा वाले गैर सरकारी संगठनों को विदेशों में अपनी बात फैलाने के लिए धन उपलब्ध कराता रहा है उनकी वजह से ही पूरे विश्व में सत्ता बदलाव के लिए अभियान चलाए जाते हैं और अमेरिका को लंबी लड़ाइयों में घसीटा जाता है

शायद यही वजह है कि यूरोपीय राष्ट्रों की तरह हिंदुस्तान में ट्रंप की वापसी को लेकर कोई घबराहट नहीं है हिंदुस्तान को भरोसा है कि उनके आने से दोनों राष्ट्रों के संबंध और बेहतर होंगे

अमेरिकी विदेश नीति प्रतिष्ठान दुनिया को अपने हिसाब से चलाने के लिए ‘लोकतंत्र समर्थक’ और ‘मानवाधिकारों’ की आड़ लेता रहा है ट्रंप के अमेरिका में इस तरह के दखल की कोई गुंजाइश नहीं है ट्रंप की विदेश नीति सौदेबाजी पर अधिक विश्वास करती है और इस लिहाज से भी यह हिंदुस्तान के अनुकूल है

ये बोलना कठिन है कि ट्रंप के पहले कुछ हफ़्ते ‘अमेरिका फर्स्ट’ या ‘अमेरिका मोर’ अप्रोच को दिखाते हैं, लेकिन हिंदुस्तान के साथ उनके हितों का मेल साफ दिखाई देता है भारत, अमेरिका का सबसे अहम रणनीतिक साझेदार बन सकता है

विदेश मंत्री मार्को रुबियो या राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड जैसे ट्रंप द्वारा नामित किए गए ज्यादातर लोग भारत-अमेरिका साझेदारी के प्रबल समर्थक हैं यही नहीं, वे हिंदुस्तान के सबसे बड़े शत्रु चीन को लेकर भी संदेह की निगाह से देखते हैं अमेरिकी सीनेटर के तौर पर रुबियो ने ‘यूएस-इंडिया डिफेंस कोऑपरेशन एक्ट’ पेश किया था इसका मकसद रक्षा साझेदारी और तकनीकी हस्तांतरण के मुद्दे में हिंदुस्तान को जापान और इज़राइल जैसे अमेरिका के मित्र राष्ट्रों के बराबर दर्जा देना था

हिंदू अमेरिकी तुलसी गबार्ड भी दोनों राष्ट्रों के बीच मजबूत संबंधों की पैरोकार रही हैं पीएम मोदी जब वाशिंगटन गए थे, तो ट्रंप की टीम में उनसे सबसे पहले मिलने वालों में गबार्ड भी शामिल थीं उनकी मुलाकात में आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और उभरते खतरों से निपटने के लिए खुफिया जानकारी बढ़ाने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई

मोदी के अमेरिका दौरे के तुरंत बाद, ट्रंप प्रशासन ने पॉल कपूर को दक्षिण एशियाई मामलों के लिए सहायक विदेश मंत्री नामित किया कपूर यूनाइटेड स्टेट्स नेवल पोस्टग्रेजुएट विद्यालय में डिपार्टमेंट ऑफ नेशनल सिक्योरिटी अफेयर्स के प्रोफेसर हैं वह भारत-अमेरिका के बीच घनिष्ठ संबंधों के प्रबल समर्थक हैं और पाक के सुरक्षा तंत्र के कटु आलोचक माने जाते हैं यदि कपूर की नियुक्ति हो जाती है, तो वे डोनाल्ड लू की स्थान लेंगे और अमेरिकी विदेश मंत्रालय में ट्रंप के दक्षिण एशिया के लिए सबसे अहम आदमी होंगे

वाशिंगटन डीसी स्थित स्टिमसन सेंटर के क्रिस्टोफर क्लैरी के मुताबिक, बाइडेन के कार्यकाल की हिंदुस्तान नीति के आलोचक रहे कपूर, “भारत को अमेरिका के लिए शीर्ष स्तर के रणनीतिक संबंध के रूप में देखते हैं” और संभवतः “इस पद पर रहते हुए वे अपने किसी भी पूर्ववर्ती की तुलना में पाक को लेकर ज़्यादा कठोर रुख अपनाएँगे

