हजारीबाग में मल्हार जाति के लोगों को जोड़ा जा रहा रोजगार से…
हजारीबाग। छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल की पारंपरिक ढोकरा कला अब झारखंड के हजारीबाग में मल्हार जाति के लोगों को रोजगार से जोड़ने का माध्यम बन गई है। हजारीबाग जिले के सारले गांव स्थित झारक्राफ्ट केंद्र में पिछले 15 वर्ष से मल्हार समुदाय के लोग डोकरा शिल्प का निर्माण कर रहे हैं। यहां तैयार की गई कलाकृतियों की मांग न केवल देशभर में है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार और कला प्रदर्शनियों में भी इनका खूब नाम हो रहा है। खेलो इण्डिया 2024 में इसी केंद्र से निर्मित 10000 ढोकरा कला को राष्ट्र भर के खिलाड़ियों को दिया गया था।
मल्हार जाति पारंपरिक रूप से घुमंतू जीवनशैली अपनाने वाली रही है। पहले ये लोग पीतल से बने घरेलू बर्तन जैसे सरई, पैला, डब्बू, छोलनी, और झंझारा बनाकर गांव-गांव घूम कर बेचते थे। लेकिन समय के साथ परिवर्तन आया और झारक्राफ्ट ने इन्हें डोकरा आर्ट से जोड़ा। ढोकरा, पीतल से तैयार की जाने वाली एक पारंपरिक आदिवासी शिल्प कला है, जिसमें विभिन्न आकृतियों को ढालकर सुन्दर कलाकृतियां बनाई जाती हैं।
समाप्त हो रही ढोकरा आर्ट
झारक्राफ्ट ने इन कारीगरों को प्रशिक्षित कर इस कला में दक्ष बनाया और फिर उन्हें रोजगार मौजूद कराया। कारीगर बब्बन मल्हार बताते हैं कि उनका परिवार पीढ़ियों से पीतल शिल्प में पारंगत रहा है, लेकिन ढोकरा आर्ट उन्होंने 15 वर्ष पहले प्रशिक्षण लेकर सीखा था। अब वह हर वर्ष लगभग 50 लोगों को इसकी ट्रेनिंग देते हैं। आज उनका पूरा परिवार इसी कार्य में जुटा है। झारक्राफ्ट उन्हें हर कलाकृति के लिए 300 से 500 रुपये तक की मजदूरी देता है, जिससे वे अपना परिवार चला पा रहे हैं।
वहीं कारीगर प्रदीप मल्हार बताते हैं कि वर्ष 2009 से वह लोग यहां ढोकरा कला से जुड़े हुए हैं। वह लोग प्रोडक्शन के साथ-साथ लोगों को ट्रेनिंग भी देते हैं। यह कला बहुत मेहनत का काम है, जिस कारण प्रशिक्षण पाने के बाद भी लोग यह कार्य नहीं कर पाते हैं। साथ ही गवर्नमेंट के द्वारा महज 15 दिनों का प्रश्न दिया जाता है ऐसे में साड़ी कलाओं में सीखना कठिन है। कलाकारों को इस बात का भी डर है कि आगे आने वाली पीढ़ी इस कला से दूर ना हो जाए।
कैसे बनती है ढोकरा कलाकृति
ढोकरा आर्ट बनाने की प्रक्रिया बहुत रोचक और श्रमसाध्य होती है। सबसे पहले मिट्टी से एक आकृति बनाई जाती है, फिर उस पर मोम के पतले धागों को लपेटा जाता है। मोम सूखने और कठोर होने के बाद पूरी आकृति को फिर से मिट्टी की परत से ढक दिया जाता है। इस परत में एक छोटा सा छेद रखा जाता है ताकि उसमें पिघला हुआ पीतल डाला जा सके। जब पीतल ठंडा होकर कठोर हो जाता है, तो मिट्टी को हटाकर अंदर से सुंदर और पारंपरिक डोकरा कलाकृति बाहर निकलती है। इसके बाद उसे पॉलिश कर बाजार में बिक्री के लिए भेजा जाता है।
इस तरह हजारीबाग में ढोकरा आर्ट न केवल परंपरा को जीवित रखे हुए है, बल्कि मल्हार जाति जैसे पारंपरिक कारीगर समुदाय को सम्मानजनक जीवन और स्थिर आजीविका भी दे रहा है। लेकिन कलाकारों को इस बात का डर है कि आगे आने वाली पीढ़ी इस कला से दूर ना हो जाए।

