राष्ट्रीय
पिछड़े गांवों में चलाया जाएगा बाल-विवाह मुक्त भारत अभियान
देश में बाल शादी की प्रथा को रोकने, बढ़ते बाल-विवाह से प्रभावित बच्चों के जीवन को इन त्रासद परम्परागत रूढ़ियों की बेड़ियों से मुक्ति दिलाने के लिये गवर्नमेंट ने बाल-विवाह मुक्त हिंदुस्तान अभियान की आरंभ करके एक सराहनीय एवं स्वागतयोग्य उपक्रम से हौसला और परिवर्तन की मिसाल कायम की है. यह एक शुभ संकेत एवं श्रेयस्कर जीवन की दिशा है. यह किसी समाज के लिये बहुत नकारात्मक टिप्पणी है कि सदियों के कोशिश के बावजूद वहां बाल शादी की कुप्रथा विद्यमान है.

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यहां यह विचारणीय तथ्य है कि समाज में ऐसी प्रतिगामी सोच क्यों पनपती है? क्यों लोग परंपराओं के खूंटे से बंधकर अपने मासूस बच्चों एवं बचपन से खिलवाड़ करते हैं? हमें यह भी सोचना होगा कि कानून की कसौटी पर अस्वीकार्य होने के बावजूद बाल शादी की परंपरा क्यों जारी है? ‘बाल शादी मुक्त हिंदुस्तान अभियान’ की आरंभ दूरगामी मानवीय सोच से जुड़ा एक संवेदनशील आह्वान एक नयी सुबह की आहट एवं क्रांति के विस्फोट की आसार है. यह अभियान केवल एक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि एक संकल्प है, एक रोशनी है, एक मंजिल है, एक सकारात्मक दिशा है. एक वादा है देशभर में बाल शादी पर जागरूकता फैलाने और खत्म करने का. यह नये भारत-सशक्त हिंदुस्तान की बुनियाद है. बाल शादी रोकने के तमाम कार्यों, योजनाओं और कानूनों के बावजूद यदि सफलता नहीं मिल रही है, तो जाहिर है, एक विशेष अभियान छेड़कर केन्द्र गवर्नमेंट ने सराहनीय कदम उठाया है. यह राष्ट्रीय अभियान पीएम मोदी की 22 जनवरी, 2015 को प्रारम्भ की गई प्रमुख योजना ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ की कामयाबी से प्रेरित है, जो विकसित हिंदुस्तान के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए लड़कियों के बीच शिक्षा, कौशल, उद्यम और उद्यमिता को बढ़ावा देने एवं बेटियों की आशाओं, आकांक्षाओं, संकल्पों से भरे सपनों की उड़ान को खुला आसमान देने में सक्षम होगा.
यह सुखद बात है कि बाल शादी मुक्त हिंदुस्तान बनाने के लिए गवर्नमेंट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से 2029 तब बाल शादी की रेट को पांच फीसदी से नीचे लाने के मकसद से विशेष कार्य योजना बनाने का आग्रह किया है. यह बचपन की मासूमियत छीनने वाली ‘बालविवाह’ की बेड़ियों को तोड़ते हुए जागृति का एक शंखनाद किया है, एक समाज-क्रांति के बीज को रोपा गया है. सभी जानते हैं कि कम उम्र के बच्चे अपने भविष्य के जीवन के बारे में परिपक्व निर्णय लेने में सक्षम नहीं होते. साथ ही वे इस स्थिति में भी नहीं होते कि उनके जीवन पर थोपे जा रहे निर्णय का मुखर विरोध कर सकें. उनके सामने आर्थिक स्वावलंबन का भी प्रश्न होता है. लेकिन अभिभावक क्यों इस मुद्दे में दूरदृष्टि नहीं रखते? ठीक अर्थ में बाल शादी बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ ही है. इसीलिये बाल-विवाह पर दाखिल एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने भी बोला कि कानून परंपराओं से ऊपर है. न्यायालय का कथन तार्किक है कि जिन बच्चों की कम उम्र में विवाह करा दी जाती है क्या वे इस मुद्दे में तार्किक और परिपक्व सोच रखते हैं?
सुप्रीम न्यायालय ने बोला भी है कि यह समय की मांग है कि इस कानून को लागू करने के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर किया जाए. इस मामले में उन समुदायों और धर्मों के लोगों को कहा जाना चाहिए कि बाल शादी कराया जाना एक आत्मघाती कदम है. यह समझना मुश्किल नहीं है कि कम उम्र में शादी कालांतर जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य के लिये भी खतरनाक साबित होता है. उनकी पढ़ाई ठीक से नहीं हो पाती और वे अपनी आकांक्षाओं का कैरियर भी नहीं बना सकते. ऐसे में उच्चतम न्यायालय का कथन इस सामाजिक बुराई के उन्मूलन में मार्गदर्शक की किरदार निभाता है. केंद्रीय मंत्री ने उचित ही बोला है कि बाल शादी मानवधिकारों का उल्लंघन और कानून के अनुसार क्राइम है. अच्छी बात है, गवर्नमेंट ने अब एक तरह से मान लिया है कि कानून को जितना काम करना था, उसने किया इसके आगे अब विशेष अभियान की आवश्यकता है. बाल शादी को रोकने के लिए अकेले कानून के भरोसे न बैठते हुए ठोस जागृति-अभियान की अपेक्षा है. अब गवर्नमेंट ने इस सामाजिक बुराई को जड़ से खत्म करने के लिये कमर कसी है, तो उसका स्वागत होना चाहिए एवं इस अभियान को व्यापक रूप देना चाहिए.
