अरविंद केजरीवाल को सीबीआई द्वारा गिरफ्तारी पर 18 जुलाई को होगी सुनवाई
How प्रवर्तन निदेशालय Works : अरविंद केजरीवाल को उच्चतम न्यायालय ने शराब घोटाला मुद्दे में 12 जुलाई को जमानत दे दी है। Directorate of Enforcement यानी प्रवर्तन निदेशालय ने अरविंद केजरीवाल को 21 मार्च को अरैस्ट किया था उसके बाद से वे कारावास में हैं। उच्चतम न्यायालय से जमानत मिलने के बाद भी अभी वे कारावास में हैं क्योंकि CBI ने भी उन्हें अरैस्ट किया है। शराब घोटाला मुद्दे में करप्शन निवारण अधिनियम के अनुसार CBI ने उनकी गिरफ्तारी की है, 18 जुलाई को इस मुद्दे में सुनवाई होनी है।
ईडी द्वारा दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी का मुद्दा पूरे राष्ट्र में चर्चा का केंद्र बना रहा। यहां यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि आखिर प्रवर्तन निदेशालय कैसे किसी आदमी को अरैस्ट करती है और क्या हैं उसकी शक्तियां?
क्या है प्रवर्तन निदेशालय और कब हुआ था गठन
ईडी फाइनांस डिपार्टमेंट का एक विंग है और यह आर्थिक अपराधों और विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन की जांच करती है। प्रवर्तन निदेशालय की स्थापना1956 में हुई थी। उस समय यह संगठन विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947 के भीतर विनिमय नियंत्रण उपायों के उल्लंघन को रोकने के लिए कार्य करता था। प्रवर्तन निदेशालय की जिम्मेदारी तब अधिक बढ़ गई जब राष्ट्र में एक नया एक्ट धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 (Prevention of Money Laundering Act, 2002) बना और प्रवर्तन निदेशालय को पीएमएलए के अनुसार जांच करने का जिम्मा सौंपा गया। धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 एक जुलाई 2005 से कारगर हुआ है।
ईडी कैसे करती है काम और क्या हैं अधिकार
वरिष्ठ पत्रकार शकील अख्तर ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय उन मामलों की जांच करती हैं, जिसमें काला धन को व्हाइट मनी किया गया हो, साथ ही विदेशों से पैसे के लेन-देन में यदि कोई गड़बड़ी हुई हो यानी फेमा कानून में कोई गड़बड़ी हुई हो तो उसकी जांच भी प्रवर्तन निदेशालय करता है। आम आदमी की भाषा में कहें तो काला धन को व्हाइट मनी बनाने के पीछे जो हथकंडे अपनाए जाते हैं, उनकी जांच प्रवर्तन निदेशालय करती है। आजकल राष्ट्र में मनी लाॅड्रिंग के मुद्दे काफी बढ़ गए हैं, इसलिए प्रवर्तन निदेशालय का दखल भी कई मामलों में बढ़ गया है।
गिरफ्तारी के संबंध में प्रवर्तन निदेशालय के विशेषाधिकार
शकील अख्तर बताते हैं कि धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 ने प्रवर्तन निदेशालय को कई विशेष अधिकार दिए हैं, जिसके अनुसार प्रवर्तन निदेशालय कार्रवाई करती है। प्रवर्तन निदेशालय को यह विशेषाधिकार है कि यदि उसे यह शंका हो कि कोई आदमी मनी लाॅड्रिंग के मुकदमा में शामिल हो सकता है, तो वह उसकी गिरफ्तारी कर सकती है। एक्ट के सेक्शन 19 में इस बात का प्रावधान है।
धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 के अनुसार प्रवर्तन निदेशालय जब किसी को समन करती है, तो वह यह बताने के लिए बाध्य नहीं है कि वह संबंधित आदमी को गवाह के तौर पर बुला रही है या फिर आरोपी के तौर पर। साथ ही किसी आदमी के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए भी प्रवर्तन निदेशालय को संबंधित सरकारों से अभियोजन स्वीकृति भी नहीं लेनी पड़ती है। साथ ही सेक्शन 16 के अनुसार प्रवर्तन निदेशालय को किसी मुद्दे में सर्वे करने का भी अधिकार होता है।
ईडी कितना समन भेजेगी इसकी संख्या निर्धारित नहीं
ईडी के विशेषाधिकारों की बात करते हुए अधिवक्ता अवनीश रंजन मिश्रा ने कहा कि धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 में संसद द्वारा पारित हुआ, लेकिन कारगर हुआ 1 जुलाई 2005 से। इस अधिनियम के अनुसार 3 से 7 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। यह संज्ञेय और गैर जमानती क्राइम है।
ईडी को अपने अनुसंधान के दौरान समन भेजने का अधिकार है और समन कितना भेजा जाएगा, इसकी संख्या निर्धारित नहीं है। प्रवर्तन निदेशालय वैसे डॉक्यूमेंट्स आधारित अनुसंधान करता है, इसलिए पूछताछ के दौरान जो बातें सामने आती हैं उनसे मुकरना आरोपी के लिए बहुत कठिन हो जाता है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि किसी आदमी के खाते में यदि एक करोड़ रुपए आते हैं और वह आईटीआर उससे संबंधित नहीं डालता है, तो उसके लिए अपना बचाव करना कठिन होगा और उसे यह मानना होगा कि प्रवर्तन निदेशालय के इल्जाम ठीक हैं।

