लाइफ स्टाइल

सेल्फ लव और सेल्फिश होने के बीच का क्या है फर्क, जानिए

जब तक हम दूसरों के लिए जीते हैं तब तक सबके चहेते बने रहते हैं, लेकिन जब अपने लिए जीना चाहते हैं तो सबके शत्रु बन जाते हैं तब ‘सेल्फ लव’ के अर्थ बदल जाते हैं और हमें ‘सेल्फिश’ का टैग दिया जाता है तो क्या स्वयं से प्यार करना गलत है?

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चैट रूम में आज चर्चा एक ऐसी स्त्री की, जिसने 18 वर्ष तक परिवार के लिए करियर छोड़ा लेकिन जब उसने फिर से अपनी पहचान बनानी चाही, तो परिवार ही उससे रूठ गया रिलेशनशिप काउंसलर डाक्टर माधवी सेठ बता रही हैं सेल्फ लव और सेल्फिश होने के बीच का फर्क, स्वयं के लिए जीने का हुनर

मेरी विवाह को 20 वर्ष हो गए हैं बेटी के जन्म के बाद मैंने अपनी मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ दी अब बेटी 18 वर्ष की हो गई है और अपनी पढ़ाई में बहुत बिजी रहती है पति के पास भी मेरे लिए टाइम नहीं है

अब मैं फिर से करियर की नयी आरंभ करना चाहती हूं, लेकिन इसके लिए पति और बेटी तैयार नहीं उनका मानना है कि मैं सेल्फिश हो गई हूं, मुझे पति और बेटी की चिंता नहीं है मुझे अपना करियर बनाने के बजाय उन्हें सपोर्ट करना चाहिए अपनी सभी जिम्मेदारियां निभाने के बाद अपने करियर के बारे में सोचना क्या सेल्फिश होना है?

अपनी खुशी के लिए जीना ‘सेल्फिश’ होना नहीं है बेटी के जन्म से पहले आप मल्टीनेशनल कंपनी में काम रही थीं, जहां आपके पास करियर में आगे बढ़ने के कई अवसर थे जैसा कि आपके बताया, बेटी के जन्म के बाद भी आप कुछ महीनों तक नौकरी करती रहीं लेकिन आपको रोज ये एहसास कराया गया कि आप अच्छी मां नहीं हैं आपको बेटी से अधिक अपने करियर से प्यार है परिवार के दबाव में आकर आपको नौकरी छोड़नी पड़ी

सबको खुश नहीं किया जा सकता

उम्मीदों का कोई ओर-छोर नहीं होता हम जितना करते जाते हैं परिवार की उम्मीदें हमसे उतनी अधिक बढ़ती जाती हैं ऐसे में मन ही मन कुढ़ने या परिवार को कोसने के बजाय अपने मन की बात परिवार के सामने रखना महत्वपूर्ण है हो सकता है, आरंभ में उन्हें आपकी बात पसंद न आए, लेकिन जब आप सारे पहलुओं को अच्छी तरह समझाएंगी तो परिवार आपकी बात जरूर समझेगा

‘सेल्फ लव’ तनाव से बचाता है

अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने के बाद जब हम कुछ समय अपने लिए बिताते हैं, वो काम करते हैं जिससे हमें खुशी मिलती है तो हमारा तनाव दूर होता है मानसिक स्वास्थ्य के ऐसा करना बहुत महत्वपूर्ण है जो लोग परिवार के प्रेशर में अपनी ख़्वाहिश से नहीं जी पाते, उनकी अपने रिश्तों से दूरी बढ़ती जाती है, साथ ही तनाव भी बढ़ने लगता है

स्ट्रेस कई बड़े रोगों का कारण हो सकता है इसलिए तनाव से बचना महत्वपूर्ण है अपने लिए जीना खुदगर्जी नहीं है, स्वयं से प्यार करना है जो लोग स्वयं से प्यार करते हैं वो दूसरों से भी खुलकर प्यार करना जानते हैं ऐसे लोग अपनी खुशी के साथ साथ दूसरों की खुशी का भी खयाल रखते हैं

पुरुषों पर भी है प्रेशर

परिवार की उम्मीदों का प्रेशर स्त्रियों की तरह ही मर्दों पर भी रहता है मर्दों की सफलता उनकी कमाई से आंकी जाती है जो पुरुष उतना नहीं कमा पाते जितनी परिवार की उनसे उम्मीदें हैं, तो नकारा घोषित किया जाता है

महिलाओं पर घर संभालने का प्रेशर होता है, तो मर्दों पर कमाने और परिवार की जरूरतों को पूरा करने का दबाव रहता है यही वजह है कि आज की पीढ़ी विवाह के नाम से डरने लगी है कमिटमेंट और जिम्मेदारियों से बचने के लिए कई युवा विवाह ही नहीं करना चाहते

खुद के लिए जीना सीखें

जब हम बहुत सारी जिम्मेदारियां ओढ़ते चले जाते हैं तो परिवार भी हमसे उतनी ही अधिक उम्मीदें करने लगता है वर्षों तक परिवार की ख़्वाहिश के लिए जीते रहने के बाद जब हम अचानक अपने लिए जीने की ख़्वाहिश जाहिर करते हैं, तो परिवार के लिए हजम कर पाना कठिन हो जाता है

आपके साथ भी यही हो रहा है आप पति और बेटी से प्यार से बात करें उन्हें अपनी खुशियों और इच्छाओं के बारे में बताएं आपके समझाने पर उन्हें बात समझ आ जाएगी और फिर पति-बेटी दोनों आपको सपोर्ट करने लग जाएंगे

ज्यादातर स्त्रियों की ये सबसे बड़ी परेशानी है कि वो पति, बच्चे, घर, परिवार की सभी जिम्मेदारियां पूरी ईमानदारी ने निभाती हैं, लेकिन अपने प्रति बहुत लापरवाह हो जाती हैं विवाह के कुछ वर्ष बाद ही इन्हें लगने लगता है कि अब सज-धजकर क्या करना विवाह के बाद ज्यादातर महिलाएं अपनी फिटनेस पर भी ध्यान नहीं देतीं

रिश्ते में जब संदेह का कीड़ा कुलबुलाने लगता है तो इसके घाव इतने गहरे होते हैं कि जीवन नासूर बन जाती है बिना गलती के पल-पल ये सफाई देना कि ‘मेरा कोई दोष नहीं’ आदमी को अंदर ही अंदर खाए जाता है ऐसे में एक छत के नीचे साथ रहना कठिन हो जाता है

चैट रूम में आज चर्चा एक ऐसे कपल की जहां पति की संदेह करने की आदत से पत्नी इतनी परेशान हो चुकी है कि वो संबंध से बाहर निकलना चाहती है

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