साइलेंट ट्रैवलिंग में ये जगहें होती हैं शामिल
घूमने का अपना अलग ही मजा है। ट्रैवलिंग करने के भी भिन्न-भिन्न ढंग होते हैं। कुछ लोग फैमिली या दोस्तों के साथ घूमना पसंद करते हैं तो कुछ अकेले। किसी को पहाड़ पसंद होते हैं तो किसी को समुद्र। किसी को पॉपुलर टूरिस्ट डेस्टिनेशन अच्छी लगती हैं तो किसी को ऐसी स्थान पसंद हैं जो लोगों की भीड़ भाड़ से दूर हो। आजकल चुपचाप से शांत जगहों पर घूमने का चलन बढ़ रहा है। इसे साइलेंट ट्रैवल कहते हैं।

साइलेंट ट्रैवल को समझें
ट्रैवल एक्सपर्ट निक्की सैनी कहती हैं कि साइलेंट ट्रैवल शब्द सुनकर लगता है कि ऐसी स्थान पर घूमना जो सुनसान हो लेकिन ऐसा नहीं है। साइलेंट ट्रैवलिंग एक ऐसी यात्रा है जहां शोर और लोगों की भीड़ नहीं होती। इन जगहों पर जाकर लोगों को शाँति मिलता है। पूरे विश्व में इस तरह की घुमक्कड़ी का ट्रेंड बढ़ गया है क्योंकि लोग अब इस ट्रैवलिंग के जरिए डिजिटल डिटॉक्स करना चाहते हैं। साइलेंट ट्रैवल को quiet travel भी कहते हैं। इसमें ट्रैवलर लोगों से दूर रहकर स्वयं को नेचर से कनेक्ट करते हैं। 2025 में भले ही साइलेंट ट्रैवल नया शब्द हो लेकिन इसका चलन सदियों पुराना है। बौद्ध धर्म में इस प्रैक्टिस को विपश्यना कहते हैं यानी वास्तव में सत्य को जीने का अभ्यास करना।
इंट्रोवर्ट लोगों की पहली पसंद
माना जाता है जो लोग कम बोलते हैं या लोगों से शीघ्र घुलते मिलते नहीं है, वह सोलो ट्रैवलिंग करना पसंद करते हैं। लेकिन साइलेंट ट्रैवलिंग भी इंट्रोवर्ट लोग अधिक करते हैं। ऐसे लोग अकेले पहाड़ों पर चढ़ना या समुद्र के किनारे सूरज ढलते देखना पसंद करते हैं। साइलेंट ट्रैवलिंग में लोगों के शोर की स्थान चिड़िया के चह-चहाने की आवाज, तेज हवाओं के झोंके, नदी के बहते पानी या समुद्र की लहरों का शोर सुनाई देता है।
ऑफ सीजन है पहली पसंद
अक्सर लोग पीक सीजन में घूमना पसंद करते हैं लेकिन साइलेंट ट्रैवलिंग के शौकीन लोग ऑफ सीजन में घूमना पसंद करते हैं क्योंकि इस समय लोगों की भीड़ नहीं होती। वह इन जगहों को रिलैक्स होकर करीब से देखते हैं और अधिक से अधिक समय बिताते हैं। ऑफ सीजन घूमने से फ्लाइट, ट्रेन, होटल और बाकी जगहों के टिकट भी सस्ते मिलते हैं यानी साइलेंट ट्रैवलिंग पॉकेट फ्रेंडली भी होती है।
सोशल मीडिया पर नहीं डालते फोटो
साइलेंट ट्रैवलिंग की एक खूबी है कि ट्रैवलर इस घुमक्कड़ की फोटो कभी सोशल मीडिया पर नहीं डालते। जबकि आजकल अधिकांश लोग सिर्फ़ सोशल मीडिया पर शो ऑफ के चक्कर के घूमते हैं। साइलेंट ट्रैवलिंग एकदम सन्नाटा से होती है, दुनियावालों को बिना बताए।
इन जगहों पर जाकर मिल सकती है शांति
