अब बस सपना बनकर रह गया है देहरादून का बासमती, आखिर क्या है कारण…
भारत कृषि प्रधान राष्ट्र है। जिसके लगभग हर राज्य में खेती होती है। लेकिन खेती सिमटने लगी है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भी एक जमाने में खेती हुआ करती थी। यहां का बासमती चावल बहुत प्रसिद्ध हुआ करता था। देहरादून के माजरा, सेलाकुई, विकासनगर, मोहक्कमपुर समेत कई जगहों पर बासमती चावल की खेती होती थी। जिसे राष्ट्र ही नहीं विदेशों में भी भेजा जाता था लेकिन आज भवन निर्माण और बढ़ती जनसंख्या ने उन खेतों को ही गायब कर दिया।

एंग्लो-अफगान वार के बाद जबअफगानिस्तान के शासक दोस्त मोहम्मद खान को हिंदुस्तान में निर्वासित किया गया, उस समय वह मसूरी में रहने लगे। उन्हें यहाँ के चावल अच्छे नहीं लगे। उन्होंने अफगानिस्तान से बासमती के बीज मंगवाए। उन्हें देहरादून में इसे उगाया। तभी से बासमती चावल की खुशबू से दून घाटी महकने लगी।
दूसरे राज्यों से मनवाना पड़ता है बासमती चावल
देहरादून के व्यापारी अतुल ने कहा कि पहले देहरादून में बासमती की खेती बहुत होती थी। देहरादून के विकास नगर, मेंहुवाला, सेवला, मोथरावाला और माजरा जैसे क्षेत्रों में बासमती चावल की बहुतायत में पैदावार होती थी। बचपन में जब वह खेतों से गुजरते थे तो इनकी सौंधी खुशबू बहुत अच्छी लगती थी, स्बा बस वह लहलहाते खेत बस यादों में ही हैं। इतना ही नहीं जब बासमती चावल का कट्टा खोला जाता था तब पूरी दुकान इसकी खुशबू से महक उठती थी।
एंग्लो-अफगान युद्ध से जुड़ी है बासमती की कहानी
कई लोग देहरादून आने पर बासमती चावल ले जाया करते थे। इतना ही नहीं विदेशों में भी यहां का प्रसिद्ध बासमती चावल भेजा जाता था। आज देहरादून वाले लोगों को ही बासमती चावल खाने के लिए नहीं मिलते हैं। हमें रुद्रपुर, पंजाब, हरियाणा और यूपी से बासमती चावल मंगवाना पड़ता है। दस वर्ष पहले बासमती चावल का एक बोरा 3 से साढ़े तीन हजार रुपये का आता था जबकि अब इसके मूल्य 10 हजार से अधिक हो गए हैं। पहले 1 बोरा 100 किलोग्राम का आता था। जिसे पहले 50 किलोग्राम था। अब 25 किलोग्राम का कर दिया गया है।

