यहां मिट्टी की कला से सपनों को पूरा करते हैं लोग, खुद ही करते हैं ग्राहकों से डील
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के कुम्हार पारा में करीब 200 परिवार रहते है। यहां फिलहाल हर घर के कमरों और आंगन में गजानन की छोटी बड़ी मूर्तियां आकर ले रही हैं। कहीं मिट्टी का काम चल रहा तो कही फिनिशिंग का तो कहीं रंग का काम करते लोग नजर आ जाएंगे। गांव के महिला, पुरुष से लेकर छोटे बच्चे तक मूर्तियां बनाते नजर आते हैं। दादा से लेकर पोते-पोतियों तक एक साथ रमे हुए हैं। हर किसी का हाथ मिट्टी के काम में सधा हुआ है। अच्छी मिट्टी की पहचान करना, उसे रौंदना हो, फिर मूर्तियां बनाना हो, फिर रंग रोगन करना हो और इन्हें बेचने के लिए ग्राहकों से डील करना हो, ये सारी कलाएं इन्हें आती है।

ये ऐसा स्टार्टअप और ऐसा स्किल है जो पीढ़ियों से पीढ़ियों को ट्रांसफर होता आया है। 45 वर्ष के गगन हो या 15 वर्ष के कलाकार मयंक या इनके पूर्वज, इनमें से किसी ने कभी भी न फाइन आर्ट की कोचिंग ली है, न बिजनेस मैनेजमेंट का लेक्चर अटेंड किया है, फिर भी इन कलाओं में महारत रखते है।
कला पर महंगाई का असर
गगन कुम्भकार बताते है कि एक ठंड के मौसम को छोड़ दे तो कुम्हार पूरा वर्ष व्यस्त रहते है। गर्मियों में घड़े, दिवाली में दिए, तीजा पोरा में खिलौने, गणेश पक्ष में और नवरात्रि में मूर्तियां बना कर बेचना और उस से जीवन यापन करना। पूरा 200 परिवार इसी विरासत में मिली मिट्टी की कला पर निर्भर है। हिन्दू संस्कृति के सभी उत्सव और त्योहार इन कुम्हारों के बिना नहीं मनाए जा सकते।

