किसानों के काम की खबर! कम पानी में भी गजब की पैदावार पाने के लिए पढ़ें ये खबर
Agriculture News : छत्तीसगढ़ धान उत्पादन के लिए पूरे राष्ट्र में विख्यात है, इसलिए छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा बोला जाता है। लेकिन राज्य के कुछ क्षेत्र जैसे बस्तर का पठारी क्षेत्र और सरगुजा का मैदानी क्षेत्र, जल संसाधन की कमी और अनियमित वर्षा के चलते हमेशा से चुनौतियों का सामना करते आए हैं। ऐसे में किसानों को फायदा देने के लिए राजधानी रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि यूनिवर्सिटी द्वारा विशेष किस्मों का विकास किया गया है, जो कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देती हैं।

115 दिन में होती तैयार
जेनेटिक एंड प्लांट ब्रीडिंग विभाग के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डाक्टर अभिनव साव ने कहा कि इन सूखा-प्रतिरोधी किस्मों को विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों के लिए तैयार किया गया है, जहां सिंचाई की सुविधा सीमित होती है। इन किस्मों में प्रमुख रूप से इंदिरा बरानी धान 1, छत्तीसगढ़ बरानी धान 2, DRR-42 (हैदराबाद से विकसित), सहभागी धान और इंदिरा एरोबिक धान शामिल हैं। ये सभी किस्में 115 से 120 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं, जिससे किसानों को समय पर कटाई का फायदा भी मिलता है।
मिलती है अच्छी उपज
इन किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये कम जल की स्थिति में भी 45 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर का उत्पादन देने में सक्षम हैं। इसका सीधा फायदा यह है कि किसान कम लागत में अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं और जल संरक्षण में भी सहायता मिलती है। इससे उन क्षेत्रों में खेती की निरंतरता बनी रह सकती है, जहां मानसून की अनिश्चितता के कारण खेती करना जोखिम भरा होता है।
डॉ। साव ने यह भी कहा कि यूनिवर्सिटी द्वारा किसानों को प्रशिक्षण, बीज वितरण और तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया जा रहा है, ताकि अधिक से अधिक किसान इन नयी किस्मों को अपनाएं और मौसम की मार से होने वाले हानि से बच सकें। राज्य गवर्नमेंट और कृषि विभाग भी इन सूखा-प्रतिरोधी किस्मों को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयासरत हैं। साथ ही, क्षेत्रीय कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों तक ये किस्में पहुंचाई जा रही हैं। जानकारों का मानना है कि यदि इन किस्मों का बड़े स्तर पर प्रयोग किया जाए, तो छत्तीसगढ़ में धान की खेती को नयी दिशा मिल सकती है।

