सवर्णों को जोड़ने की दिशा में काम कर रही बसपा
लखनऊ. लोकसभा चुनाव में सभी दलों से दूरी बना चुकी बीएसपी अपने वोट बैंक को बढ़ाने के लिए नए नए फॉर्मूले अपना रही है. एक तरफ उसके सामने काडर वोट बचाने की चुनौती से जूझ रही, वहीं दूसरी तरफ सवर्णों को जोड़ने की दिशा में काम कर रही है.

राजनीतिक जानकर बातते हैं कि बीएसपी ने सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला इस्तेमाल कर 2007 में सत्ता हासिल की थी. पार्टी ने 86 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मणों को टिकट दिया था और 41 सीटों पर उन्हें जीत हासिल हुई थी.
इसके बाद उनका यह फॉर्मूला सफल नहीं हो सका. बल्कि सवर्ण वोट तो चला ही गया. उनका अपना दलित बेस वोट भी दरकने लगा. उन्होंने इसे बचाने के लिए कई फार्मूले बनाए लेकिन कामयाबी नहीं मिल सकी. इसी कारण उसने एक बार फिर से सर्व समाज को जोड़ने की मुहिम को चलाया जाने की कवायद हो रही है.
बसपा के जानकर लोग बताते हैं कि पार्टी अपने बेस वोट को मजबूत करने में जुटी है जिससे वह कहीं और छिटक न सके. इसके अतिरिक्त सवर्ण वोटों को अपने पाले में रखने के लिए अलग से कार्य योजना बनाई जा रही है.
बसपा से जुड़े एक नेता ने कहा कि 2019 के लोकसभा में मिली ताकत के बाद बीएसपी एक फिर से काडर कैंप करने जा रही है जिसमें सर्व समाज फॉर्मूले पर विशेष बल रहेगा, खासकर कमजोर और इन्साफ प्रिय सवर्ण ब्राम्हण, क्षत्रिय वैश्य सभी को एक बार पार्टी में मजबूती के साथ जोड़ा जायेगा.
बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल कहते हैं कि 2007 की तरह जनता से बीएसपी का गठबंधन होगा. हमारी पार्टी हर समाज को लेकर चलती है. लोकसभा चुनाव को लेकर 10 बूथ का एक कैडर कैंप चल रहा है जिसमें सर्व समाज के लोगों को बुलाया जाता है. गरीब सवर्ण को बुला रहे हैं. सवर्ण वोट खिसकने को बीजेपी का दुष्प्रचार कहा है.
राजनीतिक विश्लेषक प्रसून पांडेय कहते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सवर्ण जरूरी किरदार अदा करते हैं. इनका गवर्नमेंट बनाने में बड़ा रोल रहा है. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बीएसपी इनकी बदौलत ही सत्ता में रही है. इनकी अनदेखी कोई दल नहीं कर सकता. मायावती का तो खास फोकस रहता है. इस समय उनके सामने अपने बेस वोट बचाए रखने की और सवर्ण वोट जोड़ने की बड़ी चुनौती है. इसमें वह कितना सफल होगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा.

