जानें, किस चमत्कार के लिए चर्चित हुए थे शिव के आंसू…

उत्तर हिंदुस्तान में आम, केरल में दुर्लभ
रुद्राक्ष के पेड़ आमतौर पर उत्तर हिंदुस्तान के ठंडे इलाकों में देखे जाते हैं, लेकिन केरल जैसे दक्षिणी राज्य में इसका फलना बहुत दुर्लभ माना जाता है। इस मंदिर में यह विशेष पेड़ 23 वर्ष पहले लगाया गया था, जब सीआरपीएफ के अधिकारी और मुय्यम के निवासी वायलप्र बालकृष्णन अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर से इसकी एक पौध लाए थे। मंदिर के उत्तर-पूर्वी हिस्से में इसे रोपा गया, लेकिन इसे फलते-फूलते देखने के लिए दो दशक से अधिक का लंबा प्रतीक्षा करना पड़ा।
पेड़ को बचाने के लिए हुआ विशेष प्रयास
बीते सालों में इस पेड़ को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब इस पर सूखने के लक्षण दिखने लगे। तब मंदिर समिति और क्षेत्रीय भक्तों ने मिलकर इसके संरक्षण और देखभाल के लिए विशेष कोशिश किए, जिससे यह बच पाया और अब इस पर फूल और फल आ चुके हैं। यह चमत्कारिक घटना मंदिर के लिए आस्था का बड़ा केंद्र बन चुकी है।
रुद्राक्ष की खासियत और महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, रुद्राक्ष भगवान शिव के आंसुओं से उत्पन्न हुआ है और इसे धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। प्राचीन समय से ऋषि-मुनि इसका प्रयोग ध्यान और साधना के लिए करते आ रहे हैं। इसमें न सिर्फ़ आध्यात्मिक बल्कि औषधीय गुण भी पाए जाते हैं, जो इसे और भी खास बनाते हैं।
रुद्राक्ष के प्रकार और उनकी शक्ति
रुद्राक्ष के कई प्रकार होते हैं। इनमें 38 प्रकार प्रमुख रूप से जाने जाते हैं। इनमें से 12 प्रकार सूर्य नेत्र, 16 प्रकार सोम नेत्र और 10 प्रकार त्रिक नेत्र से जुड़े होते हैं। हर रुद्राक्ष के अंदर एक विशेष बीज पाया जाता है, जिसे उसकी मुख संख्या के आधार पर पहचाना जाता है। एक मुखी रुद्राक्ष सबसे दुर्लभ माना जाता है, जबकि दो, तीन, चार और पांच मुखी रुद्राक्ष भी अत्यधिक प्रभावशाली माने जाते हैं। माना जाता है कि मुखों की संख्या जितनी अधिक होती है, उसकी ऊर्जा और आध्यात्मिक शक्ति भी उतनी ही अधिक होती है।
भक्तों के लिए विशेष उपहार
इस बार पेड़ से चार और पांच मुखी रुद्राक्ष प्राप्त हुए हैं, जिसे देखकर भक्तगण काफी उत्साहित हैं। मंदिर के पुजारी और कर्मचारी इन फलों को सावधानीपूर्वक एकत्र कर रहे हैं। गिरे हुए रुद्राक्ष के फलों की त्वचा को हटाकर और शुद्ध जल से धोकर इन्हें धार्मिक इस्तेमाल के लिए तैयार किया जा रहा है।

