लाइफ स्टाइल

हमारे और हमारी बेटियों के बीच दूरी बढ़ा देती है ये गलतफहमी

नई दिल्ली. बेटियां भगवान का अनमोल उपहार होती हैं, लेकिन अक्सर माता-पिता के रूप में हम उनकी जरूरतों और भावनाओं को ठीक ढंग से नहीं समझ पाते. यही गलतफहमी हमारे और हमारी बेटियों के बीच दूरी बढ़ा देती है. यह महत्वपूर्ण है कि हम अपनी बेटियों के साथ एक मजबूत और समझदारी भरा रिश्ता बनाएं, जो न सिर्फ़ उनका आत्मविश्वास बढ़ाए बल्कि उन्हें जीवन के हर कदम पर हमारे साथ खड़ा महसूस कराए.

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हर बच्चा अलग होता है, और हर बेटी की अपनी विशिष्ट जरूरतें होती हैं. कभी-कभी, वे अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाती, और माता-पिता के रूप में हमें उनके मनोविज्ञान को समझना होता है. उनकी जरूरतें केवल भौतिक चीजों तक सीमित नहीं होतीं; उन्हें भावनात्मक समर्थन, समझ, और सच्चे संवाद की भी जरूरत होती है.

इन सब चीजों पर आईएएनएस ने एनसीआर में ‘होप साइकोलॉजी एंड रिलेशनशिप काउंसलिंग सेंटर’ के काउंसलर विवेक वत्स से वार्ता की.

विवेक वत्स ने कहा, “अगर हम बच्चों के विकास की बात करें तो बेटियां स्वाभाविक तौर पर बेटों की तुलना में अधिक इमोशनल होती हैं. बेटियों के लिए मां का रोल सोशल डेवलपमेंट को लेकर होता है और पिता लॉजिकली अधिक इनपुट डाल पाते हैं. यानी एक बच्ची के चरित्र का इमोशनल पार्ट मां हैंडल करती है और और प्रैक्टिकल अप्रोच पिता की ओर से आता है. प्रैक्टिकल अप्रोच, यानी रोजमर्रा के जीवन में काम आने वाली स्किल्स, वह पिता की ओर से विकसित कराई जाती है.

उन्होंने बेटियों की विशेषता और आवश्यकता के बारे में बताते हुए कहा, “बेटियां छोटी उम्र से ही ‘लव और अटेंशन’ चाहती हैं. इस उम्र में भी वह लड़कों से थोड़ी अलग होती हैं. लड़कों के एग्रेसिव खेल की तुलना में बच्चियों के खेल रचनात्मक होते हैं. इस उम्र में लड़कियों के ऊपर सबसे अधिक फर्क पारिवारिक माहौल का पड़ता है. क्योंकि इस उम्र में एक बच्ची अपना अधिकांश समय परिवार के अंदर देता है. यदि बच्चे को डरा-धमकाकर रखा जाएगा, उसके साथ अधिक टोका-टाकी की जाएगी तो यह बच्चे के विकास को प्रभावित करेगा, उसके आत्मविश्वास का कम करेगा, कुछ भी करने से पहले बच्ची को लगेगा कि शायद में इसको गलत कर रही हूं.

यह सब चीजें इस बात की ओर भी इशारा करती हैं कि बेटियों और पैरेंट्स के बीच में संवाद भी कम हो चुका है. ऐसी स्थिति से बचने के लिए महत्वपूर्ण हैं कि माता-पिता अपनी बेटी की बातों को जरूर सुनें. संवाद किसी भी संबंध की नींव होती है. जब वे अपनी बात कहें, तो हमें उन्हें ध्यान से सुनना चाहिए, बिना किसी रुकावट या जजमेंट के. हालांकि कई बार पैरेंट्स यही पर पहली गलती कर जाते हैं.

इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए विवेक बताते हैं कि, “माता-पिता के तौर पर गलती हमसे यह होती कि हम बेटी को बात को सुनकर उसको राय या उपदेश पहले देना प्रारम्भ कर देते हैं. जबकि बेटी को ऐसे उपदेश से अधिक आवश्यकता है कि उनकी बातों को सुना जाए. यदि बच्ची की कोई बात ठीक भी करनी हो तो उसको अच्छे ढंग से करनी चाहिए. आपको बिटिया से बात करते हुए यह जरूर ध्यान में रखना है कि वह भविष्य में अपनी बात आपसे शेयर करेगी या नहीं. अधिक टोका-टाकी से बच्चे अगली बार अपनी बात माता-पिता से शेयर करना बंद कर देते हैं.

इसलिए सुनना बड़ी अहम चीज है. बेटी को बिना किसी रुकावट के सुनें. उसे महसूस कराएं कि आप उसकी बातों को महत्व देते हैं. जब वह अपनी भावनाएं साझा करती है, तो उसे आश्वस्त करें कि आप उसके साथ हैं. बेटी की भावनात्मक आवश्यकता पूरी करना बहुत अहम है.

इसके महत्व के बारे में बताते हुए विवेक वत्स ने आगे कहा, “हर बेटी की अपनी एक भावनात्मक आवश्यकता होती है. यदि बचपन में यह इमोशनल आवश्यकता पूरी नहीं हो पाती तो किशोर हालत में बेटी अपनी वह जरूरतें किसी और माध्यम से पूरा करने की प्रयास करती है. जैसे, यदि एक बेटी और उसके पिता का रिश्ता बहुत अच्छा नहीं है तो वह अपने जीवन में आगे एक फादर फिगर को ढूंढने की प्रयास में रहती है. महत्वपूर्ण नहीं कि उनकी यह खोज हमेशा उनको एक ठीक शख्स से ही मिलाती है.

ऐसे में यह बड़ा अहम हो जाता है कि छोटी उम्र से ही हम अपनी बेटियों की भावनाओं और सोच को बिना न्यायधीश किए समझें. उन्हें हर चीज में परफेक्ट होने का दबाव न डालें. यह ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है कि हर उम्र में उनकी जरूरतें बदलती रहती हैं. किशोरावस्था में वे अधिक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की चाह रखती हैं, और उन्हें स्पेस देने की जरूरत होती है.

विवेक वत्स ने आगे बताया, ” बेटियों की सुनने के बाद यह बहुत महत्वपूर्ण है कि उनके साथ एक संवाद स्थापित किया जाए. इसके लिए पेरेंट्स को बेटी के साथ प्रतिदिन 15-20 मिनट तक बैठकर बात करनी चाहिए. पैरेंट्स को यह जरूर समझना होगा कि बच्चे बहुत जिज्ञासू होते हैं. उनको हर चीज के बारे में जानने की ख़्वाहिश होती है. उनमें से कई चीजों को पेरेंट्स यह कहकर टाल देते हैं कि ये सब तुम्हारे मतलब का नहीं है. लेकिन इससे बच्ची की जिज्ञासा शांत होने की बजाए और बढ़ जाती है.

ऐसी स्थिति में पेरेंट्स चाहें तो किसी प्रोफेशनल की भी राय ले सकते हैं कि उनको बच्चे की जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए किस तरह से बात करनी चाहिए. आजकल की बेटियां तकनीक के साथ भी बड़ी हो रही हैं. हमें उनकी दुनिया को समझने की प्रयास करनी चाहिए, चाहे वह सोशल मीडिया हो या औनलाइन गेम्स. इससे हम उनके साथ एक बेहतर कनेक्शन बना सकते हैं. साथ ही, उन्हें नैतिकता और जिम्मेदारियों का भी महत्व समझाना चाहिए, ताकि वे एक ठीक दिशा में आगे बढ़ सकें. एक बार जब यह समझ और संवाद का पुल बना लिया जाता है, तब यह रिश्ता और भी मजबूत और अटूट हो जाता है.

 

 

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