SC के फ़ैसले के बाद चुनावी बांड पटाक्षेप पर ग़ुलाम मीडिया में पसरा सन्नाटा
लोकसभा चुनावों से ठीक पहले सर्वोच्च कोर्ट के आदेश पर आख़िरकार एसबीआई ने चुनावी बॉन्ड ख़रीद का विस्तृत डेटा न्यायालय को पेश कर ही दिया. साथ ही यह भी सार्वजनिक कर दिया कि इन इलेक्टोरल बांड के माध्यम से किस सियासी दल को कितने पैसे प्राप्त हुये. जैसा कि पहले भी होता आया है कि सत्ताधारी दल को ही प्रायः सर्वाधिक चंदा मिला करता है. इस बार भी सत्ताधारी दल यानी बीजेपी को ही सबसे अधिक चुनावी चंदा हासिल हुआ. परन्तु बात सिर्फ़ सर्वाधिक चंदा प्राप्त करने तक ही सीमित नहीं है. बल्कि इस लेनदेन के और भी कई ऐसे संदिग्ध पहलू हैं जिनके आधार पर विपक्ष बीजेपी पर यह कहकर हमलावर है कि बीजेपी द्वारा चुनावी बॉन्ड ख़रीद के नाम पर न सिर्फ़ ‘चंदे का धंधा ‘ यानी चंदा देदो -धंधा ले लो का अनैतिक खेल खेला गया है बल्कि कई ऐसी कंपनियों से भी चंदे ऐंठे गए हैं जिन पर पहले तो ईडी, आईटी या CBI द्वारा छापेमारी की गयी उसके फ़ौरन बाद ही इन्हीं कंपनियों ने इलेक्टोरल बांड ख़रीद लिए.

इलेक्टोरल बांड की ख़रीद होते ही इन पर की गयी ईडी, आईटी या CBI की कार्रवाही ठन्डे बस्ते में चली गयी.
विपक्ष का यह भी इल्जाम है कि इलेक्टोरल बांड ख़रीदने वाली कई कम्पनियाँ भी फ़र्ज़ी हैं. जबकि कई ऐसी कंपनियों ने भी चुनावी बॉन्ड ख़रीदे हैं जिनकी कमाई तो बहुत ही कम है परन्तु उन्होंने अपनी कमाई से कई गुना अधिक के बांड ख़रीदे. कांग्रेस पार्टी का इल्जाम है कि बीजेपी चंदा दो, धंधा लो, हफ़्ता वसूली, ठेका लो, घूस दो, मनी लॉन्ड्रिंग के लिए फर्ज़ी कंपनियां जैसी करप्ट नीतियां अपना रही है.
भारतीय स्टेट बैंक द्वारा मौजूद कराये गये डेटा के मुताबिक जिन कंपनियों ने इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे हैं उनमें फ़्यूचर गेमिंग और होटल सर्विसेज़, मेघा इंजीनियरिंग इंफ़्रा स्ट्रक्चर लिमिटेड, वेदांता लिमिटेड, लक्ष्मी मित्तल, भारती एयरटेल, डीएलएफ़ कामर्शियल डेवलपर्स, ग्रासिम इंडस्ट्रीज़, पीरामल एंटरप्राइज़ेज़, टोरेंट पावर, अपोलो टायर्स, एडलवाइस, पीवीआर, केवेंटर, सुला वाइन, वेलस्पन, और सन फ़ार्मा जैसी अनेक कंपनियां शामिल हैं. सबसे ज़्यादा क़ीमत के इलेक्टोरल बॉन्ड फ़्यूचर गेमिंग और होटल सर्विसेज़ और मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ़्रास्ट्रक्चर लिमिटेड द्वारा ख़रीदे गये हैं. फ़्यूचर गेमिंग और होटल सर्विसेज़ ने 1,368 करोड़ रुपये के बांड ख़रीदे हैं जबकि मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड द्वारा 966 करोड़ रुपये के चुनावी बांड ख़रीदे गये.
न खाऊंगा न खाने दूंगा का दंभ भरने वाली वर्तमान बीजेपी गवर्नमेंट 2017 में एक वित्त विधेयक के माध्यम से इस चुनावी बांड योजना को लाई थी जिसे 2018 में लागू कर दिया गया था. हालांकि भाजपा सहित कांग्रेस, एआईएडीएमके, बीआरएस, शिवसेना, टीडीपी, वाईएसआर कांग्रेस, डीएमके, जेडीएस, एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस, जेडीयू, आरजेडी, आप और सपा जैसी पार्टियों ने इलेक्टोरल बॉन्ड के माध्यम से राशि प्राप्त की है. परन्तु अप्रैल 2019 और जनवरी 2024 के बीच चुनावी बॉन्ड के माध्यम से बीजेपी को 6,060.51 करोड़ रुपये का सबसे अधिक चंदा हासिल हुआ है. सबसे अधिक रकम का बांड ख़रीदने वाली तमिलनाडु की कंपनी फ़्यूचर गेमिंग को 2019 में जितना फायदा हुआ था, इस कंपनी ने उसका छह गुना अधिक इलेक्टोरल बॉन्ड से चंदा दिया.
