सूखे की नौबत से जूझते हुए दूसरे रोजगार की तलाश करने को मजबूर हुए किसान
नदी के दोहन से जलस्तर गिरा, जिस पर ऊपर से आसमानी कड़कड़ाती धूप ने किसानों के खेत सुखा दिए। खेतों में फसल पानी के अभाव में झुलस गई। ये तस्वीर गोड्डा के हरिपुर गरवन्ना गांव की है, जहां गांव के बगल से गोड्डा की लाइफ लाइन कही जाने वाली कझिया नदी गुजरती है। इसी नदी के बदौलत इस क्षेत्र के लोग सब्जी उगाकर बाजारों में बेच घर-परिवार चलाते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में नदी से बहुत अधिक बालू उठाव के कारण नदी का दोहन हुआ और नतीजा सामने ये आया कि कुएं, चापाकल, खेतों के बोरिंग सब सूख गए।

भगवान भरोसे खेती
अब यहां खेती केवल ईश्वर के भरोसे होती है। यदि बारिश अच्छी हुई तो फसल हुई, वर्ना खेतों में ही फसल तेज धूप की वजह से झुलसकर समाप्त हो जाती है। ग्रामीण बताते हैं कि एक समय था जब नदी में हाथ से बालू खोदकर पानी निकाल लिया जाता था, लेकिन बालू के उठाव के कारण अब नदियां सूख गई हैं और जमीनी जलस्तर बहुत नीचे जा चुका है। खेती तो दूर, इस गांव और आसपास के इलाकों में घनघोर जल संकट है।
आज भी हो रही है गैरकानूनी ढुलाई
इसी गांव में उपस्थित प्राथमिक विद्यालय का चापाकल पिछले तीन-चार वर्ष से सूखा पड़ा है। शिक्षक बताते हैं कि जल साधन सूख जाने से चापाकल में पानी नहीं आता। बच्चे विद्यालय से बाहर जाकर आसपास के घरों से पानी लाते हैं। खेतों में सूखी फसल जमीनी हकीकत बयां करती है, साथ ही नदी की खराब स्थिति दिन-रात हो रहे दोहन की भी गवाही देती है। ग्रामीण बताते हैं कि प्रतिदिन आज भी नदी से रात भर बालू की गैरकानूनी ढुलाई होती है। इंकार करने पर दबंग हाथापाई पर उतर आते हैं।
किसान करने लगे मजदूरी
गांव के बिरेंद्र राउत ने लोकल 18 को कहा कि वो एक दौर था जब गांव का एक भी खेत खाली नहीं रहता था। हर खेत में हरी साग-सब्जी की फसल लगी रहती थी लेकिन जब से नदी का दोहन प्रारम्भ हुआ है, पूरे गांव में मानो महामारी छा गई हो। वहीं गांव के गुड्डू रावत ने कहा कि पहले गांव के जो किसान खेती पर निर्भर थे, वह अब मजदूरी पर जाने लगे हैं। वहीं गांव के कई युवा तो गांव से पलायन कर रहे हैं।

