ब्रिटेन की कानूनी व्यवस्था भारत के मुकाबले है काफी लचीली
किसी भी मुद्दे में सबूत के अतिरिक्त यदि कोई सबसे अहम किरदार निभाता है तो वह होता है- गवाह. हालांकि, अक्सर सुरक्षा और भय के कारण गवाह पुलिस और न्यायालय के सामने आकर गवाही नहीं देते. इस कारण मुजरिम अपराध करने के बाद भी बच जाता है.

ब्रिटेन में गवाही केवल एक नागरिक कर्तव्य नहीं है बल्कि यदि यहां कोई गवाही देता है तो उसे गवर्नमेंट से वित्तीय सहायता देने की अनूठी प्रबंध है. आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षा और मुआवजा भी दिया जाता है. यह हिंदुस्तान की न्यायिक प्रबंध से बहुत अलग है. हिंदुस्तान में गवाहों की भागीदारी नैतिक और नागरिक कर्तव्य पर आधारित है.
ब्रिटिश न्यायिक प्रणाली में गवाहों का महत्व जांच में पारदर्शिता को बढ़ाता है. जबकि हिंदुस्तान में गवाहों को सुरक्षा उपलब्ध कराने की योजना उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती. गवाहों को सुरक्षा नाम मात्र की मिलती है. सुरक्षा और प्रोत्साहन नहीं मिलने से गवाह असुरक्षित महसूस करते हैं. इसी कारण वह किसी क्रिमिनल के विरुद्ध गवाही देने से झिझकता है. भारतीय न्यायिक प्रबंध कई स्तरों पर साक्ष्यों की जांच पर आधारित है.
यह प्रक्रिया काफी लंबी है इस वजह से धीमी है. इस कारण मुकदमा का निर्णय आने में लंबा समय लगता है. इससे बैकलॉग बढ़ता जाता है. इसके विपरीत, ब्रिटेन में जूरी प्रणाली है, यह न्यायिक प्रक्रिया की लोकतांत्रिक प्रबंध है.
इसके इस्तेमाल से मुकदमों का निपटारा शीघ्र होता है और मुकदमों का बैकलाॅग भी नहीं होता. क्राउन न्यायालय ऑफ इंग्लैंड एंड वेल्स के आंकड़ों के मुताबिक 2023 में बैकलॉग मात्र 38% था. 62235 मामलों में से 23650 का निस्तारण किया गया. ब्रिटेन की कानूनी प्रबंध हिंदुस्तान के मुकाबले काफी लचीली है.
दरअसल, ब्रिटेन में कोई लिखित कानून नहीं है. इससे न्यायधीश किसी भी नयी चुनौती पर भी निर्णय लेने में सक्षम होते हैं. इसके उलट हमारे यहां लिखित कानून है. हमारे राष्ट्र के कानून में कोई भी बदलाव लाने के लिए विधायी प्रक्रिया की आवश्यकता होती है. जो काफी लंबी है. न्यायधीश के सामने नयी चुनौती आने पर ज्यादातर मामलों में वह सक्षम नहीं होते हैं.
भारत में गवाहों की सुरक्षा योजना को लेकर काम करने की जरूरत: एक्सपर्ट
एक्सपर्ट कहते हैं कि हमारे यहां गवाहों की सुरक्षा योजना को लेकर काम करने की आवश्यकता है. जिससे गवाह सुरक्षित और आर्थिक रूप से प्रोत्साहित महसूस कर सकें. हिंदुस्तान ब्रिटेन से इस मुद्दे में सीख सकता है. इसके अतिरिक्त जजों की संख्या को बढ़ा कर भी मुकदमों के बैकलॉग को कम किया जा सकता है.

