प्रेग्नेंसी के दौरान पत्नी ही नहीं पति भी अपनी डाइट व आदतों को लेकर बरतें ये सावधानियां
महिलाओं के लिए प्रेग्नेंसी के 9 महीने कठिन होते और वह जीवन के इस दौर को एंजॉय भी करती हैं। यह समय दंपती दोनों के लिए हर कदम फूंक कर रखने का होता है। दादी-नानी, सास-मां, हर रिश्ता नसीहतें देता है। कुछ खाने की राय दी जाती और कुछ चीजों से परहेज करने को भी बोला जाता। वैसे में मां और बच्चे दोनों की स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है इसलिए इस दौरान पत्नी ही नहीं पति भी अपनी डाइट और आदतों को लेकर सावधानी बरतें।

महिला का प्रेग्नेंसी में आमतौर पर 11 से 16 किलोग्राम तक वजन बढ़ता है लेकिन यदि इस समय मीठा या जंक फूड खाए तो मोटापा बढ़ सकता है जो कठिन से ही शरीर छोड़कर जाता है। इस समय पति का इमोशनल सपोर्ट सिस्टम पत्नी के बहुत काम आता है। वह यदि पत्नी का मन बहलाने में सफल रहे तो जंक फूड से उसका ध्यान भटकाकर उसे कुछ हेल्दी खाने को मोटिवेट कर सकता है।
कई बार लोग प्रेग्नेंट स्त्री को दो जन की खुराक के बराबर खाने की बात करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अब स्त्री अकेली नहीं, उसे अपने शिशु के खाने का भी ख्याल रखना है जबकि ऐसा सोचना गलत है। प्रेग्नेंसी में चिकित्सक की राय पर स्त्री को डाइट लेनी चाहिए और यदि बेबी प्लान कर रहे हैं तो दोनों को ही अपनी आदतों में परिवर्तन कर लाइफस्टाइल को हेल्दी बनाना चाहिए।
प्रेग्नेंसी में हेल्दी डाइट लेना जरूरी
सीके बिरला हॉस्पिटल, दिल्ली में गायनेकोलॉजिस्ट डाक्टर प्रियंका सुहाग कहती हैं कि प्रेग्नेंसी में स्त्री को कुछ न्यूट्रिशन्स की अधिक आवश्यकता होती है। प्रेग्नेंसी के पहले 3 महीने बहुत अहम होते हैं। इस पहली तिमाही में स्त्री को अपनी डाइट पर खास ध्यान देना चाहिए। इस समय में फोलिक एसिड, कैल्शियम, प्रोटीन और आयरन से भरपूर खुराक लेनी चाहिए।
डॉ। प्रियंका सुहाग यह भी कहती हैं कि बेहतर होगा कि प्लानिंग से पहले हसबैंड-वाइफ अपनी फूड हैबिट्स और दूसरी आदतों को लेकर सावधान हो जाएं।
हसबैंड भी खुराक और आदतों में सावधानियां बरतें
दिल्ली स्थित सर गंगाराम हॉस्पिटल में गायनेकोलॉजिस्ट डाक्टर हुमा अली कहती हैं कि मर्दों की शराब, सिगरेट, तंबाकू या गुटखा खाने की आदत से उनके टेस्टोस्टेरोन पर असर पड़ता है। साथ ही स्पर्म की संख्या कम और क्वॉलिटी खराब होती है जिससे पुरुष पापा बनने के सुख से दूर हो सकते हैं।
लेकिन ठीक डाइट से इसका स्तर सुधारा जा सकता है ताकि स्पर्म हेल्दी और स्ट्रॉन्ग रहें और पत्नी के गर्भ में हेल्दी बच्चा हो।
पुरुषों को अपनी डाइट में एंटीऑक्सीडेंट, प्रोटीन, फल और कच्ची सब्जियों का सलाद शामिल करना चाहिए और फैटी फूड आइटम्स से दूर रहना चाहिए।
हसबैंड को प्रेग्नेंट वाइफ के सामने नहीं करनी चाहिए स्मोकिंग
अगर पुरुष स्मोकिंग करता है तो कहीं ना कहीं इसका असर प्रेग्नेंट वाइफ पर भी होता है क्योंकि वह हसबैंड के साथ पैसिव स्मोकिंग करती है।
