राष्ट्रीय
कोयंबटूर सीरियल बम धमाकों के मास्टरमाइंड एसए बाशा का हुआ निधन
कोयंबटूर: 1998 के कोयंबटूर सीरियल बम धमाकों के मास्टरमाइंड एसए बाशा का 16 दिसंबर को उम्र संबंधी रोंगों के कारण मृत्यु हो गया. 84 वर्षीय बाशा प्रतिबंधित संगठन अल-उम्मा के संस्थापक-अध्यक्ष थे और उन धमाकों के लिए जीवन भर जेल की सजा काट रहे थे, जिनमें 58 लोगों की जान चली गई थी और 231 लोग घायल हुए थे. मंगलवार शाम को होने वाले बाशा के आखिरी संस्कार के दौरान किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए कोयंबटूर में पुलिस की बड़ी तैनाती की गई है. इस उद्देश्य के लिए लगभग 2,000 पुलिस ऑफिसरों को तैनात किया गया है.

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अंतिम संस्कार जुलूस के मद्देनजर शहर में पुलिस बल तैनात
एक अधिकारी ने कहा कि मंगलवार शाम को बाशा के प्रस्तावित आखिरी संस्कार जुलूस के मद्देनजर शहर में पुलिस बल तैनात किया गया है. भारतीय नेशनल लीग पार्टी के नेता जे रहीम ने कहा, “वह पैरोल पर था और पिछले कुछ समय से उसकी तबीयत ठीक नहीं थी. तबीयत बिगड़ने पर उसे एक निजी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था और 35 वर्ष कारावास में रहने के बाद सोमवार शाम को उसकी मृत्यु हो गई.“
1998 के धमाकों के सिलसिले में जीवन भर जेल की सजा काट रहे थे
84 वर्षीय बाशा और अल-उम्मा के 16 अन्य लोग 1998 के धमाकों के सिलसिले में जीवन भर जेल की सजा काट रहे थे. हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट ने उसे पैरोल दी थी. पुलिस ने कहा कि बाशा के परिवार के सदस्य दक्षिण उक्कदम से फूल बाजार स्थित हैदर अली टीपू सुल्तान सुन्नत जमात मस्जिद तक आखिरी संस्कार जुलूस निकालने की योजना बना रहे हैं. उन्होंने बोला कि किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए पर्याप्त पुलिस बल तैनात किया गया है.
बाशा प्रतिबंधित संगठन अल-उम्मा का संस्थापक-अध्यक्ष है और उसने 14 फरवरी को सिलसिलेवार बम विस्फोटों की योजना बनाई थी जिसमें 58 लोगों की जान चली गई थी. पुलिस ने कहा कि विस्फोटों में 231 लोग घायल हुए थे. मई 1999 में, अपराध ब्रांच सीआईडी की विशेष जांच टीम ने बाशा के विरुद्ध एक आरोपपत्र दाखिल किया, जिसमें उस पर आत्मघाती दस्ते का इस्तेमाल करके बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी की मर्डर की षड्यंत्र रचने का इल्जाम लगाया गया.
इस बीच, बीजेपी तमिलनाडु के उपाध्यक्ष नारायणन तिरुपति ने पुलिस से आखिरी संस्कार जुलूस की अनुमति न देने का आग्रह किया है, क्योंकि यदि किसी अपराधी, आतंकवादी, हत्यारे को शहीद के रूप में सम्मानित किया जाता है, तो इससे समाज में एक बुरी मिसाल कायम होगी.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में तिरुपति ने कहा, “इसमें कोई शक नहीं है कि किसी भी आदमी को, चाहे वह कितना भी निर्दयी कातिल क्यों न हो, अपने आखिरी संस्कार की अनुमति दी जानी चाहिए, लेकिन यह शांतिपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए, न कि किसी बड़े सम्मान के साथ, जिसके वे हकदार नहीं हैं.” उन्होंने दावा किया कि कट्टरपंथी विचार और हिंसा, और सांप्रदायिक समस्याएं 1998 के कोयंबटूर बम विस्फोटों से प्रारम्भ हुईं और बाशा इसके लिए सबसे बड़ा उत्तरदायी आदमी था.
आज भी, विभिन्न सियासी दलों और आंदोलनों में सैकड़ों लोग ऐसे हैं जो प्रतिबंधित अल-उम्मा के सदस्य थे. उन्होंने कहा, “यह जुलूस 1998 की भूली-बिसरी यादें ताजा कर सकता है और इससे भविष्य में बड़े सांप्रदायिक मामले पैदा हो सकते हैं. यह सीएम एमके स्टालिन की जिम्मेदारी है कि वे देखें कि यह जुलूस न निकले और मृत आतंकी बाशा का आखिरी संस्कार सिर्फ़ उनके परिवार के सदस्यों के साथ ही किया जाए, किसी बड़ी भीड़ के साथ नहीं.“