गेहूं को समस्याओं से बचाने के लिए ये काम जरूर करें किसान
मौसम के परिवर्तन के चलते गेहूं में विभिन्न प्रकार के रोगों का प्रकोप हो सकता है, जो फसल के उत्पादन को काफी प्रभावित कर सकते हैं। कृषि रक्षा अधिकारी बस्ती रतन शंकर ओझा लोकल 18 से वार्ता में बताते हैं कि गेहूं में करनालबंट, पत्ती धब्बा बीमारी और गेरूई बीमारी (काली, भूरी और पीली गेरूई) जैसे रोगों का प्रकोप हो सकता है। इन रोगों से बचाव के लिए समय पर इलाज करना अत्यंत जरूरी है, ताकि फसल का उत्पादन प्रभावित न हो।

पत्ती धब्बा रोग
रतन शंकर ओझा बताते हैं कि इस बीमारी में पत्तियों पर पीले और भूरे अंडाकार धब्बे दिखाई देते हैं। समय रहते इलाज न किया जाए, तो ये धब्बे बाद में कल्बई रंग के हो जाते हैं। इस बीमारी के इलाज के लिए थायोफिनेट मिथाइल 70% की 700 ग्राम मात्रा या मैंकोजेब 75% की 2 किलोग्राम मात्रा 500 लीटर पानी में मिलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।
करनालबंट रोग, गेरूई रोग
करनालबंट बीमारी में प्रभावित दाने आंशिक रूप से काले चूर्ण के रूप में बदल जाते हैं। इसी प्रकार अनावृत्त कंडुआ बीमारी प्रारम्भ में पता नहीं चलता। इसमें बालियों के दानों के जगह पर काला चूर्ण बन जाता है जो सफेद झिल्ली से इक्का रहता है, बाद में झिल्ली फटने पर फफूंदी के असंख्य बीजाणु हवा में फैल कर स्वस्थ बालियों में फूल आते समय संक्रमित कर देते हैं एवं बीमारी का प्रसार करते हैं। अनावृत्त कंडुआ, करनालवंट तथा अन्य बीष्णु जनित रोगों को बुवाई के पूर्ण बीज शोधन द्वारा कारगर रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।
रतन शंकर ओझा बताते हैं कि इसमें तीन प्रकार के बीमारी होते हैं काली, भूरी, और पीली गेरूई। काली गेरूई में पत्तियों पर हल्के भूरे धब्बे होते हैं, जो बाद में काले हो जाते हैं और तनों पर भी फैल जाते हैं। से फसल सूखने लगती है दाने पतले हो जाते हैं या फिर बनते ही नहीं काली गिरवी तने तथा पत्तियों को प्रभावित करती हैं। पीली गेरूई में पत्तियों पर पीले धब्बे और पाउडर जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
करनालबंट गेरूई लोगों के लक्षण दिखाई देते ही इन दोनों रोगों से बचाव के लिए Propiconazole 25% EC या Azoxystrobin 11% + Tebuconazole 18.2% का 600 मिली मंत्र 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर के रेट से छिड़काव करें। जरूरत मुताबिक 7 से 10 दिन बाद रसायन बदलकर पुनः एक छिड़काव करें जिसे पूरी तरह नियंत्रित हो सके।
सूत्रकृमि संक्रमण
रतन शंकर ओझा बताते हैं कि कहीं-कहीं सूत्रकृमि के कारण से बीमारी लग सकता है जिसमें प्रभावित पौधों की पत्तियां मुडकर सिकुड़ जाती हैं, पौधे बौने रह जाते हैं, अधिक शाखाएं निकलने लगती हैं तथा रोगग्रस्त पौधों की बालियां छोटी, फैली हुई होती हैं तथा उनमें दानों की स्थान भूरी/काली गांठं बन जाती हैं जिनमें सूत्रकृमि रहते हैं। इनके इलाज हेतु Abamectin 1.9% EC की 1 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी की रेट से घोल कर प्रयोग करें या फिप्रोनिल 0.3 प्रति० जी०आर० की 20 किग्रा० मात्रा प्रति हे० झिड़काव करें।

