राष्ट्रीय

खतरे में है वैश्विक व्यवस्था, भारतीय सेना के जनरल ने दी ये बड़ी चेतावनी

दुनिया आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, 90 से अधिक देश, 56 से अधिक एक्टिव संघर्षों में लिप्त हैं. 90 से अधिक राष्ट्रों की इन संघर्षों में भागीदारी ने वैश्विक प्रबंध को जटिल बना दिया है. यह जानकारी मंगलवार को भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने दी.

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वह नयी दिल्ली में आयोजित संयुक्त देश शांति सेना योगदानकर्ता राष्ट्रों के प्रमुखों के सम्मेलन में बोल रहे थे. यहां जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने वैश्विक शांति के प्रति हिंदुस्तान की अटूट प्रतिबद्धता को रेखांकित किया. उन्होंने बोला कि नयी प्रौद्योगिकियां, हाइब्रिड युद्ध, गैर-राज्यीय तत्वों की किरदार और दुष्प्रचार जैसे कारक पारंपरिक युद्ध और शांति के बीच की रेखाओं को धुंधला कर रहे हैं.

विश्व शांति में हिंदुस्तान के योगदान और प्रतिबद्धता की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान अब तक 51 संयुक्त देश मिशनों में लगभग 3 लाख सैनिकों (पुरुष और महिलाएं) भेज चुका है. जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने कहा कि यह कुल 71 मिशनों में से सबसे अधिक है. उन्होंने कहा कि कोरिया (1950) और कांगो (1960) से लेकर आज 11 में से 9 चल रहे मिशनों में हिंदुस्तान की एक्टिव उपस्थिति है.

उन्होंने बोला कि हिंदुस्तानसिर्फ़ सैनिक भेजने वाला राष्ट्र है, बल्कि अनुभव साझा करने में भी अग्रणी है. नयी दिल्ली स्थित संयुक्त देश शांति स्थापना केंद्र को राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र के रूप में विकसित किया गया है, जहां अनेक राष्ट्रों के अधिकारी प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं.

उन्होंने कहा, “भारत में इस सम्मेलन का आयोजन, हिंदुस्तान की उस भावना का प्रतीक है जिसे हम वसुधैव कुटुम्बकम् और विश्व बंधु के रूप में मानते हैं. विश्व एक परिवार है और हिंदुस्तान सबका मित्र.” शांति स्थापना के बदलते स्वरूप पर दृष्टि डालते हुए थल सेना प्रमुख ने वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों की ओर इशारा करते हुए बोला कि आज शांति स्थापना अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रही है. उन्होंने बोला कि आज का शांति सैनिक सिर्फ़ सुरक्षा प्रदाता नहीं है, बल्कि राजनयिक, तकनीकी विशेषज्ञ, समाज निर्माता और कभी-कभी संघर्ष क्षेत्रों में सूचना का एकमात्र माध्यम भी बन जाता है.

उन्होंने ब्लू हेलमेट्स पहनने वाले शांति सैनिकों के लिए कहा, “ब्लू हेलमेट्स वास्तव में वह ‘गोंद’ हैं जो मिशन को एकजुट रखती है.” जनरल द्विवेदी ने बोला कि भविष्य के शांति अभियानों के लिए हमें नवोन्मेषी सोच और व्यावहारिक अनुकूलन की जरूरत है. उन्होंने कुछ प्रमुख बिंदु रखे. सेना प्रमुख ने बोला कि संयुक्त देश मिशनों के लिए धन की कमी को ध्यान में रखते हुए अब कम सैनिकों और अधिक तकनीकी योगदान के साथ मिशन संचालित करने होंगे. शांति स्थापना अब सिर्फ़ सशस्त्र उपस्थिति तक सीमित न रहकर, निवारक कूटनीति और दीर्घकालिक शांति निर्माण की दिशा में आगे बढ़नी चाहिए.

उन्होंने पश्चिम अफ्रीकी कहावत उद्धृत की, “धीरे बोलो और बड़ा डंडा साथ रखो, तुम दूर तक जाओगे.” सेनाध्यक्ष ने बोला कि कुछ मिशन जिनकी जटिलता बढ़ गई है, उनके लिए सीमित अवधि हेतु दोनों अध्यायों के बीच इंटरचेंजएबिलिटी (लचीलापन) की जरूरत है. संयुक्त देश मुख्यालय के यू1 से यू9 कार्यालयों के कार्यों का सुधार, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बढ़ाना जरूरी है. उन्होंने बल दिया कि आधुनिक तकनीक, तीव्र तैनाती क्षमता और आपसी इंटरऑपरेबिलिटी (संगतता) को बढ़ाना अब समय की मांग है. उन्होंने कहा, “संयुक्त प्रशिक्षण, संसाधनों का बुद्धिमान इस्तेमाल और साझी योजना ही शांति अभियानों को दीर्घकालिक स्थायित्व प्रदान कर सकते हैं.

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