इससे बेबी की ग्रोथ पर असर पड़ता है। बेबी अब्नॉर्मल भी हो सकता है।
मेथी दाना और उड़द फायदेमंद
सेक्सोलॉजिस्ट डाक्टर प्रकाश कोठारी कहते हैं कि मर्दों को स्पर्म की क्वॉलिटी सुधारने के लिए अपनी डाइट में उड़द की दाल और मेथी दाने को शामिल करना चाहिए।
हफ्ते में 2 बार दिन के समय उड़द की दाल घी में हींग और लहसुन का छौंक लगाकर खाएं। रात को 1 चम्मच मेथी दाना पानी के साथ निगल लें। यह दोनों चीजें टेस्टोस्टेरोन लेवल बढ़ाती हैं। रोज एक्सरसाइज करें और नींद पूरी लें।
फोलिक एसिड से प्रेग्नेंसी की शुरुआत
गर्भावस्था के दौरान बच्चे का विकास कई स्टेज पर होता है। कंसीव करने के 2 हफ्तों के अंदर ही भ्रूण में न्यूरल ट्यूब बन जाती है। यह छोटी-सी ट्यूब बच्चे के मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और नसों को विकसित करती है। इसलिए शुरुआती स्टेज किसी खतरे से कम नहीं होती। यदि इस ट्यूब में डिफेक्ट आ जाए तो इसे ‘न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट’ बोला जाता है।
जिस शिशु को यह डिफेक्ट हो जाता है उसके जीवित रहने की आसार बहुत कम होती है और यदि भ्रूण बच भी जाए तो जन्म के समय शिशु दिव्यांग हो सकता है।
इस परेशानी से बचने के लिए प्रेग्नेंसी प्लान कर रही स्त्री को पहले ही फोलिक एसिड लेना प्रारम्भ कर देना चाहिए। यह भ्रूण के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। साथ ही विटामिन बी भी महत्वपूर्ण है।
प्रेग्नेंसी में फोलिक एसिड की कमी ना हो इसलिए खट्टे फल जैसे संतरा, मौसमी, आंवला, हरे पत्तेदार सब्जियां, बींस और फोर्टिफाइड अनाज यानी मोटा अनाज जैसे दलिया, बाजरे की खिचड़ी, ज्वार और रागी की रोटी, स्प्राउट खाना चाहिए।
कैल्शियम से बच्चे की हड्डियां बने मजबूत
कैल्शियम गर्भ में पल रहे शिशु की हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है। प्रेग्नेंट स्त्री को इस दौरान प्रत्येक दिन कम से कम 1000 मिलीग्राम कैल्शियम लेना चाहिए।
प्रेग्नेंसी के दौरान स्त्री के अपने शरीर से कैल्शियम घटता है जिससे उनके दांत और हड्डियां कमजोर होने लगती है क्योंकि उनकी अपनी बॉडी से बच्चा भी कैल्शियम ले रहा होता है। वहीं, यदि पहले से कैल्शियम कम हो तो बच्चे के दांत और हड्डियां बनने में परेशानी आती है। इसलिए प्रेग्नेंसी के चौथे महीने से कैल्शियम की मात्रा बढ़ा दी जाती है।
कैल्शियम की कमी को दूर करने के लिए डाइट में भिंड़ी, सोया मिल्क, ब्रोकली, संतरा, शकरकंद, दही, पनीर, टोफू, मखाने और बादाम को शामिल किया जा सकता है।
प्रोटीन से बेबी बनता है स्ट्रॉन्ग
प्रोटीन से बेबी के टिशू बनते और रिपेयर होते हैं, जिससे उसकी मसल्स मजबूत होती हैं। प्रोटीन बच्चे के ब्रेन के डेवलपमेंट के लिए भी महत्वपूर्ण होता है। प्रेग्नेंसी के 7वें महीने से स्त्रियों को प्रोटीन की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। इस दौरान यदि स्त्री के शरीर में प्रोटीन की कमी हो तो वह थकान, कमजोरी महसूस करती है। शरीर में प्रोटीन की कमी होने पर स्त्री को एडिमा होता है जिससे सूजन भी आने लगती है और शरीर का खून पानी बनने लगता है।
