वट सावित्री पूजन और व्रत करने के जाने तरीके
देवघर. हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का व्रत खास महत्व होता है. इस दिन वट वृक्ष की पूजा का विधान है. मान्यता है कि वटवृक्ष में भगवान शिव, भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी का वास होता है. सुहागिन स्त्री इस दिन अपने पति की लंबी उम्र की कामना लिए वटवृक्ष की पूजा आराधना करती हैं. हर वर्ष वट सावित्री पूजन जेठ मास की अमावस्या तिथि को किया जाता है. पूजा हमेशा विधि विधान के साथ करनी चाहिए. तभी शुभ फल की भी प्राप्ति होती है. इस साल, जो नयी नवेली दुल्हन है. वह वट सावित्री पूजन और व्रत कैसे करें, जानते हैं देवघर के ज्योतिषाचार्य से?
क्या कहते हैं देवघर के ज्योतिषाचार्य?
देवघर के पागल बाबा आश्रम स्थित मुद्गल ज्योतिष केंद्र के मशहूर ज्योतिषाचार्य पंडित नंद किशोर मुद्गल ने लोकल 18 के संवाददाता से वार्ता करते हुए बोला कि इस वर्ष 26 मई को वट सावित्री व्रत रखा जाएगा. वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए एवं संतान सुख की प्राप्ति के लिए रखती हैं. कई महिलाएं इसे निर्जला व्रत रखती हैं. तो कई महिलाए फलाहार खा कर इस व्रत को रखती है. वटवृक्ष की पूजा आराधना और व्रत का पालन पूरे विधि विधान के साथ ही करनी चाहिए. तभी शुभफल की प्राप्ति होती है.
कैसे रखें नयी नवेली दुल्हन वट सावित्री व्रत?
ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि 26 मई को वट सावित्री व्रत रखा जाएगा और 27 मई को पूजन किया जाएगा, जो नयी नवेली दुल्हन है यानी जो पहली बार वट सावित्री व्रत रखेंगी वह निराहार नहीं बल्कि फ़लाहार रहकर व्रत का पालन करेगी. वहीं अगले दिन वट वृक्ष की पूजा के लिए एक बांस की टोकरी मे सारा पूजन सामग्री, जिसमें बस का पंखा अवश्य होना चाहिए और भगवान शिव की तस्वीर लेकर वट वृक्ष के पास जाए और पंचोउपचार विधि से पूजा करें. वट वृक्ष में गंगाजल, कच्चा दूध, चावल, नवेद्य, अर्पण अवश्य करें. इसके साथ ही रोली, चंदन, अक्षत,पान, सुपरी, फूल, फल, और चना अवश्य चढ़ाये.
इसके बाद वट वृक्ष मे 11 बार रोली लपेटकर 11 बार परिक्रमा करे.पूजा समापन के बाद वट सावित्री की कथा अवश्य सुननी चाहिए. उस दिन दान का भी महत्व है इसलिए श्रृंगार की वस्तुएँ और चना अवश्य दान करें, लेकिन नयी नवेली दुल्हन लाल वस्त्र पहनकर ही पूजा आराधना करें. ऐसा करते है, तो अखंड सौभाग्यवती का आशीर्वाद प्राप्त होगा.