एक रिपोर्ट के मुताबिक 2022-23 में इस कंपनी को टैक्स देने के पहले 82 करोड़ का मुनाफ़ा हुआ था और इसने 328 करोड़ का चंदा दिया था. इसी कंपनी ने चार वर्ष में 1368 करोड़ के बॉन्ड ख़रीदे हैं. इसी तरह मेघा इंजीनियरिंग इंफ़्रास्ट्रक्चर लिमिटेड एमईसीएल ने भी 966 करोड़ के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे हैं. विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी का इल्जाम है कि ‘मेघा इंजीनियरिंग ने कलेश्वर लिफ़्ट इरिगेशन योजना के भीतर मेड गुडा बराज का निर्माण किया जिसके कई खंभों में दरारें पड़ गई हैं क्योंकि इसमें घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया है. और इस कम्पनी ने तेलंगाना की जनता का 1,00,000 करोड़ रुपया चोरी किया गया है. इलेक्टोरल बांड ख़रीद के माध्यम से हुये करप्शन के बाद सर्वोच्च कोर्ट द्वारा स्टेट बैंक के प्रति बरती गयी सख़्ती का नतीजा यह हुआ था कि 11 मार्च को ही स्टेट बैंक से निवेशकों का भरोसा टूटने लगा था तभी स्टेट बैंक के शेयर्स में दो फीसदी की गिरावट भी दर्ज की गयी थी.
सवाल यह है कि चुनावी चंदे के धंधे को लेकर उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले के बाद स्टेट बैंक इण्डिया के घुटनों पर आने,विपक्ष द्वारा इस विषय पर हमलावर होने और पूरे मुद्दे की उच्च स्तरीय जांच उच्चतम न्यायालय की नज़र से कराने और इसे दुनिया का सबसे बड़ा चुनावी चंदा भ्रष्टाचार बताने के बावजूद इसी मामले पर आख़िर भारतीय मीडिया को क्यों सांप सूंघ गया है? राष्ट्र का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार और उसपर मीडिया की ख़ामोशी, क्या इस बात का संकेत नहीं कि जो भारतीय मीडिया जहाँ सत्ता का गुणगान करने में कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ता वही उसकी कमियों,अनियमितताओं,अनैतिक आचरण तथा आर्थिक घोटाले पर भी पर्दा डालने में खुलकर सत्ता का साथ दे रहा है ?
कहना ग़लत नहीं होगा कि भारतीय मीडिया इस समय ह्रास, पतन और बेशर्मी के उत्कर्ष के दौर से गुज़र रहा है. क्या लोकतंत्र का स्वयंभू चौथा स्तंभ धराशायी हो चुका है? सत्ता के लिए दर्पण रुपी किरदार अदा करने वाली पत्रकारिता आज ‘सत्ता के ग़ुलाम’ की किरदार निभा रही है. यही वजह है कि सत्ता को आइना दिखने वाले अनेक कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार अपनी जॉब गंवा चुके हैं और अपने विभिन्न निजी सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर अपना कर्तव्य पूरी जवाबदेही से निभा रहे हैं. इलेक्टोरल बांड सम्बन्धी विस्तृत जानकारियां भी राष्ट्र को मुख्य धारा के मीडिया से नहीं बल्कि सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर एक्टिव अनेक कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारों की ही देन है.
यह पत्रकारिता के इसी ‘अंधकार मय युग ‘ की ही देन है कि अनेक टी वी एंकर पार्टी प्रवक्ता की किरदार अदा करते नज़र आ रहे हैं. आउट डोर रिपोर्टिंग में ‘पत्थरकारों ‘ द्वारा नागिन डांस किया जा रहा है. विपक्ष की ख़बरों को न सिर्फ़ ब्लैक आउट कर दिया गया है बल्कि प्रश्न भी विपक्ष से ही पूछे जा रहे हैं. एक पत्रकार की आवाज़ को दबाने के लिये पूरा का पूरा मीडिया हाउस ख़रीदा जा रहा है. न जाने कितने बाज़मीर पत्रकारों ने ग़ुलाम मीडिया हॉउस के साथ काम कर अपना ज़मीर बेचने से मना कर दिया है.
पार्टी विशेष के कई लोग और उनके शुभचिंतक उद्योगपति अपने अपने मीडिया हॉउस चलाकर सत्ता का गुणगान कर रहे हैं. करण थापर और विजय त्रिवेदी जैसे पत्रकारों ने एक दशक पूर्व ‘साहब ‘ को ऐसा दर्पण दिखाया कि साहब ने दर्पण देखना ही बंद कर दिया है . गोया सत्ता सिर्फ़ अपने ‘मन की बात’ कर इकतरफ़ा संवाद पर भरोसा कर रही है. और मुख्य धारा का मीडिया सत्ता के कवच की किरदार निभा रहा है. यही वजह है कि मणिपुर की घटना की ही तरह चुनावी बांड घोटाले पर भी उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले के बाद हुये पटाक्षेप पर ग़ुलाम मीडिया में पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ है.<!– और पढ़े…–>

