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रिलेशनशिप- टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी के क्या नुकसान हैं, जानें…

मैस्क्यूलिनिटी यानी मर्दानगी को लंबे समय से ताकत और सेल्फ-डिपेंडेंसी से जोड़कर देखा जाता रहा है. समाज ने कुछ ऐसे आदर्श बना दिए हैं, जैसे ‘मर्द को दर्द नहीं होता’, ‘मर्द रोते नहीं.’ और ‘आंसू बहाना कमजोर लोगों की निशानी है’ इन बातों से मर्दों की भावनाओं को दबाने की प्रयास की जाती है.

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लेकिन क्या यह मैस्क्यूलिनिटी का ठीक अर्थ है? उत्तर है- एकदम नहीं. मैस्क्यूलिनिटी का मतलब केवल ताकत दिखाना या सख्त होना नहीं है. इसका ठीक अर्थ अपनी भावनाओं को ठीक ढंग से जाहिर करना और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाना होता है.

जब पुरुष अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करने लगते हैं, दूसरों पर धौंस जमाते हैं और इमोशंस को छिपाते हैं, तो यह ‘टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी’ बन जाती है. यह केवल मर्दों के लिए ही बुरा नहीं है, बल्कि इससे पूरा समाज प्रभावित होता है. इससे रिश्तों में झगड़े बढ़ते हैं, समाज में भेदभाव बढ़ता है और अत्याचार की घटनाओं में बढ़ोत्तरी होता है.

ऐसे में आज हम रिलेशनशिप में जानेंगे कि-

  • मैस्क्यूलिनिटी क्या है?
  • टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी के क्या हानि हैं?
  • इसका क्या निवारण है?
  • हेल्दी और पॉजिटिव मैस्क्यूलिनिटी क्या है?

टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी क्या है?

जब हम ‘मर्दानगी’ की बात करते हैं, तो हमारे मन में शक्तिशाली और भावनाओं को छुपाने वाले एक पुरुष छवि उभरती है. ऐसा पुरुष जिसे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती है. ये छवि समाज ने सालों से हमारे सामने रखी है और यहीं से परेशानी प्रारम्भ होती है. समाज ने मैस्क्यूलिनिटी को सीमित और सख्त दायरे में बांध दिया है. इसी सोच से टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी जन्म लेती है.

कैसे पनपती है टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी?

टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी का मतलब उन आदतों और मान्यताओं से है, जो मर्दानगी को आक्रामकता, धौंस जमाने और भावनात्मक कमजोरी से जोड़ती हैं. हमारे घर-परिवार में छोटे बच्चों को बचपन से यह सीख दी जाती है कि ‘लड़के रोते नहीं’, ‘मजबूत बनो’, ‘आंसू बहाना कमजोर होने की पहचान है.

बचपन में परिवार, समाज और सिनेमा से सीखी गई बातें बच्चों की सोच और व्यवहार पर गहरी छाप छोड़ती हैं. ‘मर्द बनो’ और ‘लड़के लड़कियों से बेहतर होते हैं’ जैसी बातें बच्चों के अंदर धीरे-धीरे इस धारणा मजबूत करती हैं कि रोना या इमोशंस जाहिर करना कमजोर होने की पहचान है.

आजकल सोशल मीडिया और औनलाइन प्लेटफॉर्म भी इस परेशानी को बढ़ाने में अहम किरदार निभाते हैं. फेक प्रोफाइल और बिना ज़िम्मेदारी के माहौल में लोग खुलेआम आक्रामक, असंवेदनशील और हिंसक विचार फैलाते हैं.

टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी के नुकसान

टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी केवल मर्दों को ही नहीं, बल्कि उनके आसपास के हर आदमी को प्रभावित करती है. जब किसी को बचपन से यह सिखाया जाए कि आंसू बहाना कमजोरी है, भावनाएं जाहिर करने से बचना चाहिए, तो यह आदत उसके मेंटल हेल्थ को बुरी तरह प्रभावित करती है. आइए टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी के हानि को ग्राफिक के जरिए समझते हैं.

इमोशंस को दबाने से मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम

टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी मर्दों को अपनी भावनाओं को दबाने, दूसरों पर हावी होने और कमजोरियों को छिपाने के लिए विवश करती है. लंबे समय तक अपने इमोशंस को जबरदस्ती दबाने से कई तरह की मेंटल हेल्थ समस्याएं हो सकती हैं. इससे खुदकुशी के विचार आ सकते हैं. साथ ही नशे की लत और डिप्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

रिलेशन पर दुष्प्रभाव

जब मर्दों को सिखाया जाता है कि संबंध में सामने वाले पर दबाव बनाकर रखना चाहिए, तो यह सोच उनके निजी और पेशेवर संबंधों को खराब करती है. घरेलू हिंसा, भावनात्मक उत्पीड़न जैसी समस्याएं इसी मानसिकता की देन हैं.

