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केजरीवाल शराब नीति केस! बेल पर रोक लगाते हुए हाईकोर्ट ने कहा…

शराब नीति मुकदमा में प्रवर्तन निदेशालय ने मंगलवार को दिल्ली के राउज एवेन्यू न्यायालय में सातवीं सप्लीमेंट्री चार्जशीट पेश की. 208 पेज की इस चार्जशीट में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को मुकदमा का मुखिया और साजिशकर्ता कहा गया. चार्जशीट में बोला गया कि स्कैम से मिला पैसा आम आदमी पार्टी पर खर्च हुआ है.

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ED ने अपनी चार्जशीट में बोला कि केजरीवाल ने 2022 में हुए गोवा चुनाव में AAP के चुनाव अभियान में यह पैसा खर्च किया. दावा किया गया है कि केजरीवाल ने शराब बेचने के कॉन्ट्रेक्ट के लिए साउथ ग्रुप के सदस्यों से 100 करोड़ रुपए की घूस मांगी थी, जिसमें से 45 करोड़ रुपए गोवा चुनाव पर खर्च किए गए थे.

ED ने बल देकर बोला कि केजरीवाल ने दावा किया कि AAP के पूर्व मीडिया प्रभारी और इस मुकदमा के सह-आरोपी विजय नायर ने उनके नहीं, बल्कि मंत्री आतिशी और सौरभ भारद्वाज के अधीन काम किया था. इसमें यह भी दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री ने बोला कि दुर्गेश पाठक गोवा के राज्य प्रभारी (प्रभारी) थे और फंड का प्रबंधन करते थे और फंड से संबंधित निर्णयों में उनकी स्वयं कोई किरदार नहीं थी और उन्हें हिंदुस्तान देश समिति की नेता के कविता से घूस नहीं मिली थी.

केजरीवाल ने उच्च न्यायालय में कहा- जमानत रद्द करना इन्साफ की विफलता के समान

अरविंद केजरीवाल को प्रवर्तन निदेशालय ने 21 मार्च को अरैस्ट किया था. (फाइल)

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने बुधवार (10 जुलाई) को उच्च न्यायालय में दाखिल उत्तर में कहा- मेरी जमानत रद्द करना इन्साफ की विफलता के समान है. मैं विच हंट का शिकार हुआ हूं. दरअसल, जानबूझकर किसी आदमी को परेशान करना विच हंट का शिकार होना कहलाता है. यह सियासी विरोधी भी हो सकता है.

हाईकोर्ट में हुई सुनवाई में केजरीवाल ने कहा- प्रवर्तन निदेशालय कस्टडी के दौरान जांच अधिकारी ने कोई खास इन्टेरोगेशन (पूछताछ) नहीं किया. एक सियासी विरोधी को परेशान और अपमानित करने के लिए गैरकानूनी रूप से गिरफ्तारी की गई है.

मामले को लेकर जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की बेंच ने अब प्रवर्तन निदेशालय से उत्तर दाखिल करने को बोला है. मुकदमा की अगली सुनवाई 15 जुलाई को होगी. केजरीवाल पर प्रवर्तन निदेशालय के अतिरिक्त सीबीआई का मुकदमा भी चल रहा है. शराब नीति में करप्शन को लेकर सीबीआई ने उन्हें 26 जून को अरैस्ट किया था.

केजरीवाल को शराब नीति में मनी लॉन्ड्रिंग मुद्दे को लेकर प्रवर्तन निदेशालय ने 21 मार्च को अरैस्ट किया था. 20 जून को ट्रायल न्यायालय से उन्हें जमानत मिल गई थी. इसके विरुद्ध प्रवर्तन निदेशालय ने उच्च न्यायालय में अपील की थी. उच्च न्यायालय ने 25 जून को ट्रायल न्यायालय के निर्णय पर रोक लगा दी थी.

केजरीवाल बोले- ट्रायल न्यायालय ने विवेक के आधार पर निर्णय सुनाया था

केजरीवाल ने बोला कि प्रवर्तन निदेशालय की दलीलें कानून के हिसाब से ठीक नहीं थीं. प्रवर्तन निदेशालय की दलीलें असंवेदनशीलता के रवैये को दर्शाती हैं. PMLA की धारा 3 के अनुसार मेरे विरुद्ध कोई मुकदमा नहीं बनता है. और मेरे जीवन और स्वतंत्रता को झूठे और दुर्भावनापूर्ण मुद्दे से बचाया जाना चाहिए.

