‘नारीशक्ति वंदन विधेयक’ आज लोकसभा में हुआ पेश
संसद के निचले सदन, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में स्त्रियों को एक तिहाई आरक्षण देने से जुड़ा ‘नारीशक्ति वंदन विधेयक’ आज लोकसभा में पेश हुआ। नए संसद भवन में पेश होने वाला यह पहला विधेयक है, जिसे स्त्री वोटबैंक को साधने की प्रयास के तौर पर भी देखा जा रहा है। पीएम मोदी के नेतृत्व में केंद्र गवर्नमेंट स्त्री केंद्रित कई योजनाएं लेकर आई है। बीजेपी की ओर से इस बात पर बल डाला गया कि गवर्नमेंट ने स्त्रियों के विकास और सशक्तिकरण पर कितना फोकस किया है। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 फीसदी सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव लैंगिक-न्याय को भी दर्शाता है, जिसका मोदी गवर्नमेंट 2024 के चुनावी कैंपेन के दौरान भरपूर इस्तेमाल कर सकती है। भाजपा ने 2019 के चुनावों में तीन तलाक अध्यादेश को लेकर ऐसा किया भी था।

महिला वोटवैंक पर फोकस सिर्फ़ बीजेपी तक ही सीमित नहीं है। कांग्रेस, जद (यू), द्रमुक और आम आदमी पार्टी (आप) सहित सभी सियासी दलों ने चुनावी कामयाबी के लिए स्त्रियों को लुभाने की प्रयास की है। पहले सियासी दल विशिष्ट समुदाय या विशेष जाति पर अधिक बल दिया करते थे। मगर, अब वे स्त्रियों की चुनावी ताकत को समझ चुके हैं। आज स्त्रियों का बड़े पैमाने पर समर्थन हासिल करने का कोशिश दिखता है। महिलाएं हर एक निर्वाचन क्षेत्र में निर्णायक किरदार निभाने लगी हैं। चुनावी प्रक्रिया में स्त्री मतदाताओं की भागीदारी बढ़ी है जिससे उनका असर और गहरा हुआ है।
पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक कर रहीं मतदान
2019 में पहली बार मर्दों की तुलना में स्त्रियों ने अधिक मताधिकार का इस्तेमाल किया। लोकसभा चुनाव 2019 में स्त्री मतदाताओं की भागीदारी 67.2% थी, जबकि मर्दों का मतदान फीसदी 67 रहा। यदि इसकी तुलना 1962 के लोकसभा चुनाव से करें तो हालात काफी बदल गए हैं। 1962 के इलेक्शन में 62 फीसदी पुरुष मतदाताओं के मुकाबले महज 46.6 प्रतिशत स्त्रियों ने ही वोट डाले थे। आंकड़े बताते हैं कि 2022 तक तीन सालों में स्त्री मतदाताओं की संख्या में 5.1% की वृद्धि हुई है। इसी अवधि में पुरुष मतदाताओं की संख्या में 3.6% की वृद्धि देखी गई। साफ है कि मतदान प्रक्रिया में महिलाएं अब मर्दों से अधिक बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं।
महिला मतदाताओं को लुभाने में जुटीं राज्य सरकारें
राजनीतिक दल इस बात को अच्छी तरह से समझ चुके हैं। यही कारण है कि उन्होंने स्त्री मतदाताओं को अपनी ओर लुभाने के कोशिश तेज कर दिए हैं। इनमें बैंक खातों में जमा भत्ते, रियायती खाना पकाने के ईंधन, निःशुल्क बस यात्रा और शराब की खपत के विरुद्ध कार्रवाई जैसे कदम अहम हैं। जिन पार्टियों ने स्त्री मतदाताओं का विश्वास जीतने की प्रयास की, उन्हें फायदा मिलता भी दिखा है। मिसाल के तौर पर बिहार के सीएम और जेडीयू नेता नीतीश कुमार की ओर से 2016 में लागू की गई शराबबंदी को देखा जा सकता है। नीतीश के इस कदम को स्त्रियों का अपार समर्थन मिला। यही वजह रही कि कई उल्टा परिस्थितियों के बावजूद 2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश की JDU ने 43 सीटें जीतीं। इस इलेक्शन में मर्दों का मतदान फीसदी 54.68 रहा, जबकि स्त्रियों के 59.69 फीसदी वोट पड़े।
महिलाओं पर फोकस करतीं केंद्र की कई योजनाएं
केवल राज्य सरकारें ही नहीं, बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र गवर्नमेंट ने भी स्त्रियों को सशक्त बनाने वाली योजनाओं पर बल दिया है। 9.6 करोड़ स्त्रियों के लिए रसोई गैस उज्ज्वला योजना, 27 करोड़ जन-धन खाते खोलना, विशेष सावधि जमा योजनाएं, स्त्री उद्यमियों को 27 करोड़ से अधिक मुद्रा कर्ज का वितरण और मिशन पोषण सहित कई कदम मोदी गवर्नमेंट ने उठाए हैं। स्त्री केंद्रित योजनाओं पर गवर्नमेंट का फोकस प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के लिए काम भी आया है। इण्डिया टुडे-एक्सिस माई इण्डिया पोस्ट-पोल के अनुसार, लोकसभा चुनाव 2019 में स्त्रियों ने प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को भारी समर्थन दिया। इसमें कहा गया कि 46 फीसदी स्त्रियों ने बीजेपी और उसके सहयोगियों को वोट दिया था। 27 फीसदी ने कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाले UPA को और अन्य 27 फीसदी ने दूसरे दलों को वोट दिया था।

