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क्या एक प्रत्याशी का दो सीटों पर चुनाव लड़ना उचित है…

नई दिल्ली: आजादी के बाद से भारतीय राजनीति के परिदृश्य में सियासी नेताओं के लिए एक से अधिक सीटों से चुनाव लड़ना एक आम बात रही है. यह अक्सर संसद या विधानसभा में पद सुरक्षित करने और सियासी असर बढ़ाने की महत्वाकांक्षा से प्रेरित होता है. लोक अगुवाई अधिनियम, 1951 की धारा 33, उम्मीदवारों को अधिकतम दो सीटों से चुनाव लड़ने की अनुमति देती है, जो राष्ट्र में लोकतंत्र की बदलती गतिशीलता को दर्शाती है. हालांकि, इस प्रथा ने इसकी निष्पक्षता को लेकर बहस छेड़ दी है. आलोचकों का तर्क है कि ऐसी प्रणाली में जहां प्रत्येक आदमी सिर्फ़ एक वोट का हकदार है, ऐसे में उम्मीदवारों को एक से अधिक सीटों से चुनाव लड़ने की अनुमति देना समानता और अगुवाई पर प्रश्न उठाता है.

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क्या दो सीटों पर चुनाव लड़ना उचित?

अपने सियासी हितों को आगे बढ़ाने के लिए नेता अक्सर एक साथ दो सीटों पर चुनाव लड़ते हैं. यदि वे दोनों सीटें जीतते हैं, तो वे आम तौर पर अपनी सुविधा के मुताबिक एक सीट से त्याग-पत्र दे देते हैं, जो एक कानूनी जरूरत है. हालांकि, इस प्रथा की मूल्य करदाताओं को चुकानी पड़ती है और खाली सीट के घटकों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. इसे चुनावी प्रणाली में हेरफेर के रूप में माना जाता है, जहां निर्वाचित प्रतिनिधि मतदाताओं के हितों पर अपने सियासी एजेंडे को अहमियत देते हैं.

चुनाव आयोग ने रखा दंड का प्रस्ताव

इन मुद्दों को पहचानते हुए, चुनाव आयोग ने दो सीटों से चुनाव लड़ने और जीतने वाले उम्मीदवारों के लिए दंड का प्रस्ताव दिया है. सुझाया गया जुर्माना विधानसभा सीटों के लिए 5 लाख रुपये और लोकसभा सीटों के लिए 10 लाख रुपये है. इस प्रस्ताव के पीछे तर्क यह है कि उम्मीदवारों को कई सीटों से चुनाव लड़ने के निर्णय के कारण उपचुनाव कराने से होने वाले वित्तीय बोझ के लिए जवाबदेह बनाना है. चुनाव आयोग का लक्ष्य इस प्रथा को हतोत्साहित करना और यह सुनिश्चित करना है कि निर्वाचित प्रतिनिधि अपने सियासी फायदा के बजाय अपने मतदाताओं के हितों को अहमियत दें.

दो सीटों पर चुनाव लड़ने की है अनुमति

1996 से पहले, एक उम्मीदवार अधिकतम कितनी सीटों पर चुनाव लड़ सकता है, इसकी कोई निश्चित सीमा नहीं थी. हालांकि, नियम में यह निर्धारित किया गया था कि एक जन प्रतिनिधि एक समय में सिर्फ़ एक ही सीट का अगुवाई कर सकता है. 1996 में, जन अगुवाई अधिनियम 1951 में संशोधन करके एक परिवर्तन किया गया, जिससे उम्मीदवारों को अधिकतम दो सीटों पर चुनाव लड़ने की अनुमति मिल गई. इस संशोधन ने भारतीय लोकतंत्र की उभरती गतिशीलता को समायोजित करने के उद्देश्य से चुनावी नियमों में एक जरूरी परिवर्तन को चिह्नित किया.

चुनाव आयोग का प्रस्ताव

2004 में, चुनाव आयोग ने एक सीट से एक आदमी के चुनाव लड़ने का नियम लागू करने का कोशिश किया. इसके अतिरिक्त, आयोग ने प्रस्ताव दिया कि यदि एक से अधिक सीटों से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की वर्तमान प्रबंध को बनाए रखना है, तो उन उम्मीदवारों को उनके इस्तीफे के परिणामस्वरूप होने वाले किसी भी उप-चुनाव का खर्च भी वहन करना चाहिए. इस प्रस्ताव के कारण उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दाखिल की गई, जिसने अंततः इसे खारिज कर दिया.

पहले भी होती रही हैं सुधार की सिफारिशें

गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों में विभिन्न समितियों द्वारा चुनाव सुधारों के लिए सिफारिशें की जाती रही हैं. 1990 में दिनेश गोस्वामी समिति की रिपोर्ट और 1999 में प्रस्तुत चुनाव सुधारों पर लॉ कमीशन की 170वीं रिपोर्ट, दोनों ने एक निर्वाचन क्षेत्र से सिर्फ़ एक आदमी को चुनाव लड़ने की अनुमति देने की वकालत की.

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