भारत की शक्ति का अंदाजा लगा चुका है अमेरिका, पीटर नवारो को सताने लगा भय…
Peter Navarro News: हिंदुस्तान और अमेरिका के बीच संबंध हमेशा से ही एक जटिल लेकिन रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा रहे हैं। एक तरफ दोनों राष्ट्र दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में रक्षा, तकनीक और व्यापार में योगदान बढ़ा रहे हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिकी प्रशासन, खासकर डोनाल्ड ट्रंप के ट्रेड एडवायजर पीटर नवारो की तीखी बयानबाजी और हिंदुस्तान पर लगाए गए 25% टैरिफ ने इस संबंध में एक नया तनाव पैदा कर दिया है। प्रश्न उठता है कि जब अमेरिका हिंदुस्तान को एक मजबूत सहयोगी मानता है, तो फिर यह टैरिफ वाली नफरत क्यों? और आखिर पीटर नवारो को हिंदुस्तान से क्या डर है?

भारत और अमेरिका के बीच संबंध पिछले कुछ दशकों में अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। पीएम मोदी के कई अमेरिकी दौरे और दोनों राष्ट्रों के बीच रक्षा, तकनीक और व्यापार में बढ़ते योगदान ने हिंदुस्तान को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक जरूरी साझेदार बनाया है। 2024-25 में अप्रैल से अगस्त तक अमेरिका हिंदुस्तान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया, जिसके साथ 53 अरब $ का व्यापार हुआ। यह आंकड़ा दर्शाता है कि दोनों राष्ट्र आर्थिक रूप से एक-दूसरे के लिए कितने जरूरी हैं।
अमेरिका की ट्रंप गवर्नमेंट ने भी जुलाई 2025 में हिंदुस्तान के साथ एक अंतरिम व्यापार समझौते की बात कही थी, जिसे दोनों राष्ट्रों के बीच लॉन्ग टर्म आर्थिक साझेदारी की दिशा में एक कदम माना गया। फिर भी उसी ट्रंप गवर्नमेंट के सलाहकार पीटर नवारो हिंदुस्तान को ‘टैरिफ का महाराजा’ और ‘क्रेमलिन के लिए लॉन्ड्रोमैट’ जैसे तीखे शब्दों से नवाज रहे हैं। आखिर यह विरोधाभास क्यों? पीटर नवारो (जो ट्रंप के अमेरिका फर्स्ट नीति के प्रमुख रणनीतिकार माने जाते हैं) ने हिंदुस्तान की टैरिफ नीतियों और रूस के साथ ऊर्जा संबंधों पर कड़ा रुख अपनाया है। नवारो का इल्जाम है कि हिंदुस्तान रियायती दरों पर रूसी ऑयल खरीदकर उसे रिफाइन कर फायदा कमा रहा है, जिससे रूस को यूक्रेन युद्ध में आर्थिक सहायता मिल रही है। उन्होंने हिंदुस्तान को यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा देने वाला तक कह डाला। इसके उत्तर में अमेरिका ने हिंदुस्तान पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया, जिससे कुल टैरिफ 50% तक पहुंच गया है।
नवारो का डर
नवारो की यह आलोचना उस समय आई जब हिंदुस्तान के विदेश मंत्री एस। जयशंकर ने रूस के साथ ऊर्जा संबंधों का बचाव करते हुए बोला कि हिंदुस्तान की ऑयल खरीद वैश्विक ऊर्जा बाजारों को स्थिर करने में सहायता करती है, और यह अमेरिका के निवेदन पर ही प्रारम्भ हुई थी। यह दोहरा रवैया अमेरिकी नीति की जटिलता को उजागर करता है, खासकर जब चीन, जो रूस का सबसे बड़ा ऑयल खरीदार है, पर ऐसी कोई कठोर कार्रवाई नहीं की गई। पीटर नवारो का हिंदुस्तान के प्रति यह रुख सिर्फ़ व्यापार घाटे या रूसी ऑयल की खरीद तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा जियो-पॉलिटिकल डर है। हिंदुस्तान की रूस और चीन के साथ बढ़ती नजदीकियां (खासकर BRICS जैसे मंचों पर) अमेरिका के लिए चिंता का विषय हैं। नवारो ने हिंदुस्तान को शी जिनपिंग के साथ नजदीकी बढ़ाने का इल्जाम भी लगाया है, जो अमेरिका की चीन को घेरने की रणनीति के लिए खतरा बन सकता है।
रूस-यूक्रेन के बीच शांति की राह
पीटर नवारो हिंदुस्तान को लेकर स्टैंड बदलते भी रहे हैं। उन्होंने पीएम मोदी की प्रशंसा भी की है। दिलचस्प बात यह है कि हिंदुस्तान पर 50 फीसद टैरिफ लगाने की वकालत करने वाले नवारो यह भी मानते हैं कि रूस और यूक्रेन के बीच शांति लाने में हिंदुस्तान की अहम किरदार हो सकती है। नवारो का बोलना है कि रूस-यूकेन के बीच शांति का रास्ता हिंदुस्तान से होकर गुजरता है। बता दें कि हिंदुस्तान कई मौकों पर रूस और यूक्रेन के बीच शांति की बात कर चुका है। साथ ही इसमें सक्रिय किरदार निभाने का ऑफर भी दे चुका है। बता दें कि हिंदुस्तान की विदेश नीति (जो गुट-निरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है) ने उसे वैश्विक मंच पर एक मजबूत खिलाड़ी बनाया है। रूस से ऑयल खरीद (जो 2022 से पहले नगण्य थी और अब कुल आयात का 35% है) और चीन के साथ बढ़ता व्यापार (2024 में 118.4 अरब डॉलर) हिंदुस्तान की आर्थिक और कूटनीतिक ताकत को दर्शाता है। यह स्थिति अमेरिका को डराती है कि यदि भारत, रूस और चीन का त्रिकोणीय गठजोड़ मजबूत हुआ, तो वैश्विक शक्ति संतुलन में अमेरिका की स्थिति कमजोर पड़ सकती है।