अक्सर ट्रैवलर पॉपुलर डेस्टिनेशन में घूमना पसंद करते हैं लेकिन साइलेंट ट्रैवलिंग में वह जगहें शामिल होती हैं जो गुमनाम होती हैं यानी अधिकांश टूरिस्ट ऐसी जगहों पर नहीं जाते। जैसे अधिकांश लोग समुद्र और सनसेट को देखने ग्रीस या मालदीव जाना पसंद करते हैं लेकिन वही खूबसूरत नजारा अल्बानिया में भी दिखता है लेकिन यह स्थान सैलानियों के बीच पॉपुलर नहीं है। हिंदुस्तान की बात करें तो मध्य प्रदेश का भेड़ाघाट, हिमाचल प्रदेश में स्पीति वैली और तोश पार्वती वैली, लद्दाख में हंगले, केरल में पूवर आइलैंड, जम्मू और कश्मीर में युसमर्ग और गुरैज, उत्तराखंड में लैंडोर जैसी जगहें साइलेंट ट्रैवल के लिए बेस्ट हैं। यदि आप ट्रैकिंग पसंद करते हैं या जंगलों में कैंप लगाना पसंद करते हैं तो यह भी अच्छा ऑप्शन है।
टेक्नोलॉजी से दूर
साइलेंट ट्रैवलिंग की सबसे खास बात यह है कि लोग इस दौरान टेक्नोलॉजी से दूर रहते हैं। घूमने के दौरान वह ना मोबाइल, ना टैब और ना ही लैपटॉप का इस्तेमाल करते हैं। वह टेलीफोन पर बात करने या वॉट्सऐप पर चैटिंग की स्थान लोकल लोगों से कनेक्ट होते हैं। उनसे बात करते हैं और उनके जैसे रहते हैं। साइलेंट ट्रैवलिंग एक तरह से मेडिटेशन की तरह है क्योंकि ट्रैवलर अकेले में समय बिताते हैं और नेचर के करीब बैठकर ध्यान से प्रकृति का लुफ्त उठाते हैं।
नेचर के करीब रहना फायदेमंद
आज की भागदौड़ भरी जीवन में हर कोई तनाव से घिरा हुआ है। साइलेंट ट्रैवलिंग में नेचर को करीब से देखा जाता है, उसे महसूस किया जाता है जिससे बॉडी में कार्टिसोल नाम का स्ट्रेस हार्मोन कम होने लगता है और मूड अच्छा होता है। इस तरह की ट्रैवलिंग से मेंटल हेल्थ भी दुरुस्त रहती है और डिप्रेशन-एंग्जाइटी जैसी समस्याएं दूर रहती हैं। घूमने के दौरान कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है जिससे फिजिकल हेल्थ भी सुधरती है। वहीं नेचर के करीब रहने से दिमाग क्रिएटिव बनता है, नए-नए आइडिया आते हैं और जीवन की कई उलझनें दूर होती हैं।
ब्लड प्रेशर रहता है कंट्रोल
हार्वर्ड हेल्थ की स्टडी के मुताबिक घूमने से हाई ब्लड प्रेशर की परेशानी दूर होती है। क्योंकि घूमने के दौरान आदमी तनाव मुक्त रहता है। इसके अतिरिक्त नींद भी सुधरती है। शहरों की भागदौड़ के बीच लोगों की सबसे अधिक नींद ही प्रभावित होती हैं। नेचर के करीब रहने और शांत माहौल से नींद समय पर आती है। दरअसल इस दौरान शरीर की जैविक घड़ी नेचर के हिसाब से काम करती है। सूरज उगते ही नींद खुल जाती है और शाम ढलते ही नींद आने लगती है। वहीं नींद को डिस्टर्ब करने के लिए डिजिटल गैजेट्स भी नहीं होते।