इसका मतलब यह नहीं है कि रास्ते में कोई कठिन नहीं आएगी मोदी के साथ खड़े होकर ट्रंप ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ-साफ कह दिया कि हिंदुस्तान उन राष्ट्रों में शामिल है, जहाँ सबसे ज़्यादा टैरिफ हैं, जिन्हें वो “अन्यायपूर्ण” मानते हैं उनके मुताबिक, ये टैरिफ अमरीका की भारतीय बाज़ार तक पहुँच को सीमित करते हैं और “सच कहूँ तो ये एक बड़ी परेशानी है” अपनी ख़ास अंदाज़ में ट्रंप ने हिंदुस्तान पर “बदले में टैरिफ” लगाने का घोषणा किया और प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोला कि “भारत हम पर जो भी शुल्क लगाएगा, हम उन पर उतना ही शुल्क लगाएँगे” इसके उत्तर में मोदी ने कहा, “एक बात जिसकी मैं बहुत सराहना करता हूँ और राष्ट्रपति ट्रंप से सीखता हूँ, वो ये है कि वो अपने राष्ट्र के भलाई को सबसे ऊपर रखते हैं… उनकी तरह, मैं भी हर चीज़ से ऊपर हिंदुस्तान के राष्ट्रीय भलाई को रखता हूँ

हो सकता है कि ये बात आगे चलकर कठिन खड़ी करे इसके बावजूद दोनों राष्ट्रों के साझा बयान में “नए और निष्पक्ष व्यापार नियमों” के आधार पर “2025 के आखिर तक एक पारस्परिक रूप से लाभकारी, बहु-क्षेत्रीय द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA)” के पहले चरण पर वार्ता करने और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब $ तक पहुँचाने के बड़े लक्ष्य का ज़िक्र है

अपनी ब्रीफिंग में, हिंदुस्तान के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बोला कि टैरिफ का मामला “चर्चा में काफ़ी हद तक शामिल था” और “दोनों राष्ट्र वस्तुओं और सेवाओं के क्षेत्र में द्विपक्षीय व्यापार को मज़बूत बनाने के लिए एक समेकित दृष्टिकोण अपनाएँगे इसमें बाज़ार पहुँच बढ़ाना, टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करना और दोनों राष्ट्रों के बीच आपूर्ति शृंखला सामंजस्य को गहरा करना जैसे विषय शामिल होंगे

यहाँ से एक बात साफ़ होती है कि जब राष्ट्रवादी नेता अपने-अपने राष्ट्रों के हितों की “रक्षा” करने के लिए एक जैसे एजेंडे के साथ मिलते हैं, तो इसका नतीजा बिना किसी वैचारिक ढाँचे वाली लेन-देन की नीतियाँ बनने के रूप में सामने आता है, जो आश्चर्यजनक रूप से सफल हो सकती हैं हालाँकि हिंदुस्तान यह समझता है कि व्यापार के मुद्दे में ट्रंप के साथ लेन-देन करना होगा, लेकिन यह अन्य क्षेत्रों में साझेदारी को मज़बूत करने की संभावनाओं के रास्ते भी खोलता है ट्रंप अपने समर्थकों को दिखाने के लिए व्यापार में “जीत” के लिए इतने ज़्यादा बेताब हैं कि हो सकता है कि वो दूसरे रास्तों पर समझौता करने के लिए तैयार हो जाएँ

इसके अलावा, भारत, जो सुरक्षावाद पर अड़ा हुआ है, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का हिस्सा बनने के अवसरों को हाथ से गँवा सकता है क्योंकि राष्ट्र अब विविधता की तलाश में हैं ऐसे में यदि ट्रंप के दबाव में ही सही, हिंदुस्तान अपनी टैरिफ दरों में कमी करता है, तो यह कड़वी गोली हो सकती है जो भारतीय अर्थव्यवस्था को निगलने की आवश्यकता है

“परस्पर टैरिफ” पर इतना ज़्यादा ध्यान देते हुए हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि डीप स्टेट के ख़िलाफ़ ट्रंप की जंग से हिंदुस्तान के हितों को लाभ हुआ है और इससे सच्ची साझेदारी की नींव पड़ी है उदारवादी शब्दकोश में लेन-देन एक बुरा शब्द हो सकता है, लेकिन अमरीकी जनता के हितों का ध्यान रखने वाला लेन-देन करने वाला ट्रंप, USAID के उन कार्यों से थके हुए हिंदुस्तान के लिए कहीं ज़्यादा पसंदीदा और निष्ठावान साझेदार है, जिनका मकसद हिंदुस्तान की संप्रभुता को कमज़ोर करना है

Back to top button