केजरीवाल ने कहा- प्रवर्तन निदेशालय ने अन्य सह आरोपियों पर दबाव बनाया और उनसे ऐसे बयान दिलवाए, जिससे मुकदमा में प्रवर्तन निदेशालय को लाभ हुआ. ट्रायल न्यायालय का जमानत ऑर्डर न सिर्फ़ तर्कपूर्ण था, बल्कि यह दर्शाता है कि दोनों पक्षों की दलीलों पर विवेक के आधार पर निर्णय सुनाया गया था.

ऐसा कोई सबूत नहीं है जो यह साबित करे कि AAP को साउथ ग्रुप से घूस मिली है. इस घूस का गोवा चुनाव में इस्तेमाल तो दूर की बात है. AAP के पास एक भी रुपया नहीं मिला. इस संबंध में लगाए गए इल्जाम को साबित करने के कोई भी ठोस सबूत नहीं है.

बेल पर रोक लगाते हुए उच्च न्यायालय ने कहा- ट्रायल न्यायालय ने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया
हाईकोर्ट ने बोला कि दलीलों पर ठीक ढंग से बहस नहीं हुई थी, इसलिए राउज एवेन्यू न्यायालय के निर्णय को रद्द करते हैं. निर्णय को देखकर ऐसा लगता है कि केजरीवाल को जमानत देते समय विवेक का इस्तेमाल नहीं किया गया. ट्रायल न्यायालय की टिप्पणी पर विचार नहीं किया जा सकता, पूरी तरह से अनुचित है. यह दर्शाता है कि ट्रायल न्यायालय ने सामग्री पर अपना दिमाग नहीं लगाया है.

इस बात पर मजबूत तर्क दिया गया कि न्यायधीश ने धारा 45 PMLA की दोहरी शर्त पर विचार-विमर्श नहीं किया. ट्रायल न्यायालय को ऐसा कोई फैसला नहीं देना चाहिए जो उच्च न्यायालय के निर्णय से उलट हो. ट्रायल न्यायालय ने धारा 70 PMLA के तर्क पर भी विचार नहीं किया है.

राउज एवेन्यू न्यायालय के बेल ऑर्डर की 5 बातें…

  • ED के पास केजरीवाल के विरुद्ध आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं. वह किसी भी तरह से सबूत हासिल करने के लिए समय ले रही है. यही बात न्यायालय को जांच एजेंसी के विरुद्ध निर्णय लेने के लिए विवश करती है कि वह पक्षपात के बिना काम नहीं कर रही है.
  • जस्टिस इन्साफ बिंदू ने कहा- प्रवर्तन निदेशालय केजरीवाल के उठाए कुछ मुद्दों पर चुप है, जैसे कि उनका नाम सीबीआई मुकदमा या ECIR की FIR में नहीं है. केजरीवाल के विरुद्ध इल्जाम कुछ सह-आरोपियों के बयानों के बाद सामने आए हैं. न्यायालय ने अमेरिका के संस्थापकों में से एक बेंजामिन फ्रैंकलिन के कोट का जिक्र किया- ‘एक बेगुनाह को सजा देने से बेहतर है कि 100 गुनेहगार छूट जाएं’.
  • यह भी एक बड़ा फैक्ट है कि केजरीवाल को आज तक न्यायालय ने तलब नहीं किया है, फिर भी वे अभी भी चल रही जांच के बहाने प्रवर्तन निदेशालय के कहने पर न्यायिक हिरासत में हैं. प्रवर्तन निदेशालय यह साफ करने में विफल रहा है कि पूरी रकम का पता लगाने के लिए उसे कितना समय चाहिए.
  • यह भी ध्यान देने वाली बात है कि प्रवर्तन निदेशालय इस बारे में चुप है कि क्राइम की आय का इस्तेमाल गोवा में आम आदमी पार्टी ने विधानसभा चुनावों में कैसे किया है, जबकि लगभग 2 वर्ष बाद भी इस पूरे अमाउंट का बड़ा हिस्सा पता लगाना बाकी है.
  • इसकी भी आसार है कि केजरीवाल के कुछ परिचित लोग किसी क्राइम में शामिल हों या क्राइम में शामिल किसी तीसरे आदमी को जानते हों, लेकिन प्रवर्तन निदेशालय क्राइम की आय के संबंध में उनके विरुद्ध कोई जाहिर सबूत नहीं दे सकी है.

 

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