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इस ओर इशारा कर रहा है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रयागराज में होना…

भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में बुधवार को आस्था और राजनीति का अनूठा संगम देखने को मिला.. जब राष्ट्र की राजधानी दिल्ली में मतदान हो रहा था, तब पीएम मोदी प्रयागराज में संगम स्नान कर रहे थे. यह दृश्य प्रतीकात्मक ही नहीं, बल्कि राजनीति और आस्था के गहरे संबंधों की ओर भी इशारा करता है

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लोकतंत्र की नदी में आस्था की डुबकी

लोकतंत्र में चुनाव जनता का महापर्व है, और इस पर्व में हर नागरिक की भागीदारी जरूरी है. दिल्ली में मतदाता जब ईवीएम का बटन दबा रहे थे, तब पीएम मोदी संगम में डुबकी लगा रहे थे. यह मात्र धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि राजनीति के उस आयाम को दर्शाता है, जहां आस्था को चुनावी समीकरणों से जोड़ा जाता है. यह पहला अवसर नहीं है जब मोदी ने चुनाव से पहले धार्मिक स्थल की यात्रा की हो—यह एक परंपरा बन चुकी है, जिसका मनोवैज्ञानिक असर मतदाताओं पर पड़ता है.

क्या आस्था चुनावी गणित का हिस्सा है?

हर चुनाव में सियासी दलों का धार्मिक स्थलों की ओर झुकाव देखा गया है. मोदी के इस संगम स्नान को भी चुनावी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. इतिहास गवाह है कि भारतीय राजनीति में धार्मिक प्रतीकवाद को अक्सर वोट बैंक की मजबूती के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. राम मंदिर, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और अब संगम स्नान—ये सभी घटनाएं धार्मिक भावनाओं को सियासी बढ़त में बदलने के उदाहरण हैं.

चुनाव बनाम आस्था : कौन किस पर हावी?

दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, आतिशी और कांग्रेस पार्टी के राहुल गांधी मतदान केंद्रों पर नजर आए. दूसरी ओर, पीएम मोदी आस्था की शक्ति का संदेश दे रहे थे. यह दो भिन्न-भिन्न चुनावी रणनीतियों का उदाहरण है—

एक ओर “काम की राजनीति”, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के मुद्दों पर बात हो रही है.

दूसरी ओर “भावनात्मक राजनीति”, जिसमें धार्मिक स्थल, परंपराएं और प्रतीकवाद को अहमियत दी जाती है.

क्या यह जनता को प्रभावित करता है?

भारतीय राजनीति में धर्म और चुनाव का घनिष्ठ संबंध रहा है. मोदी के संगम स्नान से उनके समर्थकों को एक सांस्कृतिक संदेश मिलता है, जो उन्हें धार्मिक एवं राष्ट्रवादी भावनाओं से जोड़ता है. यह रणनीति बीजेपी के कोर वोटर्स को मजबूत करती है. वहीं, दूसरी ओर विपक्ष अपनी राजनीति को लोक कल्याणकारी योजनाओं और सेक्युलर नैरेटिव के इर्द-गिर्द रखता है.

लोकतंत्र में जनता सबसे बड़ी शक्ति होती है. चाहे वह ईवीएम पर बटन दबाने की क्रिया हो या गंगा में आस्था की डुबकी, अंततः फैसला जनता का ही होता है. लेकिन यह प्रश्न बना रहेगा—क्या चुनावों में आस्था एक पर्सनल धार्मिक क्रिया है, या फिर यह लोकतंत्र की नदी में बहाई गई सियासी डुबकी?

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