दीक्षित ने बड़ी विनम्रता से इस प्रस्ताव को किया अस्वीकार
हमारे यहां आपसी वार्ता में भले ही एक गृहिणी को ‘गृह मंत्री’ बोला जाता हो, लेकिन हिंदुस्तान के इतिहास में आज तक किसी भी स्त्री को स्वतंत्र रूप से राष्ट्र के केंद्रीय गृह मंत्रालय का कार्यभार नहीं दिया गया है (इंदिरा गांधी के पास जरूर पीएम के साथ-साथ गृह मंत्रालय का प्रभार था)। ऐसा ऐतिहासिक अवसर वर्ष 2012 में तब आने वाला था, जब स्वयं कांग्रेस पार्टी सुप्रीमो सोनिया गांधी ने शीला दीक्षित के समक्ष गृह मंत्री बनने का प्रस्ताव रखा था।

प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति भवन में जाने के बाद जब तत्कालीन गृह मंत्री पी। चिदंबरम को वित्त मंत्रालय भेजा गया तो सोनिया को उनकी स्थान सबसे मुनासिब नाम शीला दीक्षित का ही लगा। लेकिन दीक्षित ने बड़ी विनम्रता से इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। ‘कौन जाएं दिल्ली की गलियां छोड़कर’, कहते हुए उन्होंने दिल्ली का सीएम बने रहना ही पसंद किया। दरअसल, उन्हें राजधानी में किए गए विकास कार्यों की बदौलत 2013 में भी दिल्ली का लगातार चौथी बार सीएम बनने का भरोसा था। लेकिन राजनीति कई बार आपकी अपनी ही उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती है। उन्हें नई-नवेली आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल के हाथों करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। वैसे, आज भी कांग्रेस पार्टी के कई नेता शीला दीक्षित के दिल्ली में ही बने रहने के निर्णय को गलत बताते हैं। इनका मानना है कि उस समय यदि दिल्ली में नेतृत्व बदलाव हो जाता तो कांग्रेस पार्टी सत्ता में बनी रह सकती थी, जबकि स्वयं दीक्षित एक सक्षम गृह मंत्री साबित होतीं।
राजीव ने दिया था राजनीति में ब्रेक
शीला दीक्षित को संसदीय राजनीति में ब्रेक देने का श्रेय राजीव गांधी को जाता है, जिन्होंने 1985 में उन्हें पीएम कार्यालय में राज्य मंत्री बनाया था। उत्तर प्रदेश के कन्नौज से शीला दीक्षित की जीत और फिर मंत्री बनना कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं को हालांकि रास नहीं आया था, लेकिन राजीव को उन पर विश्वास था। राजीव गांधी की मर्डर के बाद पीवी नरसिंह राव कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष और पीएम बने। मगर जल्द ही पार्टी के एक धड़े और राव के बीच मतभेद उभरने लगे। राव के विरुद्ध बगावत करने वालों में शीला दीक्षित सबसे आगे थीं। उनके साथ एन।डी। तिवारी, माखनलाल फोतेदार, अर्जुन सिंह, नटवर सिंह, पी। शिवशंकर, मोहसिना किदवई, कुमार मंगलम, शिव चरण माथुर जैसे अन्य लोग थे, जिन्होंने मिलकर कांग्रेस पार्टी (तिवारी) नाम से अलग पार्टी बना डाली।
प्रियंका ने सुझाया था, “शीला फॉर दिल्ली’
1996 के आम चुनावों में शीला दीक्षित को झटका लगा। दिल्ली (पूर्व) सीट पर उन्हें बी।एल। शर्मा ‘प्रेम’ के हाथों हार झेलनी पड़ी। मगर दीक्षित के संयम और दृढ़ संकल्प ने सोनिया गांधी का ध्यान आकृष्ट किया। सोनिया उस समय तक कांग्रेस पार्टी की राजनीति में दिलचस्पी लेने लगी थीं। 1998 में कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष का कार्यभार संभालने के बाद ही दिल्ली में चुनाव थे. प्रश्न यह था कि सीएम का चेहरा किसे बनाया जाए। 1984 के सिख दंगों के कारण दिल्ली का सिख समुदाय सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर का विरोध कर रहा था और इसलिए उन्हें पार्टी का चेहरा नहीं बनाया जा सकता था।
इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट की बैठक थी, जिसमें पहली बार हिस्सा लेने के लिए शीला दीक्षित 10 जनपथ पहुंचीं और तभी प्रियंका गांधी को विचार आया “शीला फॉर दिल्ली’। सोनिया को भी ये प्रस्ताव अच्छा लगा, लेकिन दीक्षित को इसके लिए तैयार करने में नटवर सिंह को खासी मशक्कत करनी पड़ी। दिल्ली कांग्रेस पार्टी के कद्दावर नेताओं एचकेएल भगत, सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर, जेपी अग्रवाल आदि ने इसका पुरजोर विरोध किया। मगर ‘बाहरी’ कहलाने वाली शीला दीक्षित ने न केवल भाजपा, बल्कि पार्टी के भीतर भी अपने विरोधियों को पटखनी दे दी। वे अगले 15 वर्ष तक दिल्ली की सीएम बनी रहीं। वे राष्ट्र के दिल पर सबसे लंबे समय तक राज करने वाली नेता हैं।
अच्छी संगठनकर्ता
दीक्षित एक अच्छी संगठनकर्ता भी थीं। कम ही लोगों को पता होगा कि 1972 में नेशनल यूनियन ऑफ स्टूडेंट (एनयूएस) के दिल्ली चैप्टर की आरंभ करने वाली वही थीं। बाद में एनयूएस ही कांग्रेस पार्टी का विद्यार्थी संगठन एनएसयूआई बना। उस समय प्रियरंजन दासमुंशी भारतीय यूथ कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे और रंगराजन कुमार मंगलम उसके महासचिव थे। आजादी की लड़ाई में पार्टी के संघर्ष और हिंदुस्तान निर्माण में सहयोग देने वाले इसके नेताओं से प्रभावित देशभर के युवा और योग्य नेता आगे आ रहे थे। उम्मीदों और परिवर्तन के इस दौर में शीला दीक्षित भी एक ऐसी युवा नेता के रूप में सामने आईं, जो कॉन्वेंट से पढ़ी थीं और अपनी पहचान बनाने के लिए बेकरार थीं।
राजनीति की ‘देवानंद’
मार्च 2014 में दीक्षित को उनके 76वें जन्मदिन से कुछ सप्ताह पहले ही केरल का गवर्नर बना दिया गया। बाद में उन्होंने राजनीति से संन्यास लेकर शांतिपूर्ण जीवन बिताने की ख़्वाहिश जताई, लेकिन पार्टी के प्रति उनकी वफादारी उन्हें फिर से दिल्ली और उत्तर प्रदेश की राजनीति में वापस ले आई। मगर उनके कॅरियर का ग्राफ लगातार गिरता ही चला गया। फिल्मों की शौकीन शीला दीक्षित की तुलना देवानंद से की जाने लगी, जिनकी वापसी की कोशिशें असफल रही थीं। दिवंगत अदाकार की तरह अंतिम वर्षों में दीक्षित को भी मकबूलियत हासिल नहीं हो पाई। वे जनता की कल्पनाओं में लोकप्रिय तो रहीं, लेकिन एक नेता के तौर पर उनका समय बीत चुका था।