बाल शादी की कुरीति को राष्ट्र में व्यापकता से देखने को मिलना दुर्भाग्यपूर्ण है. यह मानवाधिकार उल्लंघन का सबसे खराब स्वरूप है. ठोस प्रयासों के बावजूद आज भी लगभग पांच में से एक लड़की का शादी विधि सम्मत उम्र 18 साल से पहले कर दिया जाता है. किसी शहर में यदि एक शादी सत्र में 1000 शादियां होती हैं, तो उनमें से 200 शादियों में दुल्हन की उम्र विवाह लायक वैध नहीं होती. बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने बुधवार को यह भी कहा कि पिछले एक वर्ष में लगभग दो लाख बाल शादी रोके गए हैं. मतलब, सामाजिक संस्थाएं और पुलिस काम तो कर रही हैं, पर मंजिल अभी दूर है. बाल शादी की सर्वाधिक संख्या पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, राजस्थान, बिहार, झारखण्ड, असम और आंध्रप्रदेश में है. राष्ट्र में 300 ऐसे जिले हैं, जहां बाल शादी की रेट राष्ट्रीय औसत से अधिक है. ऐसा लग रहा है, लोग बेटियों का जीवन तो बचा रहे हैं, प्राथमिक शिक्षा भी देने लगे हैं, पर उन्हें अधिक पढ़ाने और आगे बढ़ाने पर उनका ध्यान नहीं है. बेटियों की जब कम उम्र में विवाह होती हैं तो श्रम बल के रूप में न सिर्फ़ उनकी उत्पादकता, बल्कि राष्ट्र की क्षमता पर भी असर पड़ता है.
बाल शादी मुक्त हिंदुस्तान अभियान पीएम मोदी के साल 2047 तक ‘विकसित भारत’ की भविष्य दृष्टि से प्रेरित नये समाज की संरचना का दूरगामी प्रकल्प है. बच्चों पर बाल शादी थोपना उनके अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्र ख़्वाहिश का भी दमन है. भले ही विवशता में वे इस थोपे हुए शादी के लिये राजी हो जाएं, लेकिन उसकी कसक जीवन पर्यंत बनी रहती है. जो उनके स्वाभाविक विकास में एक बड़ी बाधा बन जाता है. निश्चय ही इस मामले में परिवर्तन लाने के लिये कानून में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाने के साथ ही समाज में जागरूकता लाने की भी आवश्यकता है. इन सब दृष्टियों से यह अभियान सदियों से चली आ रही इस त्रासद परम्परा से मुक्ति का माध्यम बनेगा. पढ़ी-लिखी लड़की यदि विवाह-योग्य उम्र से ब्याही जाए, तो वह परिवार और समाज के लिए उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है. कम उम्र में शादी से न सिर्फ़ संतानों की गुणवत्ता बल्कि परिवार की आर्थिक, सामाजिक और मनावैज्ञानिक क्षमता पर भी असर पड़ता है.
संयुक्त देश की एक रिपोर्ट में यह बोला गया है कि बाल शादी रेट में सबसे जरूरी वैश्विक गिरावट दक्षिण एशियाई राष्ट्रों में देखी गई है, जिसमें हिंदुस्तान ने जरूरी किरदार निभाई है. नए अभियान के अन्तर्गत इस परम्परागत विसंगति एवं विडम्बना को दूर करने के लिये व्यापक कोशिश किये जायेंगे. प्रारंभिक कार्ययोजना के अन्तर्गत बाल शादी रोकने के लिए बाल शादी मुक्त हिंदुस्तान पोर्टल का भी शुरुआत किया गया है. इस पोर्टल के जरिये बाल शादी के विरोध में जागरूकता बढ़ाई जाएगी, बाल शादी की कम्पलेन भी यहां दर्ज कराई जा सकती है एवं कार्य प्रगति की नज़र भी की जाएगी. इस पोर्टल को ठीक ढंग से चलाया गया, गांवों और पंचायतों से जोड़ लिया गया, तो इसके सकारात्मक रिज़ल्ट आ सकते है. बाल शादी मुक्त अभियान राष्ट्र भर में युवा लड़कियों के सशक्तिकरण के गवर्नमेंट के प्रयासों का प्रमाण है. यह प्रगतिशील और समतापूर्ण समाज सुनिश्चित कर हर बच्चे की क्षमता को पूर्णता से साकार करेगा. इस अभियान का संदेश 25 करोड़ नागरिकों तक पहुंचने की आशा है. यह निर्विवाद है कि राष्ट्र को विकसित बनाने के लिए स्त्रियों की पूरी शक्ति का इस्तेमाल महत्वपूर्ण है और स्त्री शक्ति बढ़ाने के लिए बाल शादी को रोकना ही होगा. आज सामाजिक सोच एवं ढांचे में बदलाव लाने की आरंभ हो गयी है, इसमें सृजनशील सामाजिक संस्थाओं का सहयोग भी जरूरी होगा. जरूरत है वे अपने सम्पूर्ण दायित्व के साथ आगे आये. अंधेरे को कोसने से बेहतर है, हम एक मोमबत्ती जलाएं.