प्रोटीन की कमी से भूख अधिक लगती है। इसकी कमी से मिसकैरेज की संभावना बढ़ जाती है, वहीं बेबी अच्छे से विकसित नहीं कर पाता।
जो महिलाएं नॉन वेजिटेरियन है वह अंडा और मीट खाएं और जो वेजिटेरियन है वह अंकुरित मूंग, चने, दालें, पनीर और बादाम खा सकती हैं।
आयरन डाइट लेने से खून की कमी नहीं होगी
प्रेग्नेंसी में खून की कमी घातक साबित हो सकती है। अधिकांश महिलाएं अक्सर प्रेग्नेंसी के दौरान इस परेशानी का सामना करती हैं। यदि स्त्री प्रेग्नेंसी में आयरन की कमी से जूझ रही हो तो बेबी की प्रीमैच्योर डिलीवरी का खतरा बढ़ जाता है।
वहीं बच्चे का वजन भी कम हो सकता है या बच्चे की सांस रुक सकती है क्योंकि खून में उपस्थित आयरन ही शिशु तक ऑक्सीजन पहुंचाता है।
वहीं मां की सांसें फूलने लगती है, कई बार सांस भी नहीं आती। पूरे दिन थकान महसूस होती है और अनिद्रा की भी परेशानी होने लगती है।
आयरन की कमी को दूर करने के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां खासकर पालक, सरसों, मेथी, चुकंदर, दालें और मटर खाने को बोला जाता है।
हर दिन अधिक कैलोरी की जरूरत
शिशु के विकास में प्रेग्नेंट स्त्री की डाइट बहुत अहम रोल निभाती है। वह जो खाती है, उसका सीधा असर बच्चे पर पड़ता है।
एक प्रेग्नेंट स्त्री को प्रतिदिन करीब 2200 से 2,400 कैलोरी की आवश्यकता पड़ती है। वहीं ठीक डाइट के साथ एक्सरसाइज भी करना महत्वपूर्ण है। एक्सरसाइज से ब्लड सर्कुलेशन अच्छा रहता है। ब्लड सर्कुलेशन अच्छा रहने पर बच्चे तक अच्छे से ऑक्सीजन पहुंचती है।
सी-फूड और कच्चे अंडों से करें तौबा
गर्भावस्था में सी-फूड और कच्चे अंडों को खाने से बचना चाहिए। दरअसल इन सब चीजों से इंफेक्शन का खतरा बढ़ता है।
अंडों को कच्चा खाने की बजाय पकाकर खाना चाहिए। वहीं प्रेग्नेंसी के दौरान शराब और सिगरेट से भी परहेज करना चाहिए।
अधिक चाय-कॉफी से मिसकैरेज का खतरा
डॉ। प्रियंका सुहाग कहती हैं कि अधिक कैफीन से मिसकैरेज का खतरा बढ़ जाता है। कई शोधों में भी यह साबित हो चुका है।
यूनिवर्सिटी ऑफ उटाह हेल्थ की स्टडी में पाया गया कि जो महिलाएं प्रेग्नेंसी के पहले 7 सप्ताह दिन में रोज 2 से अधिक बार कैफीन पीती हैं, उनमें मिसकैरेज का खतरा बढ़ जाता है। गर्भवती स्त्रियों पर हुए अध्ययन में पाया गया कि 1,063 में से 172 स्त्रियों ने कैफीन के कारण मिसकैरेज को झेला।
दरअसल कैफीन से यूट्रस और प्लेसेंटा की ब्लड वेसेल्स सिकुड़ जाती हैं जिससे भ्रूण तक खून की सप्लाई कम हो जाती है और उसका विकास ठीक ढंग से नहीं हो पाता।
खाने में हल्का नमक और कम मसाला
प्रेग्नेंसी में तेज नमक और तीखा खाने से बचना चाहिए। इस तरह के खाने से गर्भवती स्त्री पेट में अपच या जलन महसूस कर सकती हैं लेकिन लेबर पेन नहीं उठते।