समाज पर बुरा असर

टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी केवल आदमी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज को भी प्रभावित करती है. यह महिलाओं, LGBTQ+ समुदाय और अन्य हाशिए पर खड़े लोगों या समुदाय के विरुद्ध भेदभाव और अत्याचार को बढ़ावा देती है.

क्या अन्य संबंध भी प्रभावित होते हैं?

रिश्ते आपसी समझ, एक-दूसरे के सम्मान और इमोशन पर टिके होते हैं, लेकिन जब समाज मर्दों को यह सिखाता है कि ‘कमजोरी’ दिखाना या अपने साथी पर निर्भर होना गलत है, तो रिश्तों में दरार आना स्वाभाविक है.

पार्टनरशिप में, जब एक आदमी हमेशा दूसरे पर प्रभुत्व बनाए रखने की प्रयास करता है, तो प्यार और सम्मान की स्थान असुरक्षा और कड़वाहट ले लेती है. इसी वजह से कई बार महिलाएं अपने पार्टनर के साथ सुरक्षित महसूस नहीं करतीं हैं.

प्रभावित होता है पिता-पुत्र का रिश्ता

पिता अपने बेटों के लिए रोल मॉडल होते हैं, लेकिन जब पिता भी टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी के शिकार होते हैं, तो वे अनजाने में अपने बेटों को भी वही सीख देते हैं. ‘तुम लड़कियों जैसे रो क्यों रहे हो?’, ‘क्या तुमने महिलाओं की तरह चूड़ियां पहन रखी हैं’ जैसी बातें बच्चों पर गहरा असर छोड़ती हैं.

हेल्दी मैस्क्यूलिनिटी क्या है?

समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि मर्दानगी कमजोरियों को छुपाने या सामने वाले पर धौंस दिखाने का नाम नहीं है. हेल्दी मैस्क्यूलिनिटी का मतलब संवेदनशीलता और दयालुता है.

क्या है समाधान?

हेल्दी मैस्क्यूलिनिटी के लिए कोई जादुई छड़ी नहीं है कि हमने घुमाया और हासिल कर लिया. खासतौर से तब, जब बचपन से हमें टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी की ट्रेनिंग दी गई हो. ऐसे में हम धीरे-धीरे अपनी आदतों में परिवर्तन लाकर और अभ्यास से हेल्दी मैस्क्यूलिनिटी को हासिल कर सकते हैं. आइए इसे ग्राफिक के जरिए समझते हैं.

इमोशनल होना समझदारी: पुरुषों को यह समझना चाहिए कि इमोशनल होना कमजोरी नहीं, बल्कि एक सामान्य मानवीय गुण है. भावनाओं को व्यक्त करने से तनाव कम होता है और रिश्तों में मजबूती आती है.

मदद मांगना कमजोरी नहीं: सहायता मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक है. हर किसी को कभी न कभी सहायता की आवश्यकता पड़ती है. सहायता मांगने से समस्याएं शीघ्र हल होती हैं और आदमी अकेलापन महसूस नहीं करता.

सुरक्षित माहौल दें: अपने आसपास के लोगों को उनकी भावनाओं और चरित्र को अपनाने का मौका दें. एक ऐसा माहौल बनाएं, जहां लोग बिना किसी डर और झिझक के अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकें. साथ ही दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना और उन्हें समझना बहुत महत्वपूर्ण है.

सामाजिक स्तर पर बदलाव

शिक्षा और जागरूकता: स्कूलों और घरों में बच्चों को सिखाना चाहिए कि पुरुष और महिलाएं बराबर हैं.

रोल मॉडल: ऐसे मर्दों को प्रोत्साहित करें, जो हेल्दी मैस्क्यूलिनिटी को अपनाते हैं. वहीं, स्वयं भी ऐसे रोल मॉडल अपनाएं.

हेल्दी मैस्क्यूलिनिटी को समाज में अपनाने के लिए हमें लगातार कोशिश करने की आवश्यकता है. खासतौर से विद्यालय और पैरेंटिंग के नियमों में परिवर्तन की प्रयास सबसे बेहतर प्रक्रिया है. जब नयी नस्लें समझदार और इमोशनल होंगी तो एक बेहतर समाज का निर्माण होगा.

 

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