ज्यादा स्कीन टाइम से हमारी आंखों पर बुरा असर
आजकल हम दिन के 10-12 घंटे लैपटॉप, कंप्यूटर, टीवी या टेलीफोन की स्क्रीन के सामने गुजारते हैं। अधिक स्कीन टाइम से हमारी आंखों पर बुरा असर होता है। हमारी आंखों में दर्द, आंखों के नीचे काले घेरे पड़ने लगते हैं।
ये तो हुई वो बात जिसे हम पहले से ही जानते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इलेक्ट्रोनिक स्क्रीन हमारी आंखों पर कैसे असर कर रही है। आखिर कैसे हमारी आंखें स्क्रीन की वजह से खराब हो जाती है। इस समाचार में हम आपको इन प्रश्नों के उत्तर देंगे।
हम जन्म से ही दूरदर्शी हैं
ब्रिटेन में ब्रैडफोर्ड यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर नीमा घोरबानी मोजराद का बोलना है कि ऑफिस मीटिंग हो या औनलाइन स्टडी फोन, लैपटॉप हर जीवन का अहम हिस्सा बन गया है। लेकिन इससे आंखों को बहुत हानि पहुंचता है। ऐसा इसलिए क्योंकि हम जन्म से ही दूरदर्शी हैं यानी हमें पास रखे समान की तुलना में दूर रखा सामान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हमारी आंखें पर्फेक्ट विजन पाने के लिए विजुअल इंवायरमेंट और जेनेटिक सिगनल्स पर प्रतिक्रिया करती हैं। लेकिन जिन लोगों को मायोपिया है, उनकी आंखें किसी तरह का एडजस्मेंट नहीं कर पाती और उनकी आंखें की लंबाई बढ़ती जाती है। सरल शब्दों में कहें तो लेंस और रेटिना के बीच की दूरी बढ़ने लगती है। असिस्टेंट प्रोफेसर नीमा मोजराद का बोलना है कि स्क्रीन देखने पर ये दूरी और बढ़ सकती है।
अब जानिए स्क्रीन आंखों को कैसे हानि पहुंचाती है…
जब हम किसी चीज पर पास से फोकस कर रहे होते हैं तो सिलिअरी मसल्स- जो लेंस के शेप के अनुसार एडजस्ट होते हैं, सिकुड़ जाती हैं। इससे लेंस का शेप अधिक स्फेरिकल (गोलाकार) होता है। ये किसी भी चीज पर फोकस करने में रेटिना की सहायता करता है। इसे सरल शब्दों में ऐसे समझें- सिलिअरी मसल्स पर अधिक बल पड़ने से वो फैलने लगते हैं। इससे लेंस को वापस फ्लैट आकार देने की आंख की क्षमता कमजोर हो जाती है।
इससे आंखों की पुतलियां भी बढ़ने लगती हैं, जिससे इसकी संरचना और रेटिना पर प्रकाश केंद्रित करने की क्षमता में स्थाई बदलाव हो सकता है। बढ़ी हुई आंखों की पुतलियों से दूर की चीजों को देखने पर फोकस रेटिना के सामने होता जिससे चीजें धुंधली दिखाई देती हैं।
हम अक्सर आंखों को स्कीन से निकले वाली ब्लू रे से बचने के लिए खास तरह का चश्मा पहन लेते हैं। लेकिन ये लाभ वाला नहीं होते।
स्क्रीन पर काम के दौरान आंखों को नहीं बचाते ब्लू फिल्टर वाले चश्मे
कंप्यूटर और मोबाइल स्क्रीन पर कई घंटों तक काम करने से आंखों में होने वाले तनाव से बचने के लिए नीली रोशनी को फिल्टर करने वाले चश्मों की डिमांड बढ़ी है। लेकिन इसे लेकर हुई कई रिसर्च में इसके वैज्ञानिक सबूत नहीं मिले हैं।
एक्सपर्ट्स का बोलना है कि नीली रोशनी का वास्तव में आंखों की परेशानी से कोई लेना-देना ही नहीं है। 17 स्टडी के एनालिसिस में बोला गया है कि इन चश्मों को लेकर इस तरह का दावा ठीक नहीं है। ये आंखों को तनाव से राहत नहीं देते।
एक्स्पर्ट्स कंप्यूटर विजन सिंड्रोम के पीछे नीली रोशनी को गुनेहगार नहीं मानते। मेलबर्न यूनिवर्सिटी में ऑप्टोमेट्री और विजन साइंसेज की एसोसिएट प्रो। लॉरा डाउनी का बोलना है कि वास्तव में आंखों के तनाव को लेकर नीली रोशनी को गुनाह देना ही अपने आप में दंग करने वाला है।
कंप्यूटर विजन सिंड्रोम को भी जानिए…
लंबे स्क्रीन टाइम के बाद सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना, आंखों में जलन आदि की शिकायतें कंप्यूटर विजन सिंड्रोम में आती हैं। उनकी टीम ने पाया है कि नीली रोशनी को फिल्टर करने वाले चश्मे के दूसरे साधारण चश्मे के मुकाबले कोई एडिशनल एडवांटेज नहीं हैं। इससे आंखों में जलन या थकान में कमी नहीं होती और न ही यह विजन में सुधार करते हैं।
अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी के डाक्टर राज मातुरी का बोलना है कि ऐसे सबूत हैं कि इन चश्मों से दिमाग से मैलाटोनिन का फ्लो बाधित होता है। इससे नींद न आने की परेशानी बढ़ जाती है।
एक्स्पर्ट्स का बोलना है कि मोबाइल या कंप्यूटर से नीली रोशनी बहुत कम निकलती है, इसलिए चश्मे से इसे रोकने से आखों के तनाव में कोई राहत नहीं मिलती है। यदि आप चार घंटे या अधिक समय कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बिताते हैं तो आंखों के लिए जोखिम बना रहेगा जो चश्मे से कम नहीं होगा।

