ब्रोकली की खेती के लिए यह महीना माना जाता है उपयुक्त
वैसे सर्दियों की आरंभ के साथ बाजार में विभिन्न प्रकार की सब्जियां मौजूद होने लगती हैं। इन सब्जियों में से एक है ब्रोकली, जिसकी खेती किसानों के लिए लाभदायक साबित हो सकती है। ब्रोकली की खेती के लिए अक्टूबर और नवंबर का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। यह सब्जी न सिर्फ़ पौष्टिक है, बल्कि बाजार में इसकी मांग भी वर्ष भर बनी रहती है। ब्रोकली की कई उन्नत किस्में मौजूद हैं। किसान इन किस्मों की खेती करके अल्प समय में ही अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं। ब्रोकली की खेती से किसानों को दोहरा फायदा मिलता है। एक तो यह कम समय में तैयार हो जाती है, दूसरा बाजार में इसकी अच्छी मूल्य मिलती है।

उपकृषि निदेशक धीरेंद्र सिंह ने लोकल 18 से वार्ता में कहा कि जिले में हरी सब्जियों की खेती किसान बड़े पैमाने पर करते हैं और इन फसलों से उन्हें अच्छा फायदा होता है। वहीं, यदि किसान इस महीने किसी फसल की खेती करना चाहते हैं, तो वे ब्रोकली की कुछ उन्नत किस्मों की खेती कर सकते हैं। ठंड के मौसम में ब्रोकली की खेती के लिए अक्टूबर का महीना उपयुक्त माना जाता है और इससे किसान बहुत कम समय में बढ़िया फायदा कमा सकते हैं।
आरिया प्रजाति ब्रोकली की एक खास प्रजाति है। इस ब्रोकली का वजन अधिक होता है। इस प्रजाति के प्रत्येक फूल का वजन 1 किलो से लेकर 1.5 किलो तक होता है और फूल गहरे हरे रंग के होते हैं। फसल को तैयार होने में करीब 90 से 95 दिन का समय लगता है।
इटालियन ग्रीन स्प्राउटिंग ब्रोकली की एक विदेशी प्रजाति है, जिसे हिंदुस्तान में बहुत कम उगाया जाता है। इसके पौधों में निकलने वाले फल एकदम गोभी की तरह होते हैं, लेकिन इसका रंग हरा होता है। यह प्रजाति प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 100 क्विंटल की पैदावार देती है।
पूसा पर्पल-1 ब्रोकली एक खास प्रजाति है। इसे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र, कटराई में विकसित किया गया है। इस प्रजाति के पौधे मध्यम ऊंचाई वाले होते हैं और इसका वजन 350-450 ग्राम होता है। यह प्रजाति बुवाई के 125-140 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है और इसकी औसत उपज 16 टन प्रति हेक्टेयर है।
ग्रीन स्प्राउटिंग ब्रोकली की सबसे शीघ्र तैयार होने वाली प्रजाति है। इसके फूल 70 से 80 दिन में पैदावार देने के लिए तैयार हो जाते हैं। इसके पौधों में लगने वाले फल का सिरा गुंथा हुआ और गहरा हरा होता है। यह प्रजाति प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 120 से 150 क्विंटल की पैदावार दे सकती है।

