लाइफ स्टाइल

अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव सदस्य 7 लाख नागरिकों का प्रतिनिधित्व

सांसद औसत तौर पर 2.5 करोड़ नागरिकों का अगुवाई करता है, ऐसा माना जाता है कि हर इसकी तुलना में अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव सदस्य 7 लाख नागरिकों का अगुवाई करते हैं ऐसे ही पाक की नेशनल असेंबली में एक सदस्य 6 लाख नागरिकों का अगुवाई करता है, जबकि बांग्लादेश में यह संख्या 5 लाख नागरिकों के करीब हैNewsexpress24. Com the hindu 15 images 37

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इसी वर्ष, अब तक हिंदुस्तान में करीब 4126 सदस्य लेजिस्लेटिव असेंबली में 543 लोकसभा MP और 245 राज्यसभा MP हैं हिंदुस्तान में लोगों के कल्याण के लिए बहुत कम सांसद और असेंबली सदस्य हैं सीमित अगुवाई हमारे लोकतांत्रिक ढांचे की पहली पसंद लगता है

हालांकि, हिंदुस्तान में जमीन स्तर से जुड़े कई नेता है, 1000 से अधिक म्युनिसिपल काउंसिल/ कॉरपोरेशन, जिनमें 50 से 100 वार्ड और करीब 2,38,000 पंचायत ( प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार) साथ ही 5 से 30 सदस्य राज्य और केंद्र के स्तर पर मौजूद हैं, लेकिन यदि गंभीर समस्याओं को उठाना हो और कानून को ठीक ढंग से बनाना हो तो निश्चित तौर पर यह संख्या बहुत कम है

हमारा सियासी सिस्टम अप्रभाजन की परेशानी से पीड़ित है अप्रभाजन में विभिन्न चुनाव क्षेत्रों में लोगों का अनुपात भिन्न-भिन्न होता है हिंदुस्तान में कुछ ही राज्यों से सबसे अधिक नेता चुन कर आते हैं

वहीं, हिंदुस्तान के उलट अमेरिका में ऐसा सियासी सिस्टम है, जो अप्रभाजन पैदा करता है, US की सीनेट में हर राज्य से दो सीनेटर आते हैं, जिससे महत्वपूर्ण होने पर भी और अधिक सीनेटर नही चुने जा सकते, जिससे सत्ता के गैरबराबर विभाजन को बल मिलता है

यह एक समरूप ( जहां एक ही जैसे लोग रहते हों ) राष्ट्र में सरल है, जहां बाईप्लानिंग -पार्टी ( दो पार्टी ही चुनाव लड़ते हैं) सिस्टम लागू है और हर राज्य में वही दो पार्टियां चुनाव लड़ती हैं

भारत में जहां अनेक राज्यों में बहुत भिन्नता है वहां अप्रभाजन से कुछ ही सियासी इकाइयों को अन्य की तुलना में अधिक ताकत मिलेगी दक्षिण और उत्तर–पूर्व के राज्यों में अन्य सियासी संस्कृति बढ़ने के कारण, सावधान रहने की आवश्यकता है

परिसीमन पर एक विचार

परिसीमन ( मौजूदा सीमा में परिवर्तन ) से इस असंतुलन को सुधारा जा सकता है, पहले भी ऐसा हो चुका है चार बार कमीशन का गठन एक स्वतंत्र इकाई के रूप में हुआ, ताकि परिसीमन किया जा सके

1976 में, आपातकालीन के दौरान लोकसभा की सीटों को स्थिर कर दिया गया और परिसीमन को 2001 तक टाल दिया गया इसके पीछे फैमिली प्लानिंग से जुड़े नीतियों का हवाला दिया गया और बोला गया कि वह प्रदेश जहां फैमिली प्लानिंग बेहतर ढंग से लागू है उन्हें परिसीमन से हानि होगा

परिसीमन तब प्रारम्भ हो सकता था, जब विभिन्न राज्यों ने अपने प्रजनन दर को कम कर लिया था

फरवरी 2002 में, 84 अमेंडमेंट एक्ट ऑफ कांस्टीट्यूशन लाया गया, जिसने 2026 के बाद के बाद होने वाली पहली जनगणना ( 2026 ) तक सीटों की संख्या स्थिर कर दी वैसे 2021 की जनगणना टल चुकी है ( अब 2024 में होने की आसार है, जिसके नतीजे 2026 तक आयेंगे ) परिसीमन को और जल्द करने का एक मौका है

हालांकि, परिसीमन के अपने नतीजे होंगे 1971 में राजस्थान की जनसंख्या 2.5 करोड़ थी जो 2011 में 6.8 करोड़ हो गई जबकि इसी समय में केरल की जनसंख्या 2.1 करोड़ से बढ़ कर 3.3 करोड़ हो गई इसी तरह 2019 के आम चुनाव में यूपी के हर सांसद ने 30 लाख वोटर का अगुवाई किया, जबकि लक्षद्वीप के एक सांसद ने 55000 वोटर का अगुवाई किया

अगर मान लिया जाए कि संसद में सीटों की संख्या बढ़कर 753 हो जाती है, उस स्थिति में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल की सीटें 6% बढ़ेंगी, जबकि कर्नाटक की 11% तक बढ़ सकती हैं

उसी समय, उत्तर के राज्य जैसे यूपी बिहार मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीटें 63% बढ़ जाएंगी यदि परिसीमन को पहले की तरह ही किया जाए तो हिंदी भाषी राज्यों की तरफ एक झुकाव होगा और इससे कुछ राष्ट्रीय पार्टियां ही सत्ता तक पहुंचेगी

ऐसे राज्य जिन्होंने अपनी जनसंख्या के विकास रेट को कम किया है जैसे तमिलनाडु और केरल, उन्हें हानि होगा परिसीमन होना तय है, मगर इसके नुकसानदायक नतीजों को कम किया जा सकता है पहला, संसद में सीटों की संख्या बहुत बढ़ानी पड़ेगी ( कम से कम 848 सीटें जिससे किसी भी राज्य को सीटें ना गवानी पड़ें ), ऐसा करने से लोकतांत्रिक अगुवाई का अनुपात सुधरेगा

परिसीमन सिर्फ़ जनसंख्या के आधार पर नहीं होना चाहिए भौगोलिक, आर्थिक कार्य कुशलता, भाषा, और बराबरी की भावना भी दिखनी चाहिए सरल भाषा में कहे तो संसद में सिक्किम की भी आवाज सुनाई देनी चाहिए, भले ही बिहार की जनसंख्या अधिक हो

परिसीमन का राज्यों को मिलने वाली राशि और उनके ऊपर पड़ने वाले आर्थिक असर पर भी दोबारा विचार की आवश्यकता है

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