कीटनाशकों से होने वाली हानियों से बचने के लिए इस प्रभावी तरल पदार्थ का करें इस्तेमाल
छत्तीसगढ़ में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए इंदिरा गांधी कृषि यूनिवर्सिटी रायपुर द्वारा किए जा रहे प्रयासों से किसानों को नयी दिशा मिल रही है। इसी क्रम में प्रमुख वैज्ञानिक डाक्टर सुनील कुमार ने कीटों से बचाव के लिए एक कारगर जैविक विधि ब्रह्मास्त्र की जानकारी दी है, जो रसायन मुक्त खेती करने वाले किसानों के लिए अत्यंत फायदेमंद सिद्ध हो रही है।

प्रमुख वैज्ञानिक डाक्टर सुनील कुमार के मुताबिक ब्रह्मास्त्र एक पारंपरिक जैविक घोल है, जिसका छिड़काव फसलों पर करके फल भेदक, फली भेदक और रस चूसने वाले कीटों से कारगर बचाव किया जा सकता है। रसायनिक कीटनाशकों की तुलना में यह सस्ता, सुरक्षित और मिट्टी के लिए अनुकूल है। इसके इस्तेमाल से न सिर्फ़ फसल सुरक्षित रहती है, बल्कि उत्पादन की गुणवत्ता भी बनी रहती है।
ब्रह्मास्त्र बनाने के लिए नीम की पत्ती 3 किलो, करंज, बेल, पपीता और सीताफल की पत्तियां 2-2 किलो की मात्रा में ली जाती हैं। इन सभी पत्तियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर चटनी बना ली जाती है। इसके बाद इस मिश्रण को 10 लीटर गौमूत्र में मिलाया जाता है। इस घोल को 20 से 25 मिनट तक धीमी आंच में उबाला जाता है ताकि उसकी मात्रा 5 से 6 लीटर तक सघन हो जाए। फिर इस घोल को दो दिनों तक ठंडा होने के लिए छोड़ दिया जाता है। अंत में इसे छानकर एकत्र किया जाता है। इस तरह 48 घंटे बाद जैविक ब्रह्मास्त्र तैयार होता है।
इस घोल को इस्तेमाल करने के लिए 15 लीटर पानी में लगभग 300 से 400 एमएल ब्रह्मास्त्र मिलाकर छिड़काव किया जाता है। खास बात यह है कि इसका इस्तेमाल कीट लगने के बाद नहीं, बल्कि पहले से ही रोकथाम के तौर पर हर 15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए। जैविक खेती में रसायनिक दवाओं की तरह तेज़ असर नहीं होता, इसलिए नियमित रूप से इसका छिड़काव करना महत्वपूर्ण होता है। डाक्टर सुनील कुमार कहते हैं कि जैविक खेती में कीटों को मारने की बजाय उन्हें फसल से दूर रखना अधिक जरूरी है। ब्रह्मास्त्र की कड़वाहट और तीव्र गंध से कीट फसलों से दूर रहते हैं और हानि नहीं पहुंचाते।
छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में यह तकनीक तेजी से लोकप्रिय हो रही है। कई किसान अब रसायनों से दूरी बनाकर जैविक विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं। ब्रह्मास्त्र न सिर्फ़ पर्यावरण के लिए सुरक्षित है बल्कि किसानों की जेब पर भी भारी नहीं पड़ता। यह विधि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण स्तर पर सहजता से अपनाई जा सकती है और इससे जैविक खेती को नयी गति मिल सकती है। वैज्ञानिकों का यह कोशिश किसानों के भलाई में एक बड़ा कदम बताया जा रहा है, जिससे राज्य में सतत और सुरक्षित खेती को बढ़ावा मिलेगा।

