किसान सफेद मूसली की खेती से लाखों की कमा रहे आमदनी
Khargone News: मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के किसान अब परंपरागत फसलों के साथ-साथ औषधीय पौधों की खेती भी करने लगे हैं। जिले के रायबिड़पुरा गांव में 90 प्रतिशत किसान सफेद मूसली की खेती से लाखों की आमदनी कमा रहे हैं। आयुर्वेद में ताकत बढ़ाने वाली इस जड़ी-बूटी की डिमांड इतनी अधिक है कि किसानों को बाजार तक जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, व्यापारी स्वयं गांव आकर उपज की खरीदी करते हैं। किसानों को प्रति किलो 1500 से 2000 रुपये देकर जाते हैं।

जिले का रायबिड़पुरा गांव अब पूरे निमाड़ क्षेत्र में सफेद मूसली की खेती के लिए अलग पहचान बना चुका है। 700 घरों की जनसंख्या वाले इस गांव के लगभग 600 किसान परिवार खेती से जुड़े हैं। इनमें से 90 प्रतिशत किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ खरीब सीजन में सफेद मूसली भी उगाते हैं। करीब 400 एकड़ खेतों में मूसली की पैदावार होती है। यहां इसे क्षेत्रीय भाषा में धवलाई मूसली बोला जाता है। चाहे तो आप भी इस खेती से अपनी आय बढ़ा सकते हैं।
कैसे होती है मूसली की खेती
ग्रामीण किसान दिलीप पाटीदार बताते हैं कि मूसली की बुआई बरसात के मौसम में की जाती है। इसकी जड़ें मूंगफली की तरह जमीन के नीचे गुच्छों में बढ़ती हैं। खरगोन के कुछ क्षेत्रों की मिट्टी सफेद मूसली की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है। बीज के तौर पर पुरानी जड़ों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में दबा दिया जाता है। शुरुआती दिनों में मामूली सिंचाई कर दी जाती है, लेकिन इसे अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती। तीन से चार महीने में यानी अक्टूबर तक फसल तैयार हो जाती है।
खेती में खर्च कम और लाभ ज्यादा
फसल तैयार होने के बाद खेत से जड़ों को उखाड़कर घर लाया जाता है। इसके बाद छाल को लोहे की जाली से उतारा जाता है। जड़ों को 2-3 बार पानी से धोकर धूप में सुखाया जाता है। सूखने के बाद यही सफेद मूसली दवा कंपनियों को बेची जाती है। कई किसान स्वयं भी इसे पाउडर बनाकर दूध, काजू और बादाम के साथ सेवन करते हैं। किसानों का मानना है कि, सफेद मूसली की खेती में खर्च कम है और लाभ अधिक है। आधा से एक एकड़ खेत में एक से दो क्विंटल उत्पादन सरलता से हो जाता है।
किसानों को मंडी तक जाने की आवश्यकता नहीं
गौरतलब है कि, सफेद मूसली की मांग इतनी अधिक है कि किसानों को मंडी तक जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इंदौर, मुंबई, रतलाम, खरगोन और खंडवा जैसे शहरों से व्यापारी सीधे गांव आकर उपज खरीद लेते हैं। यहां पर किसानों को उपज का नकद रेट मिल जाता है। दवा कंपनियां इससे पाउडर और कैप्सूल तैयार करती हैं।

