एक्सिडेंट विक्टिम्स को मिलेगा डबल मुआवजा
हाईकोर्ट के सामने यह मुकदमा न्यू इण्डिया एश्योरेंस की तरफ से दाखिल किया गया था। न्यायमूर्ति एएस चंदुर्कर, मिलिंद जाधव और गौरी गोडसे की पूर्ण बेंच के सामने एमएसीटी न्यायालय द्वारा चिकित्सा खर्चों के लिए प्रदान किए गए मुआवजे को चुनौती दी थी। बोला गया कि दावेदार को पहले से ही अपनी निजी मेडिक्लेम पॉलिसी के अनुसार चिकिस्ता खर्च मिल चुका है। ऐसे में अब उनपर इस उपचार का खर्च नहीं नहीं डाला जाना चाहिए। वर्ष 2013 में, उच्च न्यायालय का यह मानना था कि मेडिक्लेम पॉलिसी के अनुसार प्राप्त राशि को चिकित्सा खर्चों के लिए दिए जाने वाले मुआवजे की राशि से काटा जा सकता है। हालांकि वर्ष 2006 और 2019 में अन्य बेंचों ने इसी तरह के मामलों में अलग रुख अपनाया था।

बीमा कंपनियों का क्या था तर्क
बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि दावेदार द्वारा सहन किए गए हानि का दावा सिर्फ़ एक बार किया जा सकता है, न कि कई बार। दोनों को अनुमति देना “दावेदार के लिए अप्रत्याशित फायदा या ऐसी स्थिति में दोहरा मुआवजा” होगा। दावेदार ने बोला कि मेडिक्लेम पॉलिसी बीमाकर्ता और बीमाधारक के बीच एक अनुबंध पर आधारित होती है। ऐसी पॉलिसी के अनुसार पक्षों के अधिकार अनुबंधीय शर्तों द्वारा शासित होते हैं। इसे कम नहीं किया जा सकता। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 168 के तहत, दावेदार “उचित मुआवजे” के हकदार हैं जो कि गुनेहगार वाहन के बीमाकर्ता द्वारा दिया जाना है। यह दायित्व कानूनी है और “अनिवार्य थर्ड पार्टी इंश्योरेंस पॉलिसी” की अवधारणा से उत्पन्न होता है।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्णय पर बनी सहमति
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के 2019 के निर्णय से सहमति व्यक्त की, जिसमें बोला गया था कि बीमाकर्ता को दोनों बार भुगतान करना होगा। जो पीड़ित अपने मेडिक्लेम पॉलिसी से प्राप्त करता है, वह प्रीमियम के भुगतान का प्रतिफल होता है। यह वह कड़ी मेहनत की कमाई है जो वह प्रीमियम की ओर लगाता है, जो कि हादसा के बाद उसे वापस कर दी जाती है। पीड़ित को अपने मेडिक्लेम पॉलिसी के अनुसार प्राप्त होने वाला प्रतिफल सांत्वना धन यानी कंसोलमेंशन राशि है। इसे “लाभ” या दोहरा फायदा के रूप में संकीर्ण दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता।

