बेटे की फीस इकट्ठा करने के लिए ऑटो चलाता है IIT छात्र का पिता
Auto Driver Story: हम कितना ही मॉडर्न क्यों न हो जाएं, फिर भी सामाजिक भेदभाव समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है। ऐसे ही घटना ऑटो रिक्शा पर सवार होकर स्टार होटल जाने वाले थायरोकेयर के संस्थापक और अरबपति डाक्टर अरोकियास्वामी वेलुमनी के सामने आई। वह हाल ही में एक्स पर अपने अनुभव शेयर किए हैं, जिसमें उन्होंने कहा कि कैसे बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) स्थित एक स्टार होटल ने उनके ऑटो-रिक्शा को अंदर प्रवेश देने से इनकार कर दिया।

ऑटो ड्राइवर आईआईटी में पढ़ाता है अपना बेटा
वेलुमनी ने कहा कि इस यात्रा के दौरान उन्होंने ऑटो ड्राइवर से वार्ता की, जिसमें पता चला कि उसका बेटा आईआईटी हैदराबाद में थर्ड ईयर का विद्यार्थी है। बेटे की शिक्षा का खर्च उठाने के लिए वह ड्राइवर रोज़ाना 12-14 घंटे तक मेहनत करता है। यह कहानी उनके लिए प्रेरणादायक थी, लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने उन्हें सोचने पर विवश कर दिया।
होटल के ‘नियम’ बने भेदभाव का कारण
जब उनका ऑटो-रिक्शा स्टार होटल के एंट्री गेट पर पहुंचा, तो सुरक्षा गार्डों ने उसे अंदर जाने से रोक दिया। गार्ड्स ने होटल के नियमों का हवाला देते हुए बोला कि ऑटो-रिक्शा को अंदर जाने की अनुमति नहीं है। वेलुमनी ने लिखा कि अंततः बीकेसी स्थित उस स्टार होटल ने रिक्शा को अंदर आने नहीं दिया। सुरक्षा गार्डों ने ड्राइवर से बदतमीजी से बोला कि यह होटल के नियम है। मुझे नीचे उतरकर अंदर जाने को बोला गया। कितना अजीब नियम है?
समाज के दोहरे मापदंड पर सवाल
इस घटना ने वेलुमनी को समाज में उपस्थित भेदभाव और वर्ग विभाजन की ओर इशारा करने पर विवश कर दिया। उन्होंने इस स्थिति को समाज के ‘अजीब नियमों’ का उदाहरण बताते हुए प्रश्न उठाया कि क्यों एक मेहनती व्यक्ति, जो अपने बेटे को आईआईटी जैसी प्रतिष्ठित संस्थान में पढ़ा रहा है, सिर्फ़ एक ऑटो रिक्शा ड्राइवर होने की वजह से सम्मान का हकदार नहीं समझा जाता?
बदलाव की जरूरत
वेलुमनी की यह पोस्ट लोगों को सोचने पर विवश कर रही है कि क्या केवल गाड़ियों की चमक-धमक से ही किसी की सामाजिक स्थिति तय होनी चाहिए? यह घटना दर्शाती है कि भले ही कोई आदमी कड़ी मेहनत से अपनी जीवन संवार रहा हो, लेकिन समाज अब भी बाहरी दिखावे के आधार पर भेदभाव करने से पीछे नहीं हटता।

